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कोजागरी लक्ष्मी पूजा: जानें बिहार-झारखंड के बंगाली समाज में क्यों है इस पर्व का खास महत्व

News18 Bihar
Updated: October 13, 2019, 1:35 PM IST
कोजागरी लक्ष्मी पूजा: जानें बिहार-झारखंड के बंगाली समाज में क्यों है इस पर्व का खास महत्व
बिहार के बंगाली बाहुल्य कटिहार में की गई लक्ष्मी पूजा की तैयारी

कोजागरी लक्ष्मी पूजा को लेकर मान्यता है कि इस दिन सोलह कलाओं से युक्त चंद्रमा से अमृत बरसता है, महिलाएं शाम ढलने के बाद पूजा-अर्चना करती हैं, छत और घर के आंगन पर माँ लक्ष्मी के स्वागत में अल्पना बनाकर गन्ना, खीर रखी जाती है

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कटिहार. बिहार-झारखंड के बंगाली समाज में कोजागरी लक्ष्मी पूजा का आयोजन किया जाता है. इस मौके पर घर-घर मे कोजागरी लक्ष्मी पूजा का आयोजन होता है. बिहार में खास कर बंगाली समुदाय में लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व है. पण्डित(पुरोहित)कृष्ण मोइत्रा कहते हैं कि 13 अक्तूबर को शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा से अमृत बरसने का योग है. पूर्णिमा और उत्तराभाद्र पद नक्षत्र के संयोग विशेष फलदायी होता है इस लिए आज घरों में मां लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व होता है.

छत पर खीर रखते हैं लोग

लोग आज के दिन छत पर रात भर खीर रखकर सुबह प्रसाद के रूप में भी बांटते हैं. मान्यता ये भी है कि शरद पूर्णिमा के साथ दीवाली की भी सूचना हो जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा में माता लक्ष्मी रात्रि में विचरण करती है और भक्तों पर धन-धान्य से पूर्ण करती है इस लिए रात भर जाग कर मां लक्ष्मी की पूजा करने की परम्परा है. रात भर होने के कारण इस पूजा को कोजागरी लक्ष्मी पूजा भी कहा जाता है.

इस विधि से होती है पूजा

पूजा के आयोजक देबश्री कहती हैं कि घी का दीपक जलाकर नारियल लड्डू, लावा और गुड़ (मीठा) से बनी मुर्खि के साथ साथ मां लक्ष्मी को प्रसन्न किया जाता है. इस अलावे खिचड़ी-फल प्रसाद भी चढ़ाने और वितरण की परम्परा है. सालों से लक्ष्मी पूजा करती आ रही नवनीता राय कहती हैं कि आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं. महारास की रात्रि शरद पूर्णिमा की महिमा का वर्णन प्राचीन धर्मग्रंथों में विभिन्न रूपों में किया गया है. इसी दिन से सर्दियों का आरंभ माना जाता है. आश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को चंद्रमा पृथ्वी के अधिक निकट होने से बलवान होता है.

घरों को सजाने की है परंपरा

चंद्रमा की किरणों की छटा धरती को दूधिया रोशनी से नहलाती है. इस छटा के बीच पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है. मान्यता है कि इस दिन सोलह कलाओं से युक्त चंद्रमा से अमृत बरसता है, महिलाएं शाम ढलने के बाद पूजा-अर्चना करती हैं, छत और घर के आंगन पर माँ लक्ष्मी के स्वागत में अल्पना बनाकर गन्ना, खीर रखी जाती है. यह भी मान्यता है कि रात में चांद की रोशनी में रखी गई खीर खाने से पित्त रोग से छुटकारा मिलता है.
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विज्ञान से भी है गहरा नाता

विज्ञान के जानकार प्रो.दिलीप कुमार कहते है की शरद पू्र्णिमा की रात को खुले आसमान के नीचे प्रसाद बनाकर रखने का वैज्ञान‍िक महत्व भी है. इस समय मौसम में तेजी से बदलाव हो रहा होता है, यानी मॉनसून का अंत और ठंड की शुरुआत,शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा धरती के बहुत नजदीक होता है,ऐसे में चंद्रमा से न‍िकलने वाली कि‍रणों में मौजूद रासायनिक तत्व सीधे धरती पर आकर ग‍िरते हैं, ज‍िससे इस रात रखे गये प्रसाद में चंद्रमा से न‍िकले लवण व विटामिन जैसे पोषक तत्‍व समाह‍ित हो जाते हैं.चावल में मौजूद स्टार्च इस प्रक्रिया और आसान बनाता है,ये स्‍वास्‍थ्‍य के ल‍िए बहुत फायदेमंद है, ऐसे में इस प्रसाद को दूसरे द‍िन खाली पेट ग्रहण करने से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है.

कुल मिलाकर कोजागरी लक्ष्मी पूजा का धार्मिक के साथ साथ वैज्ञानिक महत्व भी है और कटिहार के साथ साथ बिहार-झारखंड में में खास कर बंगाली बहुल समाज इसे बड़े ही धूम-धाम से मनाते हैं.

रिपोर्ट सुब्रत गुहा

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First published: October 13, 2019, 1:35 PM IST
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