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    नालंदा: कोर्ट परिसर में दर्जनों पक्षियों की मौत से मचा हड़कंप, जांच में जुटा वन विभाग

    बताया जाता है कि कई सालों से यहां प्रत्येक साल हज़ारों की संख्या में ये पक्षी बिहारशरीफ कोर्ट व आसपास के क्षेत्रों में प्रजनन करने के लिए आते हैं. जब बच्चे उड़ने लायक हो जाते हैं तब वे वापस चले जाते हैं.
    बताया जाता है कि कई सालों से यहां प्रत्येक साल हज़ारों की संख्या में ये पक्षी बिहारशरीफ कोर्ट व आसपास के क्षेत्रों में प्रजनन करने के लिए आते हैं. जब बच्चे उड़ने लायक हो जाते हैं तब वे वापस चले जाते हैं.

    बताया जाता है कि कई सालों से यहां प्रत्येक साल हज़ारों की संख्या में ये पक्षी बिहारशरीफ कोर्ट व आसपास के क्षेत्रों में प्रजनन करने के लिए आते हैं. जब बच्चे उड़ने लायक हो जाते हैं तब वे वापस चले जाते हैं.

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    नालंदा. नालंदा जिले के बिहारशरीफ व्यवहार न्यायालय परिसर में प्रवासी पक्षियों की अचानक मौत के बाद कोर्ट परिसर में हड़कंप मच गया. इधर प्रवासी पक्षियों की मौत की खबर वन विभाग को दी गयी. जहां सभी लोगों को पक्षियों से दूर रहने को कहा गया, इतना ही वन विभाग ने मरे हुए पक्षियों को सुरक्षित रखने का इंतजाम भी किया.

    जांच के लिए लिये गये कई नमूने

    इधर डीएफओ के नेशामणि ने बताया कि घटनास्थल के पास कई नमूने लिए गए हैं. उन नमूनों की जांच के लिए कोलकाता लैब भेज दिया गया है. जांच रिपोर्ट आने के बाद ही पक्षियों की मौत की कारणों का खुलासा हो पायेगा. हालांकि इस मामले में आज दूसरे दिन भी पक्षी रोग विशेषज्ञ की टीम ने घटनास्थल पर पहुंचकर मुआयना किया और पक्षियों की मौत की जांच पड़ताल की. अधिकतर पक्षी एशियन ओपनबिल प्रजाति के हैं. आकार में मध्यम और स्टार्क प्रजाति से इनका संबंध है.



    ये पूर्णतः मांसाहारी होते हैं. इनका मुख्य आहार घोंघा है. इनकी चोंच के बीच में खाली स्थान होने के कारण इन्हें ओपनबिल कहा जाता है. चोंच का यह आकार घोंघे को उसके कठोर आवरण से बाहर निकालने में मदद करता है. घोंघा खाने की आदत के कारण इसे घोंघिल भी कहा जाता है.
    अचानक मौत के कई कारण हो सकते हैं

    वन्य जीव शोधकर्ता राहुल कुमार ने बताया कि अचानक हुई मौत के कई कारण हो सकते हैं. मौसम की मार, अचानक कोई बीमारी से ग्रसित हो जाना, भोजन की कमी आदि. क्योंकि, घोंघा भी अब कम मिलते हैं. घोंघा को भी लोग मारकर खा जा रहे हैं, जिससे इसको पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल पा रहा है. लेकिन, जांच के बाद ही सच्चाई का पता चल पायेगा.

    अगस्त महीने में होता है आगमन

    घोंघिल अगस्त से नालंदा जिले के सिविल कोर्ट, नालंदा कॉलेज के परिसर, बिहार थाना व अन्य जगहों पर के आधा दर्जन से अधिक दरख़्तों पर अपना प्रवास बनाये हुए हैं. ये पक्षी हर साल यहां आते हैं. आने के साथ ही प्रजनन के लिए घोंसला निर्माण का काम शुरू कर देते हैं. घोंघिल पक्षी भारत उपमहाद्वीप के अलावा दक्षिण-पूर्व एशियाई देश, चीन, आस्ट्रेलिया, कंबोडिया, थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, म्यांमार, मलेशिया व सिंगापुर में भी भारी तादाद में पाए जाते हैं.

    लोग इसे समझते हैं साइबेरियन, जो पूर्णता गलत है

    सामान्यतः वर्ष के कुछ ख़ास महीनों में दर्शन देने के कारण लोग इन्हें साइबेरियन या दूर देश से प्रवास कर आने वाले पक्षी समझ लेते हैं जो पूर्णतः गलत है. ये लगभग पूरे भारतवर्ष में पाये जाते हैं, लेकिन अपने वंश की वृद्धि के लिए मौसम के अनुकूल देश के अंदर ही एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवास करते रहते हैं. ये प्रजनन के लिए बड़े वृक्ष जैसे-पीपल, बरगद आदि की डालियों पर प्लेटनुमा घोंसला बनाते हैं. मादा 2 से 5 अंडे दे सकती हैं. मादा अंडे से आती हैं और घोंसले की देखभाल करती हैं. दो माह के भीतर बच्चे उड़ान भरने के लिए तैयार हो जाते हैं. फिर वे दूसरी जगह चले जाते हैं.

    पर्यवरण संतुलन में है अहम भूमिका

    पर्यावरणीय दृष्टिकोण से यह विशेष महत्व रखते हैं. पारिस्थितिकी तंत्र में ये घोंघों और अन्य कीड़े-मकोड़ों का भक्षण करके हमारी फसलों की सुरक्षा करते हैं. इस तरह पर्यावरण को संतुलित रखते हैं.

    हर साल हजारों की संख्या में आते हैं पक्षी

    बताया जाता है कि कई सालों से यहां प्रत्येक साल हज़ारों की संख्या में ये पक्षी बिहारशरीफ कोर्ट व आसपास के क्षेत्रों में प्रजनन करने के लिए आते हैं. जब बच्चे उड़ने लायक हो जाते हैं तब वे वापस चले जाते हैं. बिहार राज्य में दानापुर कैंट, एशियन ओपनबिल पंछियों का सबसे बड़ा बसेरा है.
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