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जेएनयू के ज्योति मंडल मछली पालन से बदल रहे हैं मधेपुरा के हालात

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साइंस कॉलेज से स्नातक करने वाले ज्योति मंडल दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) से आगे की पढ़ाई की. नौकरी के बजाए उन्होंने मधेपुरा के बखरी गांव को चुना, जहां वो मछली पालन में लग गए.

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पान, माछ और मखान मिथिला और कोशी की पहचान रही है. लेकिन चिंता की बात यह है कि बढ़ती आबादी के कारण यहां के लोग भी बंगाल और आंध्रप्रदेश के मछलियों पर निर्भर होते चले गए हैं. इस निर्भरता को खत्म करने का बीड़ा उठाया है मधेपुरा के एक शिक्षित और प्रगतिशील किसान ज्योति मंडल ने.

साइंस कॉलेज से स्नातक करने वाले ज्योति मंडल दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) से आगे की पढ़ाई की. नौकरी के बजाए उन्होंने मधेपुरा के बखरी गांव को चुना, जहां वो मछली पालन में लग गए. उनके तालाब में फंगेसियस प्रजाति की मछलियां मिलती हैं, जिसका उत्पादन अधिकतर आंध्रप्रदेश में होता है.

ज्योति मंडल दावा करते हैं कि यदि सही तरीके से मछली की खेती की जाय तो प्रति एकड़ जलभूमि में किसान 10 लाख से 1 करोड़ रुपए प्रति वर्ष तक कमा सकता है. ज्योति मंडल की माने तो सरकार के तरफ से मछली पालन में कोई सहयोग नहीं मिल रहा, यदि सरकार सहयोग करे तो कोसी और मिथिला के किसान का भाग्य ही बदल जाएगा.

ज्योति मंडल के पास 15 एकड़ का जलभूमि है, जिसमें वे मछली पालन करते हैं. आसपास के किसान भी उनसे मछली पालन का गुढ़ सीखने आते हैं.

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