मुजफ्फरपुर शेल्टर होम: 'सबने केस के सबूत पकड़े, मैंने केस की फीलिंग पकड़ी'

मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले की इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. कोर्ट ने नीतीश सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि पूरे मामले में राज्‍य का रवैया बेहद दुर्भाग्‍यपूर्ण, अमानवीय और लापरवाह है.

Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: December 7, 2018, 3:08 AM IST
मुजफ्फरपुर शेल्टर होम: 'सबने केस के सबूत पकड़े, मैंने केस की फीलिंग पकड़ी'
ज्योति कुमारी इस केस की इन्फोर्मेशन ऑफिसर हैं.
Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: December 7, 2018, 3:08 AM IST
‘आंटी हमको रख लो न' – मुजफ्फरपुर की महिला एसएचओ ज्योति कुमारी की आंखें डबडबा जाती हैं जब वो बालिका गृह की बच्चियों को याद करती हैं. मुजफ्फरपुर के साहू रोड पर बालिका आवास गृह में 6-15 साल तक की उम्र की बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले सामने आए हैं. ज्योति कुमारी इस केस की आईओ (इन्वेस्टिगेटिव ऑफिसर) हैं और वही इस केस की हीरो हैं – ऐसा हम नहीं, मुजफ्फरपुर के लोग और खुद इस शहर की एसएसपी हरप्रीत कौर मानती हैं.

यह मामला सामने आने के बाद से ही ज्योति बच्चियों के साथ परछाई की तरह रही हैं. बच्चियों की मेडिकल जांच और कोर्ट में उनके दिए बयान से केस में अहम मोड़ आ पाया है. ज्योति और उनकी टीम (जिसमें दो महिला सिपाही, एक महिला और एक पुरुष ड्राइवर शामिल हैं) ने इस मुश्किल लगने वाले काम को मुमकिन बनाया. 44 बच्चियों को मुजफ्फरपुर से अन्य शहरों के आवास गृह तक सुरक्षित हाल में लेकर जाया गया. इनमें से करीब 16 बच्चियों को मेडिकल जांच के लिए ज्योति और उनकी टीम काम पर लगी थी.

छोटी छोटी बच्चियों का मेडिकल करवाने जाते थे तो अंदर से बहुत बुरा लगता था. हम सब जानते हैं ऐसे मामलों में मेडिकल कैसे होता है. ऐसे में बच्चियों को उसके लिए मनाना बहुत मुश्किल होता था. हम उनके साथ लुक्का छुपी खेलते थे, उनके साथ भागम भाग खेलते थे, चॉकलेट खिलाते थे, तब जाकर उन्हें लेकर जाते थे. उसमें भी मेडिकल होने के बाद वो इतना नाराज़ होती थीं कि हमें मुक्के और घूंसे भी मार देती थीं. लेकिन अगले ही पल हमारे साथ फिर दोस्ती हो जाती थी.
ज्योति कुमारी, एसएचओ, मुजफ्फरपुर


आलम यह है कि अब ज्योति को उनमें से ज्यादातर बच्चियों को कौन सी आइसक्रीम पसंद है, कौन सा रंग पसंद है और क्या पसंद नहीं, सब कुछ पता है. इन दो महीनों को याद करते हुए ज्योति कहती हैं – ‘जब कोई बच्ची हमसे कहती थी ना कि आंटी हमको आप ही रख लो ना, तो उसे ज़ोर से गले लगाकर सोचती थी, अगर पैसों से कमज़ोर नहीं होती तो इन सब बच्चियों को अपने पास ही रख लेती.’

ज्योति कुमारी (दाएं) इस केस की इन्वेस्टिगेटिव ऑफिसर हैं.


हमने 11 साल की नौकरी में नहीं सोचा था कि ऐसा कोई केस सामने आएगा जो हमें भी हिला देगा. हम तो सोचते थे, महिला थाने में वही तलाक, लड़ाई झगड़े के मामले ही आते रहेंगे और हम ऐसे ही उनसे निपटते रहेंगे. लेकिन इस केस में तो छोटी छोटी बच्चियां हैं. उनके साथ हमें अलग ही तरह से पेश आना होता था. कोर्ट में जो बयान दर्ज किए गए हैं, वो सच सच बताने के लिए बच्चियों को राज़ी करना आसान नहीं था. सच कहें तो इनके साथ रहते हुए मैं अपनी बेटी को भूल ही जाती थी. इनसे इतना लगाव हो गया था कि मन करता था छोड़ो सब, चलो मेरे घर, बस.


मई की झुलसती गर्मी में लगातार दो महीने तक ज्योति सुबह 5 बजे से रात को 11 बजे तक केस में जुटी रहीं. एफआईआर से लेकर चार्जशीट, बयान, सबूत और न जाने क्या क्या. खुद पर हंसते हुए कहती हैं – हम तो चालीस रुपये का खाना कहीं खा लेते थे, घर तो कई बार जा ही नहीं पाते थे, जीप में ही सो जाते थे. मुजफ्फरपुर के अखबारों में छाई हुई ज्योति कुमारी दो-चार दिन के लिए अस्पताल में भर्ती भी हो गई थी. हालांकि इसने उनके हौसले पस्त नहीं किए और फिलहाल वो इस केस से जोंक की तरह चिपककर रहती दिख रही हैं. ज्योति बार बार कहती हैं कि अगर उन्हें उनकी एसएसपी हरप्रीत कौर की तरफ से हौसला नहीं मिला होता तो वो केस में इतना आगे तक नहीं आ पाती. यह भी शायद एक संयोग ही है कि बच्चियों के इस मामले में एसएसपी से लेकर ड्राइवर तक सब महिला ही हैं.
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इधर, ज्योति कुमारी से मुजफ्फरपुर में कोई भी मिलता है तो सिर्फ यही कहता है – मैडम जी आप ने तो इस केस में जी जान लगा दी.  ज्योति हमसे बात करते हुए अपनी 8 साल की बेटी को याद करती है जो दूसरे शहर से उन्हें फोन पर कहती है – 'मम्मी तुम्हें टीवी पर देखा, तुम अच्छा काम कर रही हो, हम भी पुलिस बनेंगे. हम बहुत तेज़ दौड़ते हैं.'

ऐसा बताते हुए ज्योति एक पल के लिए शायद फिर उन बच्चियों के बीच खो जाती हैं. फिर खुद ही उससे बाहर निकलते हुए कहती हैं - 'बाकी सबने केस के एविडेंस पकड़े, मैंने इस केस की फीलिंग पकड़ी.'
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