करगिल विजय दिवस: 'एक तरफ साथियों को खोने का दर्द तो दूसरी ओर विजय का आनंद'

1999 में करगिल जंग मेरे लिए पहला युद्ध का अवसर था जिसे लेकर बेहद रोमांचित था. तब मैं जोधपुर में तैनात था. वहां से हमें अलग-अलग टुकड़ियों में बांट कर जैसलमेर भेजा गया.

News18 Bihar
Updated: July 26, 2019, 11:12 AM IST
करगिल विजय दिवस: 'एक तरफ साथियों को खोने का दर्द तो दूसरी ओर विजय का आनंद'
कारगिल युद्ध को स्मरण करते हुए कटिहार के सार्जेंट मोहम्मद जावेद आलम
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Updated: July 26, 2019, 11:12 AM IST
करगिल युद्ध को दो दशक पूरे हो चुके हैं. देश आज करगिल पर विजय की 20वीं वर्षगांठ मना रहा है. 1999 में आज ही के दिन भारत के वीर सपूतों ने कारगिल की चोटियों से पाकिस्तानी फौज को खदेड़कर तिरंगा फहराया था. हालांकि इस जंग में भारत ने अपने 527 सपूतों को खो दिया था जबकि 1363 जवान घायल हुए थे. इस युद्ध में बिहार के 16 सपूतों ने भी अपनी शहादत दी थी. हालांकि कई ऐसे भी हैं जो आज भी हमारे बीच मौजूद हैं. इन्हीं में से एक हैं कटिहार के वीर सुपूत एयर फ़ोर्स के सार्जेंट मोहम्मद जावेद आलम.

'अद्भुत अनुभव था वो'
जावेद उस समय कॉर्परल (स्ट्रेटजी प्लानिंग) में शामिल थे. न्यूज़18 से युद्ध को स्मरण करते हुए वो भावुक हो उठते हैं और कहते हैं, एक तरफ साथियों को खोने के दर्द तो दूसरी ओर दुश्मनों के दांत खट्टे कर उनपर विजय का आनंद, अद्भुत अनुभव था.

'बेहद रोमांचित था'

1995 में एयर फोर्स ज्वाइन करने वाले मोहम्द जावेद आलम कहते हैं, 1999 में करगिल जंग मेरे लिए पहला युद्ध का अवसर था जिसे लेकर बेहद रोमांचित था. तब मैं जोधपुर में तैनात था. वहां से हमें अलग-अलग टुकड़ियों में बांट कर जैसलमेर भेजा गया.

'राडार पर रखते थे नजर'
जावेद बताते हैं कि उन्हें और उनकी टीम को पाकिस्तानी रडार पर ध्यान रखने के निर्देश दिए गए थे. साथ ही कई अन्य रणनीतिक जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी. हालांकि इसका खुलासा वह आज भी नहीं करना चाहते हैं.
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सार्जेंट मोहम्मद जावेद आलम की 1999 की तस्वीर


'पीठ दिखाकर नहीं लौटता'
लगभग डेढ़ महीने चली इस जंग के दौरान उनके दिमाग मे क्या चलता था, इस पर सार्जेन्ट कहते हैं कि दिमाग में दिए गए टारगेट के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रहता था. इस दौरान घर से माता-पिता और भाइयों से दुश्मन से पीठ दिखा कर नहीं लौटने की नसीहत मिलती रही थी.

देश के लिए समर्पित परिवार
जावेद बताते हैं कि उनके दोनों भाई भी सेना में ही हैं. इसलिए पूरा परिवार माहौल से वाकिफ है. पिता हमेशा कहते थे देश के लिए ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है, इसलिए दुश्मनों को मात दे कर ही लौटना. जावेद एक बार फिर भावुक होते हुए कहते हैं, आज भी 26 जुलाई आते ही वो लम्हा खुद-ब-खुद याद आ जाता है.

फिलहाल सार्जेंट मोहम्मद जावेद अपनी पत्नी के साथ मिल कर स्कूल चलाते हैं. सीमांचल के इस सुदूर इलाके में बच्चों को भारतीय सेना के लिए प्रेरित करते हैं.

(रिपोर्ट- सुब्रत गुहा)

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First published: July 26, 2019, 8:47 AM IST
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