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काराकाट लोकसभा सीट: उपेन्द्र कुशवाहा क्या दोबारा जीतने की स्थिति में हैं?

Subhesh Sharma | News18 Bihar
Updated: May 4, 2019, 2:24 PM IST
काराकाट लोकसभा सीट: उपेन्द्र कुशवाहा क्या दोबारा जीतने की स्थिति में हैं?
उपेंद्र कुशवाहा

काराकाट की सीट पर आरएलएसपी की तरफ से उपेन्द्र कुशवाहा उम्मीदवार हैं. वहीं एनडीए के खाते से ये सीट जेडीयू को मिली है. जेडीयू की ओर से यहां पर महाबली सिंह अपनी किस्मत आजमा रहे हैं.

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2014 में काराकाट लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर आरएलएसपी प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा राष्ट्रीय राजनीति की सुर्खियों में आ गए. 2014 के लोकसभा चुनाव में उपेन्द्र कुशवाहा की नई बनी पार्टी आरएलएसपी, बीजेपी के साथ गठबंधन करके 3 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. मोदी लहर में उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी काराकाट की सीट के साथ तीनों सीटें जीतने में कामयाब रही. बिहार के अपने नए साझीदार को एनडीए ने अपनी सरकार में शामिल किया और उपेन्द्र कुशवाहा को मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री का पद मिला.

हालांकि 2017 में जेडीयू के एनडीए में दोबारा शामिल होने के बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदल गईं और 2018 में आरएलएसपी, एनडीए से अलग हो गई. 2019 का चुनाव आरएलएसपी महागठबंधन के साथ मिलकर लड़ रही है और काराकाट की सीट पर आरएलएसपी की तरफ से उपेन्द्र कुशवाहा उम्मीदवार हैं. वहीं एनडीए के खाते से ये सीट जेडीयू को मिली है. जेडीयू की ओर से यहां पर महाबली सिंह अपनी किस्मत आजमा रहे हैं.

काराकाट सीट का इतिहास

काराकाट सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई. 1952 में ये इलाका शाहाबाद दक्षिणी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता था. पहली बार यहां से एक निर्दलीय कमल सिंह सांसद बने थे. 1962 में इस सीट का नाम बदलकर बिक्रमगंज कर दिया गया. 1989 से पहले इस सीट को कांग्रेस का गढ़ माना जाता था. 1989 के बाद अब तक ये समाजवादियों के कब्जे में रही. बीजेपी इस सीट पर कभी सफल नहीं हो पाई.

एनडीए से बाहर होने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करते उपेन्द्र कुशवाहा


60 के दशक में कांग्रेस के राम सुभग सिंह सांसद बने. 1971 में कांग्रेस के शिवपूजन शास्त्री सांसद बने और लगातार दो बार सांसद रहे. 1977 में भारतीय लोकदल के अवधेश सिंह इस सीट से जीते. 1980 और 1984 में लगातार दो बार कांग्रेस के नेता तपेश्वर सिंह सांसद रहे. इसके बाद कांग्रेस को कभी जीत नहीं मिली. 1989 और 1991 में जनता दल के रामप्रसाद सिंह यहां से दो बार सांसद रहे.

काराकाट सीट से लोगों ने किसी भी सांसद को दो बार से ज्यादा मौका नहीं दिया. 1996 में जनता दल से कांति सिंह जीतीं. वहीं 1998 में समता पार्टी के टिकट पर वर्तमान जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह सांसद बने. 1999 में जनता दल से कांति सिंह एक बार फिर जीतीं. 2004 के चुनाव में तपेश्वर सिंह के बेटे अजीत सिंह जेडीयू से जीतकर संसद पहुंचे.
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2008 में उनके अचानक निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी मीना सिंह सांसद बनीं. 2009 में जेडीयू के महाबली सिंह आरजेडी की कांति सिंह को हराकर सांसद बने. वहीं 2014 में आरएलएसपी से उपेन्द्र कुशवाहा ने आरजेडी की कांति सिंह को पटखनी देकर सांसद बने. इस बार मुख्य मुकाबला उपेन्द्र कुशवाहा और जेडीयू के महाबली सिंह के बीच है.

उपेन्द्र कुशवाहा की रैली


काराकाट सीट का सामाजिक राजनीतिक समीकरण

काराकाट रोहतास जिले में आता है. इस सीट में 6 विधानसभा सीटें (ओबरा, गोह, नबीनगर, नोखा, डेहरी और काराकाट) हैं. रोहतास जिला कभी बिहार के उद्योग धंधों का केंद्र हुआ करता था. लेकिन बाद में नक्सली हिंसा ने इस पूरे इलाके को बदनाम कर दिया. इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा आबादी यादव जाति की है. एक आंकड़े के मुताबिक कुल जनसंख्या में यादव 17.39 फीसदी, राजपूत 10.76 फीसदी, कोइरी 8.12 फीसदी, मुसलमान 8.94 फीसदी, ब्राह्मण 4.28 फीसदी और भूमिहार 2.94 फीसदी हैं. काराकाट लोकसभा सीट में आने वाली 6 विधानसभा क्षेत्रों में 4 पर आरजेडी, एक पर बीजेपी और एक पर जेडीयू का कब्जा है.

इस सीट पर मुकाबला आरएलएसपी और जेडीयू के बीच है. दोनों उम्मीदवार अपनी-अपनी जातीय स्थिति और उसके आधार पर बनने वाली जातीय गोलबंदी को ध्यान में रखते हुए जीत की उम्मीद लगाए बैठे हैं. आरएलएसपी के उपेन्द्र कुशवाहा को कोइरी, यादव और मुसलमान के वोटों का गठजोड़ मजबूत बनाता है. वहीं महाबली सिंह सवर्ण और जेडीयू के अतिपिछड़े वोटर्स के सहारे हैं. बीएसपी ने इस सीट से स्थानीय उम्मीदवार अनिल सिंह यादव को टिकट देकर मुकाबले को रोचक बना दिया है.

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First published: May 4, 2019, 1:45 PM IST
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