इंसेफेलाइटिस से हो रही मौत के लिए लीची यूं ही हो रही बदनाम!

'देश में लीची उत्पादन का सिर्फ 10 प्रतिशत ही मुजफ्फरपुर में होता है. 90 प्रतिशत लीची मुजफ्फपुर के बाहर होता है तो क्यों नहीं वहां पर बच्चे मर रहे हैं?'

Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: June 22, 2019, 6:43 PM IST
इंसेफेलाइटिस से हो रही मौत के लिए लीची यूं ही हो रही बदनाम!
बिहार के मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत के लिए लीची को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है!
Ravishankar Singh
Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: June 22, 2019, 6:43 PM IST
बिहार के मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से हो रही मौत को लेकर लीची को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. शुक्रवार को लोकसभा में भी यह मुद्दा उठा. बीजेपी के सांसद राजीव प्रताप रुडी ने कहा कि मुजफ्फरपुर में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम से हो रही बच्चों की मौत के मामले में लीची को जिम्मेदार ठहराना कहीं इस फल को बदनाम करने की साजिश तो नहीं है? मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से बच्चों की मौत को लीची खाने से जोड़ना कहीं लीची उत्पादक किसानों के हितों को नुकसान पहुंचाने का षड्यंत्र तो नहीं है?

बिहार के मुजफ्फरपुर और आस-पास के जिलों में इंसेफेलाइटिस से अब तक 170 से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है. बिहार सरकार ने भी बच्चों की मौत के मद्देनजर लीची से संबंध होने की जांच के आदेश दे दिए हैं. कुछ मेडिकल रिपोर्ट्स के हवाले से कहा जा रहा है कि चमकी बुखार सामान्य तौर पर गर्मी के मौसम में लीची की फसल की दौरान ही होता है. इस बीमारी का कहीं न कहीं से लीची से संबंध है?

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम सुशील मोदी मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच अस्पताल का दौरा करते हुए


इस बीमारी के कारणों को लेकर न्यूज 18 हिंदी ने कई विशेषज्ञों से बात की. सभी विशेषज्ञों की राय इस बीमारी को लेकर अलग-अलग थी. कृषि लागत और मूल्य आयोग(CACP) के पूर्व अध्यक्ष और जाने-माने कृषि वैज्ञानिक तजामुल हक न्यूज 18 हिंदी के साथ बातचीत में कहते हैं, ‘देखिए लीची कोई नई फसल तो नहीं है, जिसे बच्चों की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. वर्षों से देश ही नहीं विदेशों में भी मुजफ्फरपुर की लीची फेमस है. दिल्ली में भी मुजफ्फरपुर का लीची आती है, क्यों नहीं यहां पर भी बच्चों को इंसेफेलाटिस हो जाता है? लीची को बर्बाद और बदनाम करने की यह साजिश है. इतिहास को खंगालने से भी कहीं नहीं पता चलता है कि लीची इस बीमारी के लिए जिम्मेदार है? हां, मैं कह सकता हूं कि समय से पहले लीची को पकाने के लिए कुछ केमिकल्स इस्तेमाल किए जा जाते हैं, उससे थोड़ा नुकसान हो सकता है, लेकिन इतने बच्चों की मौत का कारण तो कुछ और ही नजर आ रहा है. जिसे पता लगाने की जरूरत है.’

AES से हो रही मौत का कारण लीची नहीं तो क्या

मुजफ्फरपुर स्थित राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र (एनआरसीएल) के निदेशक विशाल नाथ न्यूज 18 हिंदी से बातचीत में कहते हैं, 'यदि एक्यूट एंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) का संबंध लीची खाने से होता तो जनवरी, फरवरी महीने में यह बीमारी नहीं होती. मुजफ्फरपुर में जो पहला केस इस बीमारी को लेकर सामने आया वह जनवरी महीने में. मैं आपको बताना चाहता हूं कि बच्चे की हो रही मौत पूरी तरह से एनवायरमेंटल है. मुजफ्फरपुर में ज्यादातर उन बच्चों की मौत हुई है, जिनकी उम्र 0 से 4 साल की है. 4 साल तक का बच्चा कितना लीची खाएगा? सच्चाई यह है कि इस बीमारी का लीची से कोई संबंध नहीं है. मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूं कि अभी तक कोई भी ऐसा शोध इस बीमारी पर नहीं हुआ है, जो लीची को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा सके.'

1995 में पहली बार चमकी बुखार बिहार में दस्तक दिया था

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वहीं चमकी बुखार (एईएस) पीड़ित बच्चों का इलाज कर रहे एसकेएमसीएच के अधीक्षक डॉ सुनील शाही न्यूज 18 हिंदी के साथ बातचीत में कहते हैं, ‘अभी तक के शोध में बीमारी के कारणों में लीची फैक्टर नहीं आया है. इसे महज एक भ्रांति  मान कर लीची को बदनाम किया जा रहा है.’

कुछ मेडिकल रिपोर्ट्स में लीची को संदिग्ध माना गया है!

बता दें कि साल 2013 में नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) और यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने इस मामले की एक जांच की थी. जांच से यह बात सामने आई थी कि खाली पेट लीची खाने के कारण बच्चों में चमकी बुखार हुई थी. इसी रिपोर्ट के आधार पर कुछ लोग इस बीमारी को लीची से जोड़ रहे हैं.

सीएमसी, वेल्लोर के रिटायर्ड प्रो. डॉ टी जैकब जॉन का रिसर्च सामने आने के बाद ही यह धारणा मजबूत हुई है कि लीची भी कारण हो सकता है. डॉ जैकब जॉन अपने रिसर्च में कहा था कि लीची का एईएस से संबंध तो है, लेकिन लीची इसका प्रमुख कारण नहीं है. इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण कुपोषण है.

मुजफ्फरपुर में इंसेफेलाइटिस से पीड़ित बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है


बता दें कि 2014 में मुजफ्फरपुर में किए गए एक अध्ययन में डॉ. अरुण शाह और टी. जैकब जॉन ने सुझाव दिया था कि हाइपोग्लाइसीमिया के इलाज से ही दिमागी बुखार को खत्म किया जा सकता है. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि बीमारी का लीची या पर्यावरण में मौजूद किसी जहर के साथ संभावित संबंध को दर्ज किया जाना चाहिए. पशुओं पर किए गए परीक्षण में हाइपोग्लाइसीमिया होने का कारण लीची में मौजूद मेथिलीन साइक्लोप्रोपिल ग्लिसिन को पाया गया था. डॉ जैकब जॉन की मेडिकल रिपोर्ट्स में मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार के 98 फीसदी मरीज हाइपोग्लाइसीमिया से पीड़ित होते हैं.

 चमकी बुखार गरीब बच्चों को ही क्यों होती है?

एनसीडीसी के बिहार स्टेट सर्विलांस अधिकारी डॉ. रागिनी मिश्रा कहती हैं, 'अगर लीची में मौजूद विषाक्त पदार्थ के कारण हाइपोग्लाइसीमिया होता है तो हर साल ही इतनी ही मात्रा में मामले सामने आने चाहिए. साथ ही हर तरह की सामाजिक और आर्थिक स्थिति वाले बच्चों को भी यह बीमारी प्रभावित कर सकता है. आखिर यह बीमारी गरीब से ही गरीब बच्चों को हो क्यों होता है? इस साल अभी तक जितनी भी मौतों के मामले सामने आए हैं उनमें लगभग 70 प्रतिशत निम्न आय वर्ग वाले बच्चे हैं.'



कुलमिलाकर अभी तक के शोध और वैज्ञानिकों की राय कहती है कि लीची से इस बीमारी का कोई संबंध नहीं है. ज्यादातर विशेषज्ञों ने भी कहा है कि लीची को बदनाम किया जा रहा है. वहीं अब बिहार सरकार ने भी इस मामले की जांच के लिए एक टीम का गठन कर दिया है. टीम के गठन के बाद बाद यह माना जा रहा है कि लीची को लेकर हो रहे कयासों पर विराम लग जाएगा.

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First published: June 22, 2019, 6:36 PM IST
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