बिहार के इस घाट पर माता सीता ने किया था पहला छठ पूजन

छठ पर्व बिहार में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है. लेकिन धार्मिक मान्यता के अनुसार माता सीता ने पहला छठ पूजन बिहार के मुंगेर में गंगा तट पर संपन्न किया था. इसके प्रमाण-स्वरूप आज भी माता सीता के चरण चिह्न मौजूद हैं.

ETV Bihar/Jharkhand
Updated: October 25, 2017, 12:07 PM IST
बिहार के इस घाट पर माता सीता ने किया था पहला छठ पूजन
न्यूज18हिंदी
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Updated: October 25, 2017, 12:07 PM IST
छठ पर्व बिहार में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है. लेकिन धार्मिक मान्यता के अनुसार माता सीता ने पहला छठ पूजन बिहार के मुंगेर में गंगा तट पर संपन्न किया था. इसके प्रमाण-स्वरूप यहां आज भी माता सीता के चरण चिह्न मौजूद हैं.

आनंद रामायण के अनुसार मुंगेर जिला के बबुआ घाट से तीन किलोमीटर गंगा के बीच में पर्वत पर ऋषि मुद्गल के आश्रम में मां सीता ने छठ पूजन किया था. जहां मां सीता ने छठ किया था वह स्थान वर्तमान में सीता चरण मंदिर के नाम से जाना जाता है. जो आज भी मां सीता के छठ पर्व की कहानी को दोहराता है.

हिंदू मान्यताओं के मुताबिक वनवास पूरा करने के बाद जब प्रभु राम अयोध्या वापस लौटे, तो उन्होंने रामराज्य के लिए राजसूर्य यज्ञ करने का निर्णय लिया. यज्ञ शुरू करने से पहले उन्हें वाल्मीकि ऋषि ने कहा कि मुद्गल ऋषि के आये बिना यह राजसूर्य यज्ञ सफल नहीं हो सकता है.

इसके बाद ही श्रीराम सीता माता सहित मुद्गल ऋषि के आश्रम पहुंचे. जहां मुद्गल ऋषि ने ही माता सीता को यह सलाह दी थी कि वह छठ व्रत पूरा करें.वहीं पंडित कौशल किशोर पाठक ने बताया की रावण एक ब्राम्हण था इसलिए राम को ब्रह्म हत्या का पाप लगा.

इस ब्रह्म हत्या के पापमुक्ति के लिए अयोध्या के कुलगुरु मुनि वशिष्ठ ने मुगदलपुरी (वर्तमान में मुंगेर) में ऋषि मुद्गल के पास राम सीता को भेजा. भगवान राम को ऋषि मुद्गल ने वर्तमान कष्टहरणी घाट में ब्रह्महत्या मुक्ति यज्ञ करवाया और माता सीता को अपने आश्रम में ही रहने का आदेश दिया.

चूंकि महिलाएं यज्ञ में भाग नहीं ले सकती थी. इसलिए माता सीता ने ऋषि मुद्गल के आश्रम में रहकर ही उनके निर्देश पर षष्ठी व्रत किया. सूर्य उपासना के दौरान मां सीता ने अस्ताचलगामी सूर्य को पश्चिम दिशा की ओर और उदीयमान सूर्य को पूरब दिशा की ओर अर्घ्य दिया था. आज भी मंदिर के गर्भ गृह में पश्चिम और पूरब दिशा की ओर माता सीता के पैरों के निशान मौजूद है.
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