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मिसाल: ट्रेन एक्सीडेंट में गवाएं थे दोनों पैर, अब लोगों की जिन्दगी बचाने में जुटा ये शख्स...

News18 Bihar
Updated: October 24, 2019, 3:47 PM IST
मिसाल: ट्रेन एक्सीडेंट में गवाएं थे दोनों पैर, अब लोगों की जिन्दगी बचाने में जुटा ये शख्स...
ट्रेन हादसे में दोनों पैर गवां चुके संजीव कुमार (व्हील चेयर पर) लोगों की जिंदगी बचाने में जुटे

निर्मल अनुपम फाउंडेशन (Nirmal Anupam Foundation) नामक एक सामाजिक संस्था के संस्थापक अध्यक्ष संजीव कुमार की कहानी जितनी मार्मिक है उतनी ही प्रेरणादायक भी है. दुर्घटना के दिन को याद करते हुए संजीव कहते हैं कि अनजान लोगों ने अगर समय पर रक्तदान नहीं किया होता तो उनकी जिंदगी नहीं बचती उस घटना ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी है.....

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अगर हौसलों में दम है तो शारीरिक अक्षमता आपकी उड़ान को रोक नहीं सकती है. इस बात को साबित किया है ट्रेन दुर्घटना में अपने दोनों पैर गंवा चुके संजीव ने जो आज लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं. आज आपको मुजफ्फरपुर के इस शख्स की कहानी सुनाते हैं जिसके दोनों पैर नहीं हैं. लेकिन अपने हौसलों की उड़ान की बदौलत यह शख्स निशक्त होते हुए भी सशक्त लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया है. यह शख़्स है मुजफ्फरपुर का संजीव कुमार जो अपने सामाजिक कर्तव्य के निर्वहन और निशक्त जनों को समाज की मुख्यधारा में लाने की कोशिशों की बदौलत अपनी अलग पहचान बना चुका है.

अनजान लोगों ने बचाई थी जान
संजीव पंजाब नेशनल बैंक की मुजफ्फरपुर शाखा में सीनियर मैनेजर के पद पर तैनात हैं और निर्मल अनुपम फाउंडेशन नामक एक सामाजिक संस्था के संस्थापक अध्यक्ष हैं. लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने की संजीव की कहानी काफी संवेदनात्मक और प्रेरणास्पद है. मुज़फ्फरपुर की कांटी तहसील के रूपौली गांव में जन्मे संजीव कुमार अपने 5 भाइयों में सबसे बड़े हैं. पिता के साथ अपने परिवार की जिम्मेदारी निभाने के लिए संजीव ने सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट का अपना काम शुरू किया .लेकिन सन 2011 में बरौनी में हुई एक ट्रेन दुर्घटना में संजीव के दोनों पैर कट गए . उस समय संजीव के साथ उनके कोई परिजन नहीं थे और आम लोगों ने ही संजीव को अस्पताल में भर्ती कराया. इस दुर्घटना में उनका काफी खून बह गया था और ऐसे में जब उनकी जान बचाने के लिए खून की आवश्यकता हुई तो अनजान लोगों ने रक्तदान कर संजीव की जान बचाई. होश में आने के बाद संजीव ने परिजनों को घटना की सूचना दी.

जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट

यह दुर्घटना संजीव की जिंदगी में टर्निंग प्वाइंट बन गई. स्वस्थ होने के बाद संजीव ने खुद को स्थापित करने का फैसला लिया दुर्घटना बीमा से मिले 5 लाख रुपए खर्च करके संजीव ने निर्मल अनुपम फाउंडेशन नामक एक ट्रस्ट बनाया और ब्लड डोनेशन कैंप शुरू किया. वर्ष 2013 में संजीव ने निर्मल अनुपम फाउंडेशन के तहत सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले 12 युवाओं को प्रत्येक वर्ष सम्मानित करने की योजना बनाई. तब से 40 वर्ष से कम उम्र वाले 12 युवकों को निर्मल अनुपम फाउंडेशन के बैनर तले प्रत्येक वर्ष सम्मानित किया जाता है. समाज सेवा, पत्रकारिता, साहित्य, शिक्षा सेवा, नृत्य, गायन, वादन, चिकित्सा, खेलकूद, खेती-बाड़ी, चित्रकारी जैसी 12 विधाओं की युवा शक्तियों को प्रत्येक वर्ष फाउंडेशन के स्थापना दिवस समारोह के मौके पर सम्मानित किया जाता है.

इस बार लगातार सातवीं बार युवा सम्मान समारोह का आयोजन निर्मल अनुपम फाउंडेशन की ओर से किया गया है .संजीव के इस भागीरथ प्रयास में समाज के बुद्धिजीवी, विद्वान, डॉक्टर, इंजीनियर, बैंकर और समाजसेवी जैसे तमाम लोग जुड़ गए हैं. इस संस्था की एक खासियत आज भी बरकरार है कि इन कार्यों के लिए संस्था कहीं से कोई चंदा नहीं लेती है. मुजफ्फरपुर में निर्मल अनुपम फाउंडेशन की ओर से युवा सम्मान समारोह अब परिचय का मोहताज नहीं है. क्योंकि अब तक इस मंच से 84 युवक-युवतियां सम्मानित हो चुके है. पिछले वर्षों की भांति इस बार भी जिले के प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के सुख शांति भवन में युवा सम्मान समारोह का आयोजन किया गया.

आयोजन में शामिल बीआर अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ रविंद्र कुमार वर्मा उर्फ रवि कहना है कि निशक्त होते हुए भी संजीव जी ने सशक्त लोगों को बड़ी चुनौती दी है. उनके इस कार्य में शिक्षक समाज सदैव उनके साथ है इस मौके पर अतिथि के रुप में शामिल प्रख्यात चिकित्सक डॉ अरुण शाह ने संजीव जी के प्रयासों की काफी सराहना की. बिहार विश्वविद्यालय सेवा आयोग के सदस्य रहे डॉ विजय कुमार जायसवाल संजीव जी की सामाजिक निष्ठा के कायल हैं. फाउंडेशन द्वारा आयोजित सातों युवा सम्मान समारोह में शामिल होने वाले डॉक्टर जायसवाल कहते हैं कि संजीव कुमार ने समाज के न सिर्फ युवाओं बल्कि प्रत्येक वर्ग के लोगों को रास्ता दिखाया है कि निशक्त व्यक्ति मजबूर नहीं होता. निशक्त लोगों में दिव्य शक्ति होती है और उसी दिव्य शक्ति की ताकत से संजीव जी युवाओं को बेहतर करने की प्रेरणा दे रहे हैं.
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दुर्घटना के दिन को याद करते हुए संजीव बताते हैं कि अनजान लोगों ने अगर समय पर रक्तदान नहीं किया होता तो उनकी जिंदगी नहीं बचती क्योंकि दोनों पैर कट जाने के बाद शरीर का अधिकांश खून बह चुका था उस वक्त वहां उनका कोई भी अपना साथ नहीं था गैरों ने उन्हें रक्तदान करके जिंदगी दी इसलिए रक्तदान उनके जीवन का सबसे बड़ा अनुष्ठान और पूजा है और इसीलिए संजीव प्रत्येक वर्ष 18 जुलाई को अपना जन्म दिवस रक्तदान कैंप आयोजित कर मनाते हैं रक्तदान शिविर में संजीव के साथ उनका पूरा परिवार भाग लेता है इसके अलावा प्रबुद्ध और उत्साही लोग प्रत्येक वर्ष संजीव जी द्वारा आयोजित रक्तदान शिविर में रक्तदान भी करते हैं.

बेटे पर नाज है
संजीव के रक्तदान से प्रभावित एसकेएमसीएच के पूर्व अधीक्षक डॉ डीके ठाकुर बताते हैं कि मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में प्रत्येक वर्ष संजीव जी का अहम योगदान होता है जिसकी मदद से जरूरतमंद और गरीब मरीजों की जान बचाई जाती है रोटेरियन डॉक्टर नवनीत शांडिल्य संजीव के इस महान कार्य की सराहना करते नहीं थकते डॉक्टर शांडिल्य बताते हैं कि संजीव कुमार जैसे लोग मानवता के सिपाही हैं.
संजीव की पत्नी अनुपमा सिन्हा पूरे मनोयोग से पति के कार्यो में सहयोग देती है और हर शिविर में रक्तदान करती हैं. मां निर्मला देवी और पिता विश्वनाथ प्रसाद शुरुआत में संजीव के समाजसेवी रूप से सहमत नही थे लेकिन आज दोनों अपने बेटे पर नाज़ करते हैं.

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First published: October 24, 2019, 3:47 PM IST
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