अपने बच्चों की मौत पर कराहता मैं मुजफ्फरपुर हूं...

मैं मुजफ्फरपुर हूं, लेकिन मैं इस समय दुख और असहनीय पीड़ा से कराह रहा हूं. इसकी वजह यह है कि मेरे जो नौनिहाल मेरी गोद में अठखेलियां करते थे, वे एक-एक करके काल-कवलित होते जा रहे हैं.

Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: June 20, 2019, 10:20 PM IST
अपने बच्चों की मौत पर कराहता मैं मुजफ्फरपुर हूं...
मेरी आंखों के सामने सौ से अधिक मेरे बच्चों ने दम तोड़ दिया. अपने बच्चों को शव से लिपटकर माता-पिता जब चीत्कार करते हैं तो सोचिए मेरे ऊपर क्या बीतती होगी? ( फाइल फोटो )
Deepak Priyadarshi
Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: June 20, 2019, 10:20 PM IST
मैं मुजफ्फरपुर हूं. लेकिन, मैं इस समय दुख और असहनीय पीड़ा से कराह रहा हूं. इसकी वजह यह है कि मेरे जो नौनिहाल मेरी गोद में अठखेलियां करते थे, वे एक-एक कर काल-कवलित होते जा रहे हैं. मुझे मालूम है कि इसके लिए दोषी कौन हैं, लेकिन मैं कर भी क्या सकता हूं! सिवाए अपने मासूम नौनिहालों को दर्द और पीड़ा से कराहते और दम तोड़ते देखने के, क्योंकि मेरे जिले में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी AES नामक बीमारी ने कोहराम मचा कर रखा है. इस कारण पूरे देश की निगाहें मेरे ऊपर लगी हैं.

मेरी पीड़ा इस बात को लेकर भी है कि जिस शाही लीची के कारण मैं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर हुआ, आज मेरी उसी लीची को AES का एक कारण बताया जा रहा है. चलिए इसी बहाने मैं आपको अपना परिचय देता हूं.

मैं 18वीं शताब्दी में तिरहुत के पहले जिले को विभाजित कर अस्तित्व में आया और मेरा नामकरण उस समय के राजस्व अधिकारी मुजफ्फरपुर खान के नाम पर किया गया. मुझे लीची की भूमि भी कहते हैं, क्योंकि मेरी शाही लीची अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात है. मैं 3,173 वर्ग किलोमीटर यानी 1.225 वर्ग मील में फैला हूं. मेरी धरती पर रहने वाले लोगों की संख्या यानी कुल जनसंख्या 48 लाख एक हजार 62 है. हिंदी और मैथिली मेरी मुख्य भाषा है, जबकि वज्जिका मेरे यहां की स्थानीय भाषा है. मेरी साक्षरता दर 84 प्रतिशत के आस-पास है. यानी तकरीबन शिक्षित हूं मैं. मेरे जिले का लिंगानुपात 900/1000 है.

मैंने दिए हैं कई सपूत

मेरे जिले की विशेषता सिर्फ लीची ही नहीं, बल्कि मेरी धरती ने देश को कई जानी-मानी शख्सियतें और हस्तियां दी हैं, जिसमें महान स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस, जुब्बा साहनी, योगेन्द्र शुक्ल, रामसंजीवन ठाकुर और पंडित सहदेव झा शामिल हैं. साहित्यकारों में देवकीनंदन खत्री, रामवृक्ष बेनीपुरी लेखक में राम प्रभाकर प्रसाद, राजनेताओं में जॉर्ज फर्नांडीज, जयनारायण निषाद जैसे शख्सियत मेरी धरती से निकले.

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी खुदीराम बोस.


सरकारी तामझाम का फायदा क्या
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मेरा एक सवाल है कि मैंने तो बहुत कुछ दिया है, लेकिन मुझे क्या मिला? पिछले दस वर्षों से अधिक समय से AES का दंश झेल रहा हूं. हर वर्ष मेरे कई नौनिहाल मर रहे हैं, लेकिन कोई इसे गंभीरता से नहीं लेता. मेरे यहां बड़ा मेडिकल कॉलेज SKMCH है. जिला अस्पताल है, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं. लेकिन इतना सबकुछ रहने का क्या फायदा जब मेरे बच्चे हर वर्ष बीमार पड़ते हैं लेकिन इलाज की कहीं भी पर्याप्त सुविधा न रहने के कारण दम तोड़ देते हैं. तो फिर इतना सरकारी तामझाम किस बात का? पांच वर्ष पहले जब 2014 में मेरे 117 बच्चे मेरी आंखों के सामने दम तोड़ गए तब पटना और दिल्ली में बैठी सरकार ने SKMCH को बेहतर बनाने का दावा किया था. लेकिन कुछ हुआ?...नहीं.

इस बार भी मेरी आंखों के सामने सौ से अधिक मेरे बच्चों ने दम तोड़ दिया. अपने बच्चों को शव से लिपटकर माता-पिता जब चीत्कार करते हैं तो सोचिए मेरे ऊपर क्या बीतती होगी? नेताओं का हुजूम आता है और मेरी छाती पर बैठकर फिर वही सब कुछ बोला जाता है जो वर्षों पहले वो बोल कर गए. क्या सिर्फ घोषणा करने से मेरे बच्चों की जान बच जाएगी? अगर कुछ करने की नीयत है तो करते क्यों नहीं? क्या सरकार में बैठे लोग और विपक्ष में बैठे नेताओं को सिर्फ मेरे लोगों का वोट चाहिए? उनके आंखों के आंसू कौन पोछेगा?

लीची के लिए देशभर में मशहूर है मुजफ्फपुर.


मेरा एक सवाल और है कि जब लीची की मिठास लेने की बारी आती है तो मुजफ्फरपुर के रूप में मेरा नाम आता है. लेकिन बच्चों की मौत का कलंक जब हर वर्ष मेरे ऊपर लगता है तो उसे पोछने के लिए लोग क्यों कुछ नहीं करते?

लीची की मिठास के लिए मशहूर रहा हूं, मासूमों की मौत से अब मेरे आंसू भी सूख गए,

अगर सुविधाएं होतीं तो एयरकंडीशंड गाड़ियों से आते-जाते नेताओं को यूं ही नहीं निहारता मैं.


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First published: June 20, 2019, 8:47 PM IST
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