एक गरीब किसान का बेटा... जब 16 साल बाद लौटा गांव तो लोगों ने बना दिया किंग

देश के सबसे अमीर राज्यसभा सांसदों में से एक हैं महेंद्र प्रसाद, जिनकी कुल सम्पत्ति 4 हजार करोड़ से ज्यादा है. (Photo- News18)
देश के सबसे अमीर राज्यसभा सांसदों में से एक हैं महेंद्र प्रसाद, जिनकी कुल सम्पत्ति 4 हजार करोड़ से ज्यादा है. (Photo- News18)

जदयू (JDU) से राज्यसभा पहुंचे महेंद्र प्रसाद सबसे पहले कांग्रेस (INC) से जुड़े थे. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल (Rashtriya Janta dal) जॉइन कर लिया और उसके टिकट से राज्यसभा में दस्तक दी. फिर, बिहार में जब राजद (RJD) की सत्ता चली गई तो महेंद्र प्रसाद ने जनता दल यूनाइटेड (Janta Dal United) का दामन थाम लिया और फिर बतौर सांसद राज्यसभा पहुंच गए.

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  • Last Updated: October 16, 2020, 1:00 PM IST
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पटना. देश-दुनिया में कई ऐसे लोग हैं, जिन्होंने गरीबी से उठकर अपनी मेहनत के दम पर सफलता पाई. ऐसे ही एक शख्स हैं जदयू (JDU) के राज्यसभा सांसद महेंद्र प्रसाद (Mahendra Prasad), जिन्हें किंग महेंद्र के नाम से भी जाना जाता है. यह देश के सबसे अमीर राज्यसभा सांसदों (Richest MPs in Rajya Sabha) में से एक हैं, जिनकी कुल सम्पत्ति 4 हजार करोड़ से ज्यादा है.

फिलहाल, जदयू से राज्यसभा पहुंचे महेंद्र प्रसाद सबसे पहले कांग्रेस (INC) से जुड़े थे. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) जॉइन कर लिया और उसके टिकट से राज्यसभा में दस्तक दी. फिर, बिहार में जब राजद की सत्ता चली गई तो महेंद्र प्रसाद ने जनता दल यूनाइटेड का दामन थाम लिया और फिर बतौर सांसद राज्यसभा पहुंच गए. बिहार चुनाव (Bihar Election) के बहाने आइए जानते हैं महेंद्र प्रसाद की दास्तां...

संघर्षों के बीच बीता बचपन
जहानाबाद से करीब 17 किलोमीटर दूर एक गांव है गोविंदपुर, जहां एक भूमिहार परिवार में महेंद्र प्रसाद का जन्म हुआ था. पिता वासुदेव सिंह साधारण किसान थे. बावजूद इसके उन्होंने महेंद्र को पटना कॉलेज से इकोनॉमिक्स में बीए करवाया. इसके बाद कोई नौकरी नहीं मिली तो महेंद्र गांव पहुंच गए. तभी एक साधु मिला, जिसने महेंद्र को एक पुड़िया दी और कहा कि इसे नदी किनारे जाकर सपरिवार खा लेना. सारा दुख-दलिदर दूर भाग जाएगा. ग्रैजुएशन के बाद से बेरोजगारी झेल रहे महेंद्र को पता नहीं क्या सूझा, उन्होंने घर के लोगों को नदी किनारे ले जाकर पुड़िया दे दी और खुद भी खा लिया. यह घटना सन् 1963-64 की है, जिसमें परिवार के दो सदस्यों की मौत हो गई.
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अपने पिता और छोटे भाई के साथ अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद महेंद्र गांव छोड़कर चले गए. इसके बाद वह जब 16 साल बाद लौटे तो उनके नाम के आगे किंग जुड़ गया. महेंद्र प्रसाद से अब वे किंग महेंद्र हो गये थे. यह बात 1980 के लोकसभा चुनाव की है. महेंद्र प्रसाद कांग्रेस के उम्मीदवार थे. पहली बार जहानाबाद के लोगों ने चुनाव में एक साथ इतनी गाड़ियां और प्रचारकों को देखा था. गाड़ियों की चमक और पैसों की खनक ने लोगों के मन में इस उम्मीदवार की छवि किंग वाली बना दी.

मर जाउंगा, लेकिन नौकरी नहीं करुंगा

एक अखबार से बातचीत में महेंद्र प्रसाद के बचपन के मित्र रहे राजाराम शर्मा ने बताया था कि ग्रैजुएशन के बाद मैं ओकरी हाईस्कूल में टीचर बन गया था. अपने मित्र महेंद्र प्रसाद को बेरोजगार देखकर कहा कि आप भी शिक्षक बन जाइए. महेंद्र प्रसाद ने उस प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि मर जाना पसंद करूंगा, पर नौकरी नहीं करूंगा. वे आगे कहते हैं कि हादसे के बाद जब महेंद्र गांव छोड़कर गए तो उनके पास कुछ भी नहीं था, लेकिन जब लौटे तो किंग बनकर. वे एक छोटी दवा कंपनी में पहले साझेदार बने, फिर बाद में सन् 1971 में 31 साल की उम्र में ही खुद अपनी कंपनी बना ली.

हार गए थे चुनाव, फिर पहुंचे राज्यसभा

एरिस्टो फार्मा के मालिक किंग महेंद्र 1984 में हुए लोकसभा का चुनाव हार गये थे, लेकिन कांग्रेस के टिकट पर वह राज्यसभा पहुंच गए. उसके बाद से वह लगातार राज्यसभा के सदस्य हैं. यह उनका सातवां टर्म है. भले ही उनकी पार्टियों की सदस्यता बदलती रही हो, लेकिन वे हर बार राज्यसभा पहुंचने में सफल रहे. उन्हें कभी लालू प्रसाद ने तो कभी नीतीश कुमार ने राज्यसभा में भेजा. फिलहाल वह जदयू की ओर से राज्यसभा के सदस्य हैं. 2012 में एक इंटरव्यू में महेंद्र प्रसाद ने कहा था कि अगर राज्यसभा में एक सीट भी होगी, तब भी उसके लिए मैं ही चुना जाउंगा.

सदस्यता से मतलब, पद की नहीं लालसा

राजनीति में जो भी आता है, उसकी लालसा पद पाने की होती है, लेकिन महेंद्र प्रसाद को कभी इसकी लालच नहीं रही. बताया जाता है कि साल 2005 में नीतीश कुमार के कहने पर उन्होंने जदयू जॉइन किया था. जदयू के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, महेंद्र ने कभी भी किसी पद के लिए अपनी इच्छा नहीं जाहिर की, उन्हें बतौर राज्यसभा सांसद मिलने वाली पावर और सुविधाओं से ही खुशी मिलती है. उन्हें पता है कि कैसे बिजनेस और पोलिटिक्स के बीच की दूरी मेंटेन करनी है.
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