बिहार में चमकी बुखार से 60 बच्चों की मौत, 20 साल की कवायद हुई फेल!

एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी एईएस से अब तक अकेले मुजफ्फरपुर में 45 बच्‍चों की मौत हो चुकी है, लेकिन इस बीमारी का डॉक्‍टर और शोधकर्ता समाधान नहीं निकाल सके हैं.

News18 Bihar
Updated: June 14, 2019, 10:55 AM IST
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Updated: June 14, 2019, 10:55 AM IST
बिहार के मुजफ्फरपुर में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी AES से अब तक 45 बच्‍चों की मौत हो चुकी है. पूरे राज्य में अब तक करीब 60 बच्चों की जान जा चुकी है.  लेकिन नीतीश सरकार इसका समाधान ढूंढने में पूरी तरह नाकाम नजर आ रही है. इस बीमारी को राज्य में आम बोल चाल की भाषा में चमकी बुखार भी कहा जाता है.

अगर इसके व्‍यापक असर की बात करें तो पिछले कुछ सालों में मुजफ्फरपुर और आस-पास के जिलों में इंसेफेलाइटिस एक हजार से ज्यादा बच्चों की जान ले चुका है. सच कहा जाए तो करीब दो दशक से कहर बरपा रही इस बीमारी पर देश और विदेश की कई संस्थाओं नें शोध किया. लेकिन आज भी यह बीमारी रहस्यमयी बनी हुई है. हालात ऐसे हैं कि इस बीमारी से पीड़ित बच्चों के लक्षणों का इलाज किया जाता है न कि बीमारी का. हालांकि दुर्भाग्य की बात है कि देश भर में हाय तौबा मचाने वाली इस बीमारी पर शोध कार्य ठप पड़ गया है.



पहली बार 1996 में मिले बीमारी के लक्षण
इस बीमारी पर बीस साल से रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकार बताते हैं कि सन 1996 में पहली बार इस लक्षण से पीड़ित बच्चे एसकेएमसीएच आए थे. जबकि 2000 के बाद यह बीमारी भयावह होने लगी और 2010 आते आते यह बीमारी राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गई. क्योंकि न बीमारी समझ आ रही थी और न उसका इलाज. इसे देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों ने इस पर शोध कराना शुरू किया. एसकेएमसीएच के शिशु रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. गोपाल सहनी बताते हैं कि दिल्ली से लेकर अमेरिका तक की संस्थाओं ने महीनों यहां रहकर शोध कार्य किया, लेकिन कोई ठोस नतीजे पर नही पहुंच सकी.

ये संस्‍थाए कर चुकी हैं शोध
इंसेफेलाइटिस को लेकर कई संस्थाओं ने मुजफ्फरपुर में रिसर्च वर्क किया है, जिनमें नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी,(एनआईवी) पूना, नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल,(एनसीडीसी) नई दिल्ली, सेंट्रल फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) अटलांटा यूएसए, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिकेबल डिजीज (एनआईसीडी) नई दिल्ली और राजेंद्र मेमोरियल रिसर्च इंस्टीच्यूट (आरएमआरई) पटना, लेकिन दुर्भाग्य है कि सारे शोध कार्य बंद हो गए. जबकि आज आरएमआरआई पटना में बीमार बच्चों का ब्लड सीरम भेजकर रिसर्च की खानापूर्ति हो रही है.

इस बीमारी को स्वास्थ्य विभाग कितना समझ पाया है और शोध की दिशा में फिलहाल क्या हो रहा है इसे समझने के लिए हमने सबसे पहले शिशु रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. गोपाल सहनी से संपर्क किया. उनसे हुई बात के मुताबिक इस बीमारी पर अभी गहन शोध की जरूरत है, लेकिन फिलहाल कोई काम धरातल पर नही दिख रहा है.
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शाही ने दिया ये जवाब
जबकि एसकेएमसीएच के अधीक्षक डॉ. एसके शाही ने भी माना कि रिसर्च वर्क के आधार पर बीमारी का ठोस इलाज निकाला जा सकता है. सरकारी कुर्सी से बंधे अधीक्षक महोदय ने खुलकर कुछ नहीं कहा पर दबी जुबान में स्वीकार किया कि फिलहाल शोध कार्य नही हो रहा है.

ये बोले श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य
आखिर में न्‍यूज़ 18 की टीम ने श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. विकास कुमार से बातचीत की. प्राचार्य ने बताया कि इस बीमारी पर शोध के लिए केंद्र सरकार की पहल पर कॉलेज में रिसर्च सेंटर स्थापित हो गया है. क्योंकि बीमारी के रहस्य से पर्दा उठाने के लिए रिसर्च ही एक मात्र रास्ता है, लेकिन रिसर्च हो रही या नहीं इस सवाल को वह भी टाल गए. उन्होंने कहा, 'रिसर्च सेंटर को चालू करने के लिए आवश्यक उपकरण लग गए हैं और टेक्नीशियन की बहाली हो गई है. जल्द ही काम शुरू हो जाएगा. हालांकि न्‍यूज़18 की टीम जब रिसर्च सेंटर गई तो वो बंद मिला. साफ है कि हर कोई खानापूर्ति में लगा हुआ है.

कुल मिलाकर न्यूज18 की ग्राउंड रिपोर्टिंग में यह पता चला कि बीमारी को लेकर रहस्य बरकरार है, लेकिन उस से पर्दा उठाने के लिए कोई शोध कार्य फिलहाल नहीं हो रहा है. अब सबकी नजरें सात सदस्यीय सेंट्रल टीम पर हैं जो दिल्ली से आई थी. यह टीम भी दो दिन बाद लौट चुकी है और अब देखना है कि एक हजार से ज्यादा बच्चों की जान जाने के बाद भी बीमारी का रहस्य और इलाज जानने की दिशा में क्या कदम उठाए जाते हैं.

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