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Women's Day: दृष्टिहीन होने के बावजूद बनीं प्रोफेसर फिर दिव्यांगों के लिए बनाया ऑडियो बुक

दिव्यांगों को पढ़ाती संगीता अग्रवाल

दिव्यांगों को पढ़ाती संगीता अग्रवाल

बिहार में मुजफ्फरपुर ही एकमात्र जगह है जहां ब्रेल लिपि की पुस्तकों की छपाई की जाती है. ऐसे देश में 18 जगहों पर ब्रेल लि ...अधिक पढ़ें

मुजफ्फरपुर. पूरा विश्व आज महिला दिवस मना रहा है. इस मौके पर हम आपको बता रहे हैं एक ऐसी महिला की कहानी जो जन्म से ही आंखों से देख नहीं पाती लेकिन इसके बावजूद न केवल उन्होंने पढ़ाई पूरी की बल्कि प्रोफेसर बनीं और फिर नहीं देख सकने वाले बच्चों के लिए ऑडियो बुक भी बनाया.

जन्म से ही नहीं थी आंखों की रोशनी


संगीता अग्रवाल आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है. शहर के एलएस कॉलेज में संस्कृत विभाग की विभागाध्यक्ष के तौर पर काम कर रही संगीता अग्रवाल जन्म से ही दोनों आंख से नहीं देख पाती हैं लेकिन दिव्यांगता को संगीता ने अभिशाप नहीं बनने दिया बल्कि खुद पढ़ लिखकर दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी की और बीपीएससी द्वारा 1996 में बतौर लेक्चरर  बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के एलएस कॉलेज में संस्कृत विभाग में प्राध्यापक बनीं. आज संगीता अग्रवाल रोल मॉडल के तौर पर दिव्यांगों के बीच जानी जा रही हैं. दिव्यांग ही नहीं बल्कि महिलाओं के बीच एक सशक्त भूमिका में संगीता अग्रवाल हमेशा दिखती हैं. उनके योगदान के लिए 3 दिसम्बर 2019 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने  पुरस्कृत भी किया है.


दिव्यांग जनों के लिए पहली बार बनाई ऑडियो बुक्स


देश में पहली बार मुजफ्फरपुर में हैं संगीता अग्रवाल के प्रयास से दृष्टिहीन बच्चों के लिए ऑडियो बुक्स तैयार किया गया फिलहाल बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई दृष्टिबाधित बच्चे ऑडियोबुक्स के जरिए कर सकते हैं. मुजफ्फरपुर के बाद देश में 25 जगहों पर ऑडियो बुक्स लाइब्रेरी काम कर रहा है.


आत्मनिर्भर बनाने की गुर सिखाती संगीता


संगीता अग्रवाल की पहचान खासकर दृष्टिहीन और श्रवण बाधित बच्चों के लिए विशेष तौर पर है. दिव्यांग बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार संगीता अग्रवाल काम करती रही हैं. मुजफ्फरपुर में 1994 में ही संगीता अग्रवाल ने शुभम विकलांग विकास संस्थान नामक संस्था खोलकर दृष्टिहीनों के लिए छात्रावास की सुविधा शुरू की और इस छात्रावास में मुफ्त में दृष्टिहीन बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया. इसके बाद नहीं सुन पाने वाले बच्चों को भी छात्रावास में दाखिला दिया और दिव्यांग बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ना केवल पढ़ाई की व्यवस्था की बल्कि उनको हुनरमंद बनने के लिए आईटीआई समेत दूसरे संस्थानों में जाने के लिए भी प्रेरित किया. आज संगीता अग्रवाल की संस्था से पढ़े लिखे सैकड़ों दिव्यांग रोजगार कर रहे हैं. कई दिव्यांगों को तो सरकारी नौकरी भी लग गई है. आज भी संगीता अग्रवाल रोजाना अपने संस्था में समय देती हैं. यहां आसपास के जिलों से सैकड़ों बच्चे मुफ्त में पढ़ाई और ट्रेनिंग लेने का काम कर रहे हैं.

 

ब्रेल लिपि की पुस्तकों की होती है छपाई


दृष्टिहीन संगीता अग्रवाल की संस्था शुभम विकलांग विकास संस्थान मुजफ्फरपुर के द्वारा दृष्टिहीन बच्चों की पढ़ाई के लिए ब्रेल लिपि में पुस्तक की छपाई का काम किया जाता है. बिहार में मुजफ्फरपुर ही एकमात्र जगह है जहां ब्रेल लिपि की पुस्तकों की छपाई की जाती है. ऐसे देश में 18 जगहों पर ब्रेल लिपि में दृष्टिहीन बच्चों की पढ़ाई के लिए किताबों की छपाई की जाती है.

Tags: International Women Day, Muzaffarpur news

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