बिहार में चमकी बुखार से निबटने के लिए स्वास्थ्य तंत्र कितना सक्षम कितना नाकाम?

बिहार में डॉक्टरों की कमी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया में बिहार में डॉक्टरों की संख्या का जो रजिस्ट्रेशन है उसकी संख्या मात्र 50 हजार है, जबकि राज्य में जरूरत के हिसाब से 1 लाख 30 हजार डॉक्टर होने चाहिए.

Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: June 21, 2019, 11:34 AM IST
बिहार में चमकी बुखार से निबटने के लिए स्वास्थ्य तंत्र कितना सक्षम कितना नाकाम?
बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था का हाल देश में सबसे बुरा है
Ravishankar Singh
Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: June 21, 2019, 11:34 AM IST
बिहार के मुजफ्फरपुर सहित कुछ जिलों में चमकी बुखार से नौनिहालों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) यानी चमकी बुखार से अब तक बिहार भर में 156 बच्चों की मौत हो चुकी है. वैसे तो पिछले कई वर्षों से राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार की तरफ से इस बीमारी को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन आज तक इस बीमारी पर काबू नहीं किया जा सका है.

हर साल लीची के मौसम में मासूमों की मौत होती है और सरकारी दावे खोखले साबित होते हैं. केंद्र से लेकर राज्य सरकार की कई टीमें हर साल मुजफ्फरपुर और उसके आसपास के जिलों में पहुंचती है और कुछ खानापूर्ति के बाद मामला रफा-दफा कर दिया जाता है.

केंद्र और बिहार सरकार के रवैये पर सवाल खड़े हो रहे हैं

इस बार भी मुजफ्फरपुर और आस-पास के जिलों में हो रही मौतों के बाद केंद्र और बिहार सरकार के रवैये पर सवाल खड़े होने लगे हैं. इस साल मौत का आंकड़ा ज्यादा हो गया तो मीडिया में कोहराम मचा हुआ है. वहीं सुरसा की तरह बच्चों को लीलती जा रही बीमारी पर राज्य और केंद्र सरकार दोनों खामोश नजर आ रही हैं.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम सुशील मोदी मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच अस्पताल का दौरा करते हुए


नेताओं और मंत्रियों का मुजफ्फरपुर दौरा लगातार हो रहा है. आश्वासन और समाधान की बातें खूब हो रही हैं, लेकिन मौत का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि इस क्षेत्र में रहने वाले मासूमों की सांसें छिनने का सिलसिला आखिर कब थमेगा? बिहार की त्रासदी बन चुका चमकी बुखार आखिर खत्म कैसे होगा? देश में 2014 में इंसेफेलाइटिस खत्म करने के लिए एक राष्ट्रीय प्रोग्राम बना था, उस प्रोग्राम पर आज तक काम क्यों नहीं शुरू हुआ?

मेडिकल रिपोर्ट्स में कच्ची और अधपकी लीची खाने से मौत का दावा!
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बता दें कि कुछ मेडिकल रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि कच्ची और अधपकी लीची खाने से यह बीमारी हो रही है. कुछ जानकारों का मानना है कि इस बीमारी के चपेट में सबसे ज्यादा गरीब बच्चे आ रहे हैं. बीमारी का पता चलने के 120 मिनट के अंदर इलाज जरूरी है. अगर तय समय के अंदर इलाज नहीं शुरू किया गया तो बच्चे के बचने का चांस ज्यादा नहीं रहता है.

मुजफ्फरपुर के सबसे बड़े अस्पताल एसकेएमसीएच के मेडिकल सुपरिडेंट सुनील शाही न्यूज़18 हिंदी के साथ बातचीत में कहते हैं, ‘पिछले 10-15 दिन से हमलोग लगातार अस्पताल में डटे हुए हैं. शुक्रवार सुबह तक एसकेएमसीएच में 102 बच्चों की मौत हो चुकी है. 162 बच्चे अस्पताल में इलाज करा कर घर लौट चुके हैं. 94 और बच्चे को शुक्रवार से शनिवार तक डिस्चार्ज कर दिया जाएगा. एसकेएमसीएच में इस समय एम्स, राम मनोहर लोहिया अस्पताल, पीएमसीएच, एनएमसीएच और डीएमसीएच के डॉक्टर कैंप कर रहे हैं. अभी भी मरीजों का आना बंद नहीं हुआ है. जब बच्चा बुखार से पीड़ित होकर हमारे पास आता है तो मेरे पास उसके जान बचाने के लिए सिर्फ 120 मिनट ही होते हैं. इस दौरान आप कह सकते हैं कि इलाज और चमत्कार दोनों पर भरोसा रखना पड़ता है.'

बिहार में चमकी बुखार से मौत का सिलसिला लगातार जारी है


डॉ. शाही आगे कहते हैं, 'इस बार बच्चों की मौत इसलिए ज्यादा हो रही है क्योंकि बच्चे हमारे पास सही समय पर नहीं पहुंच रहे हैं. जो बच्चे हमारे पास आ रहे हैं वह अचेत स्थिति में होते हैं. उन बच्चों को जल्दी अस्पताल लाया जाना चाहिए. इस बीमारी को लेकर लोगों में जागरुकता भी फैलानी चाहिए कि इस बीमारी का लक्षण आने पर सीधे बड़े अस्पताल में पहुंचे. पूरे तिरहुत प्रमंडल के मरीज एसकेएमसीएच पहुंच रहे हैं. ये लोग दूर-दारज के रहने वाले हैं इसलिए ठीक समय पर उनको इलाज नहीं मिल पा रहा है. शहर से काफी दूर होने के कारण उन बच्चों के लिए डॉक्टरों और अस्पतालों की सुविधा नहीं है या फिर बेहतर नहीं है.’

बिहार में डॉक्टरों की घोर कमी

बता दें कि बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ के मुताबिक बिहार में सरकारी और प्राइवेट डॉक्टरों की कुल संख्या लगभग 30 हजार के आसपास है. इसमे लगभग 6 हजार के आसपास सरकारी और शेष प्राइवेट डॉक्टर हैं. बिहार में डॉक्टरों की कमी कितनी है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) में बिहार में डॉक्टरों की संख्या का जो रजिस्ट्रेशन है उसकी संख्या मात्र 50 हजार है, जबकि राज्य में जरूरत के हिसाब से 1 लाख 30 हजार डॉक्टर होने चाहिए.

बिहार में ब्लॉक स्तर पर अस्पतालों की संख्या 534 है. रेफरल अस्पतालों की संख्या 211 और अनुमंडल अस्पतालों की संख्या 80 है. जिला अस्पतालों की संख्या 30 है. विशेष अस्पतालों की संख्या 20-25 है. एडिशनल पीएचसी अस्पतालों की संख्या 1500 है. सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल भी मात्र 9 हैं.

1995 में पहली बार चमकी बुखार बिहार में दस्तक दिया था


साल 2012 में भी इस बीमारी ने भयावह रूप लिया था. तब 300 से अधिक बच्चे बीमार पड़े थे. इनमें से 120 बच्चों की मौत हो गई थी. एक साथ इतनी मौतों ने बिहार और केंद्र सरकार को बेचैन कर दिया था. हालांकि, अगले एक-दो वर्षों तक मौत का सिलसिला कुछ थमा था, लेकिन 2014 में एक बार फिर से मौत की संख्या डराने वाली रही. साल 2014 में इस बीमारी से 342 बच्चे एसकेएमसीएच में भर्ती हुए थे, जिसमें से 86 बच्चों की मौत हो गई.

बिहार में यह बुखार वर्ष 1995 में पहली बार सामने आया था. अब बिहार समेत देश के लगभग 18 राज्यों में यह बुखार फैल चुका है. यह बीमारी किस वायरस से फैलता है इसका पता आज तक नहीं लग पाया है. सवाल उठते हैं कि अगर लीची को इस बीमारी का कारण माना जा रहा है तो आज तक देश के विभिन्न हिस्सों में लीची खाने वाले बच्चों को यह बीमारी क्यों नहीं हो रही है?

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First published: June 21, 2019, 10:43 AM IST
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