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OMG! यहां कोई मुस्लिम नहीं फिर भी होती है 5 वक्त की अजान! कैसे कौमी एकता की मिसाल बना यह गांव?

एक दिलचस्प कहानी, जो संदेश भी देती है. शादी हो या जन्म, हिंदू लोग इस मस्जिद और यहां बनी मज़ार पर पहुंचते हैं. बात मान्य ...अधिक पढ़ें

रिपोर्ट – महमूद आलम

नालंदा. बिहार के नालंदा ज़िले के बेन प्रखंड में एक गांव ऐसा है, जहां पांच वक्त की अज़ान तो होती है, लेकिन नमाज़ पढ़ने यहां गांव का कोई बाशिंदा पहुंचता नहीं. माड़ी गांव में अब एक भी मुस्लिम परिवार नहीं है, लेकिन मस्जिद में पांच वक्त की अज़ान का सिलसिला जारी है. असल में यह सब सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल पेश करने का किस्सा है. हिंदू समाज के लोग मस्जिद की देखरेख व रखरखाव करते हैं और वक़्त से दिन भर में पांच बार अज़ान होती है, जिसका ज़िम्मा गांव के हिंदुओं के हाथों में है.

सांप्रदायिक वैमनस्य की खबरों से दूर इस गांव में कोई ख़ास कार्यक्रम हो तो मस्जिद की साफ-सफाई में दिन रात हिंदू धर्म के ही लोग नेकी करते हैं. मस्जिद की रंगाई-पुताई का मामला हो या फिर तामीर का, पूरे गांव के लोग सहयोग करते हैं. मस्जिद की सफाई का ज़िम्मा गौतम महतो, अजय पासवान, बखोरी जमादार व अन्य लोगों के कंधों पर है. इस मस्जिद के साथ गांव के लोगों की आस्था और मान्यताएं भी जुड़ी हुई हैं.

क्यों है यह आस्था? क्या है इतिहास?

घर में खुशी का कोई भी कार्यक्रम हो मस्जिद में हिंदू ग्रामीण पहुंचते हैं. गहरी आस्था यह है कि शादी-विवाह हो या किसी प्रकार की खुशी का मौका हो, सबसे पहले मस्जिद के ही दर्शन करते हैं. मान्यता है कि ऐसा न करने वालों पर आफत आती है. गांव के लोग बताते हैं कि सदियों से चली आ रही इस परंपरा को सब बखूबी निभा रहे हैं. मस्जिद के बाहर एक मजार भी है. इस पर भी ये लोग चादरपोशी करते हैं.

बताया जाता है कि गांव में पहले अक्सर आग लगने और बाढ़ की घटनाएं होती थीं. करीब 600 साल पहले हज़रत इस्माइल गांव आए. उनके आने के बाद गांव में कभी तबाही नहीं आई. उनके गांव में आने से आग लगी रुक गई. उनका निधन हो गया. इसके बाद ग्रामीणों ने मस्जिद के पास ही उन्हें दफना दिया. इस मस्जिद की तामीर करीब 200 साल पहले हुई. 1942 के साम्प्रदायिक दंगे के बाद सभी मुस्लिम परिवार गांव छोड़ पलायन कर गए. तबसे हिंदुओं द्वारा इस मस्जिद की देखभाल की जा रही है.

हिंदू कैसे देते हैं अज़ान?

जब नालंदा यूनिवर्सिटी थी, तो वहां मंडी लगती थी इसलिए गांव का नाम मंडी था. बाद में माड़ी हो गया. यहां के लोग गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल पेश कर रहे हैं, पर सवाल यह भी है कि ये लोग अज़ान आखिर देते कैसे हैं! असल में यहां के हिंदुओं को अज़ान देनी नहीं आती, तो वे लोग पेन ड्राइव की मदद लेते हैं. यानी अज़ान की रिकॉर्डिंग को लाउडस्पीकर के ज़रिये बजाया जाता है.

Tags: Hindu-Muslim, Masjid, Nalanda news

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