जानिए किस नेता को यादवों जैसा ही बता कर लड़ा रहे थे लालू प्रसाद

बिहार की राजनीति में कितनी अहमियत है यादव जाति के वोटरों की

RajKumar Pandey | News18Hindi
Updated: May 15, 2019, 7:54 PM IST
जानिए किस नेता को यादवों जैसा ही बता कर लड़ा रहे थे लालू प्रसाद
लालू प्रसाद यादव. फाइल फोटो
RajKumar Pandey
RajKumar Pandey | News18Hindi
Updated: May 15, 2019, 7:54 PM IST
नेता कई बार वोटरों को जाति के जंजाल में फंसा देते हैं. मामला अगर बिहार का हो तो क्या कहने. एक दौर तक तो बिहार में कहा जाता था –‘जतिए जीती’. मतलब जाति वाला ही जीतेगा. ये अलग विमर्श है कि वर्ण-व्यवस्था के बोझ से दोहरे हुए समाज में दबे कुचले वर्ग को रीढ़ सीधी करने का मौका जातीय चेतना से ही मिला.

शायद बिहार में जातिगत समीकरणों का ही असर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राज्य में अपने चुनावी भाषण में श्रीकृष्ण का जिक्र करना पडा. बुधवार को पटना से सटे पालीगंज में उन्होंने बिहार के मतदाताओं को याद दिलाया कि मोदी का श्रीकृष्ण से क्या रिश्ता है.



मई '91 की कहानी

बहरहाल, बात चुनावों में जाति के असर की करनी हो तो इसकी भी लाजबाब मिसाल बिहार में ही मिलती है. किस्सा 1991 का है. मई का ही महीना भी था.

राष्ट्रीय फलक पर थे लालू

उस दौर में पार्टी जनता दल के नाम से ही थी. बिहार में लालू प्रसाद यादव पार्टी के ताकतवर क्षत्रप थे. राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर वे लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोक चुके थे. इस लिहाज से राष्ट्रीय राजनीति में भी लालू उभर चुके थे.

उसी दौर में उन्होंने ऐलान किया कि बिहार से वे कांग्रेस को एक भी सीट नहीं जीतने देंगे. इस दरम्यान राजनीति के भद्र पुरुष इंदर कुमार को एक अदद सीट की जरूरत लग रही थी. बात बन गई.यशवंत सिंहा को रोकना था

लालू उन्हें पटना सीट से लड़ाने के लिए ले आए. वैसे इस सीट यशवंत सिंहा ने भी इसी सीट से ताल ठोंक रखी थी. लालू प्रसाद सिंहा को किसी भी तरह से जीतने नहीं देना चाहते थे. जबकि सीट पर कायस्थ वोटर सबसे ज्यादा थे. थोड़े से दूसरे वोट पाने पर सिंहा चुनाव जीत जाते.

अपनी स्थिति को देखते हुए यशवंत सिंहा ने गुजराल के खिलाफ नारा दिया- अपने और बाहरी उम्मीदवार का. उनका संदेश था कि वे बिहार के है जबकि गुजराल बाहरी है. अपनी पहचान तलाशने वाले मतदाताओं को ये नारा ठीक लगने लगा.

'गुजर हैं, यादव ही होते हैं' 

फिर लालू प्रसाद तो अपने तौर के अनूठे हैं. उन्होंने नए तरीके से प्रचार शुरू किया. सभाओं में वे कहते – “गुजराल जी गुजर हैं.गुजर वैसी ही जाति होती है जैसे यादव.” इस तरह से वे यादव मतदाताओं को एकजुट करने में लग गए.

अपने नेता की बात वोटरों को ठीक लगी. उन्हें राजनीति में जेंटलमैन कहे जाने वाले इंद्र कुमार गुजराल अपने लगने लगे. मतदान भी हुए. लेकिन अनियमितताओं की शिकायतें कुछ ज्यादा थी.

शेषन थे, चुनाव ही रद्द कर दिया

उस वक्त चुनाव आयुक्त के तौर पर टीएन शेषन कुर्सी पर थे. अनियमितताओं पर उन्होंने रिपोर्ट तलब की और पटना का चुनाव रद्द कर दिया. इस लिहाज से ये तो पता नहीं चल सका कि पटना से कौन जीता, लेकिन फिर से गुजराल पटना लड़ने के लिए नहीं आए.

फिर राज्य सभा टिकट दिया

बाद में लालू प्रसाद यादव ने उन्हें राज्य सभा के लिए प्रत्याशी बनाया. हालांकि उसकी कहानी भी रोचक है. उस वक्त लालू प्रसाद यादव ने उन्हें सूची में आखिरी प्रत्याशी के तौर पर नामित किया. यानी उस प्रत्याशी के तौर पर जिसे जीतने के लिए बाहर से भी वोट का इंतजाम करना होता. पत्रकार अमर नाथ झा याद करते हैं –“इस बात पर गुजराल बहुत नाराज हुए थे. उन्होंने यहां तक कह दिया था कि उनका इतना अपमान संजय गांधी ने भी नहीं किया था.”

दरअसल गुजराल साहब आपातकाल में केंद्र में सूचना मंत्री थे. लेकिन उन्होंने संजय गांधी की कुछ बातों को मानने से इनकार कर दिया था. इसकी वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. हालांकि उन्हें रूस का राजदूत बना दिया गया था.

बहरहाल, बाद में लालू प्रसाद ने अन्य वोटों का भी इंतजाम किया और इंद्र कुमार गुजराल राज्य सभा पहुंच गए.

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