इंसेफेलाइटिस के कहर से बच्चों की टूटती रही सांसें, लेकिन नेताओं की राजनीति के बदलते रहे रंग!

मुजफ्फरपुर में जब बच्चों की मौत का सिलसिला शुरु हुआ और आंकडा 20 तक पहुंचा, तब तक तो सरकार यह मानने के लिए ही तैयार नहीं थी कि AES ने अपना पांव पसार दिया है.

Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: June 20, 2019, 5:08 PM IST
इंसेफेलाइटिस के कहर से बच्चों की टूटती रही सांसें, लेकिन नेताओं की राजनीति के बदलते रहे रंग!
बिहार में इंसेफेलाइटिस से अब तक 150 से अधिक मौतें हो चुकी हैं.
Deepak Priyadarshi
Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: June 20, 2019, 5:08 PM IST
मुजफ्फरपुर सहित बिहार के कई जिलों में इक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानि AES का महाकहर है और दम तोडती मासूमों की जिदंगी से इस समय पूरा बिहार सिहर रहा है. ऐसे में बिहार की राजनीति और नेताओं के अलग-अलग रंग भी सामने आए हैं. केन्द्र से लेकर बिहार के नेताओं ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि मामला चाहे जिंदगियों से ही जुड़ा हुआ क्यों न हो करनी तो सिर्फ राजनीति ही है. राजनीति में संवेदनाओं के लिए कोई स्थान नहीं है.

मुजफ्फरपुर में जब बच्चों की मौत का सिलसिला शुरु हुआ और आंकडा 20 तक पहुंचा, तब तक तो सरकार यह मानने के लिए ही तैयार नहीं थी कि AES ने अपना पांव पसार दिया है. स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे ने खुद इसका खंडन किया कि AES से बीस बच्चों की मौत हो गयी. उनका तर्क था कि सिर्फ एक बच्चे की मौत AES से हुई है जबकि बाकी बच्चों की मौत हाइपोग्लाइसीमिया से हुई है, लेकिन जब न्यूज़ 18 ने जिला मलेरिया कार्यालय की रिपोर्ट दिखाई, जिसमें कहा गया था कि AES ग्रुप ऑफ डिजीज है और हाइपोग्लाइसीमिया AES का पार्ट है. ऐसे में बच्चों की मौत AES से हुई हैं, तब स्वास्थ्य विभाग ने माना कि हालात गंभीर हो रहे हैं.

जब डॉ. हर्षवर्धन का दौरा हुआ रद्द
उसके बाद केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे का दौरा तय हुआ, लेकिन फिर यह कहते हुए यह रद्द हो गया कि पहले स्वास्थ्य मंत्रालय के विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम दौरा करेगी. इसके बाद वह अपनी रिपोर्ट देगी और फिर यह केन्द्रीय मंत्रियों का दौरा होगा. तब तक मरने वाले बच्चों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी. डॉक्टरों की टीम आयी और दो दिन जांच करके चली गयी. इसके बाद बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे ने अस्पताल का दौरा किया और वहां भर्ती बच्‍चों का हालचाल जाना. हालांकि इसका कोई फायदा नहीं हुआ और बच्चों की मौत का सिसलसिला बढ़ता रहा.

केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन.


आखिर बिहार आए केन्‍द्रीय मंत्री

इस बीच केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे बिहार आए और उन्होंने यह बयान दे दिया कि चूंकि अधिकारी पिछले दिनों चुनाव में व्यस्त थे, इसलिए जागरुकता अभियान नहीं चलाया जा सका. यह बयान इस मायने में बेहद अजीबोगरीब है कि चुनाव अपनी जगह पर है, लेकिन एक ऐसी बीमारी जो हर वर्ष कहर बरपाती है, उसके प्रति स्वास्थ्य विभाग ने अपनी आंखें मूंद ली? इस बीच वे बक्सर और भागलपुर गए, लेकिन मुजफ्फरपुर जाने की जहमत नहीं उठायी. वे तब तक मुजफ्फरपुर नहीं गए जब तक केन्द्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन नहीं आए. बहरहाल, बच्चों की मौत का सिलसिला चलता रहा.
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हर्षवर्धन ने की कई घोषणाएं
केन्‍द्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन जब मुजफ्फरपुर आए तब उन्होंने इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर कई घोषणाएं की, लेकिन सभी घोषणाएं वहीं थी जो 2014 में भी की गई थी. पेडियट्रिक्स आईसीयू को 100 बेड करने और 5 वायरोलॉजिकल लैब बनाने को लेकर. सवाल यह है कि अगर नीयत साफ थी तो पांच वर्ष पहले क्यों नहीं बनाया. अब संवेदनहीनता की इंतहां देखिए कि जब केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री घोषणाओं की झडी लगा रहे थे, तब केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री नींद ले रहे थे. जहां अपने बच्चों की सांसों को टूटता देख माता-पिता के मुंह से चीत्कार निकल रही है, वहां पर कौन कैसे सो सकता है.

उसके बाद जब हर्षवर्धन स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक के लिए बैठे तो बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे तो बच्चों की मौत का स्कोर जानने से अधिक भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच का स्कोर जानने ने ज्यादा दिलचस्पी थी.

नेताओं के रंग के अलग-अलग

नेताओं के रंग के अलग-अलग नमूना दो और देखिए. पहले मुजफ्फपुर के विधायक और सरकार में मंत्री सुरेश शर्मा ने कहा कि अस्पताल में सुविधाओं में कमी है, लेकिन मंत्री जी यह किसे सुना रहे हैं जबकि वे खुद सरकार हैं. क्या उनके क्षेत्र में ये महामारी हर वर्ष रहती है, इसका अंदाजा उन्हें नहीं था? और क्या उनका फर्ज नहीं बनता था कि वे स्वास्थ्य विभाग पर दबाव बनाकर इन कमियों को दूर करते?

सांसद अजय निषाद ने बताया 4G को जिम्‍मेदार
जबकि मुजफ्फरपुर के सांसद अजय निषाद ने इन सबके लिए 4G को जिम्मेवार ठहरा दिया. गरीबी, गंदगी,...आप सांसद थे और फिर हैं. जनता की समस्‍या के निदान के लिए आपने क्या किया?

बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार को करना पड़ा विरोध का सामना.


बात मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार की

अब बात मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की करते हैं. जैसे-जैसे बच्चों की मौत की संख्या बढ़ती जा रही थी वैसे-वैसे हर किसी की निगाहें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ढूंढ रही थी कि कब वे आएंगे जिंदगी और मौत से जूझ रहे मासूम बच्चों का हाल चाल लेने, लेकिन सीएम पहले दिल्ली गए और फिर वहां दो तीन दिनों तक रुक कर राजनीति के सारे काम किये. इसके बाद पटना आकर अधिकारियों के साथ मीटिंग की और फिर मुजफ्फरपुर गए, लेकिन तब तक बच्चों की मौत का आंकड़ा सौ के पार जा चुका था. वे चुपचाप वहां गए और चुपचाप वहां से निकल गए. उनके साथ डिप्टी सीएम सुशील मोदी भी थे, लेकिन वे भी चुप थे. लोगों में आक्रोश था, कई सवाल थे, लेकिन उन सवालों पर मौन साधे हुए कुछ घंटों में मुजफ्फरपुर से पटना लौट गए.

अब सवाल यह है कि इलाज और जागरुकता के अभाव में मरते हुए बच्चों के बीच नेताओं का दौरा किस काम का. क्या एक भी नेता के दौरे ने बच्चों की टूटती हुई सांसों को थाम लिया? फिर इतने दौरे से बेहतर तो यह होता कि अस्पताल में सुविधाएं मुहैया कराई गयी होती तो न बच्चों की मौतें होती और न ही नेताओं को दौरा करने का जहमत उठानी पड़ती.

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First published: June 20, 2019, 4:00 PM IST
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