Independence day: गुलामी का कालखंड याद कर डबडबा जाती हैं इस स्वतंत्रता के नायक की आंखें
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Independence day: गुलामी का कालखंड याद कर डबडबा जाती हैं इस स्वतंत्रता के नायक की आंखें
स्वतंत्रता सेनानी त्रिवेणी प्रसाद सिंह.

भारत आज 74वां स्वतंत्रता दिवस (Independence day) मना रहा है. आज ही के दिन 15 अगस्त को अंग्रेंजों की हुकूमत से भारत की आजादी का ऐलान किया गया था.

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मुंगेर. 'तुमने दिया राष्ट्र को जीवन, राष्ट्र तुम्हें क्या देगा, अपनी आग तेज रखने को, नाम तुम्हारा लेगा.'
जब भी 15 अगस्त आता है तो स्वतंत्रता दिवस (Independence day) की वह खुशी की लहर हर भारतीय की आंखों में दौड़ती है. जब अंग्रेजों की शासन था तब हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों का सामना किया. सदियों तक प्रताड़ना सहने के बाद  लाखों देशभक्तों के बलिदान (Sacrifice of patriots) की बदौलत आज हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं. आज भी कई ऐसे स्वतंत्रता सेनानी (freedom fighter) हैं जो अपनी जीवनी सुनाते हैं कि कैसे उन्होंने अंग्रेजों से लड़ा और उन्हें भारत छोड़ने पर विवश किया. इसके साथ ही वह पीड़ा भी जाहिर हो जाती है जो गुलामी के कालखंड में हमारे पूर्वजों ने झेली.

त्रिवेणी प्रसाद सिंह मुंगेर के संग्रामपुर प्रखण्ड के झिकुली ग्राम के निवासी हैं. इनका जन्म 1924 में हुआ था. ये बताते हैं कि जब हम पैदा हुए तो अंग्रेजों का ही शाशन था. अंग्रेज बहुत ही क्रूर थे और वो लोग पुरुषो  को परेशान तो करते ही थे साथ ही घर की महिलाओं और छोटे-छोटे बच्चों को भी काफी प्रताड़ित करते थे. गांव में जब भी अंग्रेजों के आने की सूचना मिलती थी तो हम लोग अपनी घर के  बच्चे-महिलाओं को दूर पहाड़ के पीछे छिपे देते थे.

उन्होंने बताया कि तब उनका क्षेत्र थाना बांका के बेलहर के अधीन आता था जो अंग्रेजों के शासन में चल रहा था. वे बताते हैं कि उनलोगों ने उस थाने को जला कर अंग्रेजों को खदेड़ दिया था. वहीं हम सभी साथियों ने शराब नहीं पीने को लेकर जागरूकता आंदोलन भी चलाया था.
उन्होंने कहा उस समय न स्कूल होता था न कोई पढ़ाई कर पाता था जिस कारण अधिकतर  लोग अनपढ़ रह गये. गरीबी में जीते हुए भी उन्हें इसका गम नहीं क्योंकि वे आजाद भारत में रह रहे हैं. वे कहते हैं कि मेरी यही ख़्वाहिश है कि इस भारत मे शांति बनी रहे और आपस में मतभेद न हो. यदि किसी भी तरह की घटना हो गयी आपस मे कहासुनी हो जाये तो उसे आपस में ही सुलझा लें थाना जाने की जरूरत ना पड़े.



त्रिवेणी सिंह के छोटे बेटे अरुण सिंह कहते हैं कि पिताजी बड़े पापा लोग सुनाते हैं कि अंग्रेजों ने पिताजी दादा- दादी और भी समाज की लोगों को बहुत मारता था प्रताड़ित किया जाता था जो कि सुनकर काफी दुख का एहसास होता है.
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