Home /News /bihar /

muscular dystrophy destroyed life of 3 real brothers became disabled brvj

इस बीमारी से 18 वर्ष की उम्र में आते-आते दिव्यांग हो गए 3 सगे भाई, बोले-क्यों न हम तीनों...

कैमूर में सगे तीन भाइयों को मस्कुलर डिस्ट्रोफी बीमारी.

कैमूर में सगे तीन भाइयों को मस्कुलर डिस्ट्रोफी बीमारी.

Kaimur News: यह परिवार दिव्यांगता के बीच हर मुसीबतों से जूझ रहा है. एक-एक दाने को मोहताज भाइयों ने बताया कि पिछले 12 सालों से हम लोगों ने सूर्योदय और सूर्यास्त नहीं देखा है और न ही बदन पर सूर्य का प्रकाश पड़ा है. बिना किसी के गोद लिए एक कदम भी चलना मुश्किल है इसलिए बंद कमरे में ही जिंदगी कटती है.

अधिक पढ़ें ...

भभुआ. मां-बाप ने गरीबी से अभिसप्त जीवन में अपने तीन बच्चों की परवरिश बेहतर तरीके से की, लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि बुढ़ापे में अपने इन तीनों बच्चों की परवरिश उन्हें ही करनी होगी. दर्द भरी जिंदगी के बीच पिता शीतल सिंह कोरोना काल में अपने तीन बच्चों को उसी हालात में छोड़ कर चले गए. अब बची हैं तो 60 वर्षीय मां सावित्री देवी, जो अपने तीनों दिव्यांग बच्चों की परवरिश कर रही हैं. एक छत के नीचे आंगन की फर्श पर एक जगह बैठे दीपक सिंह, प्रदीप कुमार सिंह और प्रभाकर सिंह ने जब बारी-बारी से अपनी व्यथा सुनाई तो तीनों भाइयों की आंखें भर आईं और मां फूट-फूटकर रोने लगीं.

शारीरिक रूप से दिव्यांग प्रदीप कुमार सिंह ने बताया कि मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नाम की बीमारी सबसे पहले मेरे बड़े भाई दीपक सिंह को हुई, जिन्होंने 2001 में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी. 2003 में इंटर करने के बाद जैसे ही स्नातक में दाखिला लिए यह बीमारी उनके भीतर घर कर गई. तब तक छोटे दोनों भाई शारीरिक रूप से स्वस्थ थे. बड़े भाई का इलाज बनारस लखनऊ दिल्ली के बाद कोलकाता में हुआ तब पता चला कि इस बीमारी का इलाज भारत में नहीं है. इसके लिए अमेरिका जाना होगा और इस बीमारी के इलाज के लिए कम से कम 40 से ₹50 करोड़ खर्च होंगे.

प्रदीप कुमार सिंह ने आगे बताया कि इसके दो साल के भीतर मैं खुद इस बीमारी का शिकार हो गया और उसके एक साल बाद मेरा छोटा भाई प्रभाकर भी. यानी एक-एक करके तीनों भाई इसके शिकार बन गए. आज 30/ 35 वर्ष की उम्र में किसी भी काम के लिए घर से दूर जाने के लिए किसी की गोद का सहारा लेना पड़ रहा है. सरकारी सुविधा के नाम पर सिर्फ शौचालय और अंत्योदय कार्ड ही नसीब हो सका है. राशन कार्ड भी अगस्त 2018 में बंद कर दिया गया था. परन्तु काफी प्रयास के बाद जून 2020 से राशन मिलना शुरू हुआ है.

मां सावित्री देवी को मलाल है कि अपने तीन बच्चों की दिव्यांगता के चलते तो पहले ही परेशान थीं अब बच्चों की इस दशा ने सुख-चैन छीन लिया है. इसके आगे प्रभाकर बताते हैं कि अभी तो हम लोगों की सेवा मां कर रही हैं लेकिन मां भी चंद दिनों की मेहमान हैं. जब हम लोगों के सिर से मां का साया उठ जाएगा तो हम तीनों भाइयों की परवरिश कौन करेगा. इसे सोचकर ही हम परेशान हैं. हमलोग तो यह भी सोचते हैं कि क्यों ना हम तीनों भाई एक साथ आत्महत्या कर लें.

यह परिवार दिव्यांगता के बीच हर मुसीबतों से जूझ रहा है. एक-एक दाने को मोहताज भाइयों ने बताया कि पिछले 12 सालों से हम लोगों ने सूर्योदय और सूर्यास्त नहीं देखा है और न ही बदन पर सूर्य का प्रकाश पड़ा है. बिना किसी के गोद लिए एक कदम भी चलना मुश्किल है इसलिए बंद कमरे में ही जिंदगी कटती है.

हालांकि, ऐसी स्थिति में दिव्यांग सहोदर भाइयों ने स्वालंबन का रास्ता अख्तियार किया है. गांव के 10/20 बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं जिससे 2 वक्त की रोटी नसीब हो रही है. बड़े भाई दीपक बताते हैं कि मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नाम की बीमारी केवल पुरुषों में होती है, महिलाओं में नहीं. हम मात्र तीन भाई हैं लिहाजा तीनों भाई इसके शिकार हो गए. हम सब आज एक तरह से अनाथ हैं.

Tags: Bihar News, Muscular dystrophy disease, Muscular dystrophy injection, Muscular dystrophy treatment

विज्ञापन

राशिभविष्य

मेष

वृषभ

मिथुन

कर्क

सिंह

कन्या

तुला

वृश्चिक

धनु

मकर

कुंभ

मीन

प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
और भी पढ़ें
विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें

अगली ख़बर