नवादा लोकसभा सीट: गिरिराज सिंह के बाद कौन होगा इस सीट का 'सरताज'

News18 Bihar
Updated: May 4, 2019, 3:19 PM IST
नवादा लोकसभा सीट: गिरिराज सिंह के बाद कौन होगा इस सीट का 'सरताज'
नवादा के एक बूथ पर मतदान के लिए महिलाओं की कतार

नवादा लोकसभा सीट से एलजेपी ने बाहुबली सूरजभान सिंह के भाई चंदन कुमार को टिकट दिया. जबकि महागठबंधन की ओर से आरजेडी की उम्मीदवार विभा सिंह कि किस्मत का फैसला होना है.

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नवादा लोकसभा सीट का चुनावी रिजल्ट देखना दिलचस्प होगा. इस सीट से एनडीए के प्रत्याशी का ऐलान होने तक खूब गहमागहमी बनी रही. 2014 के चुनाव में नवादा लोकसभा सीट से बीजेपी के गिरिराज सिंह ने जीत हासिल की थी. अपने राजनीतिक बयानों के जरिए हमेशा चर्चा में बने रहने वाले गिरिराज सिंह केंद्र में मंत्री बने. लेकिन 2019 के चुनाव में यहां का राजनीतिक समीकरण बदल गया. एनडीए के खाते से ये सीट एलजेपी को चली गई. जबकि गिरिराज सिंह इसी सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे. गिरिराज सिंह को पार्टी ने बेगूसराय से चुनावी मैदान में उतारा. लेकिन इस फैसले से पहुंचने तक गिरिराज सिंह के रुठने-मनाने का लंबा सिलसिला चला.

नवादा लोकसभा सीट से एलजेपी ने बाहुबली सूरजभान सिंह के भाई चंदन कुमार को टिकट दिया. जबकि महागठबंधन की ओर से आरजेडी की उम्मीदवार विभा सिंह कि किस्मत का फैसला होना है. विभा देवी आरजेडी के पूर्व विधायक राजबल्लभ यादव की पत्नी हैं. वही राजबल्लभ यादव जो नाबालिग से रेप मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं. एक तरह से ये चुनावी मुकाबला सूरजभान सिंह और राजबल्लभ यादव के बीच का है. नवादा में चुनाव निपट चुका है और दोनों उम्मीदवार अपनी-अपनी जातीय गोलबंदी के आधार पर जीत की उम्मीद लगाए बैठे हैं.



नवादा का राजनीतिक समीकरण

2014 में इस सीट से गिरिराज सिंह ने आरजेडी के राजबल्लभ यादव को एक लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से हराया था. जबकि 2009 में इस सीट से बीजेपी के भोला सिंह जीते थे. उन्होंने एलजेपी की वीणा देवी को हराया था. पिछले दो चुनावों से ये सीट बीजेपी जीत रही है. हालांकि 1996 के बाद इस सीट से आरजेडी और बीजेपी बारी-बारी से जीतती रही है. 1996 में बीजेपी के कामेश्वर पासवान इस सीट से सांसद बने. इसके बाद 1998 में आरजेडी की मालती देवी ने इस सीट से जीत हासिल की.

1999 में बीजेपी के संजय पासवान को लोगों ने अपना सांसद चुना. फिर 2004 में आरजेडी के वीरचंद्र पासवान ने इस सीट से जीत हासिल की. 2009 और 2014 का चुनाव बीजेपी जीती. एक दिलचस्प तथ्य ये है कि सिर्फ एक मौके को छोड़कर नवादा सीट से किसी भी उम्मीदवार ने दोबारा जीत हासिल नहीं की. लोकसभा के अब तक कुल 16 चुनावों में यहां से सिर्फ कुंवर राम को ही दोबारा मौका मिल पाया है. 1980 और 1984 में कांग्रेस के टिकट पर कुंवर लगातार दो बार चुने गए थे बाकी सांसदों को नवादा के मतदाताओं ने आया राम गया राम टाइप से निपटाया है.

नवादा का इतिहास
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नवादा का गौरवशाली पौराणिक इतिहास रहा है. कहते हैं नवादा ‘नव आबाद’ का अपभ्रंश है. ये इलाका मगध साम्राज्य का केन्द्र था. इसका इतिहास रामायण और महाभारत काल से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि इसी इलाके में महर्षी वाल्मीकि का आश्रम था जहां मां सीता ने लव-कुश को जन्म दिया था. महाभारत काल में जरासंध और पांडवों के बीच इस इलाके में युद्ध हुआ था. मौर्य, गुप्त और पाल राजवंश के शासकों ने यहां राज किया. जानकारों की माने तो इतिहास से जुड़े कई साक्ष्य यहां मौजूद हैं. नवादा जिले में कई मंदिर और धार्मिक स्थल हैं. ककोलत जलप्रपात और यहां की मनोरम वादियां पर्यटकों को लुभाती हैं. सालो भर नवादा में पर्यटक आते हैं.



नवादा की सामाजिक-आर्थिक संरचना

समृद्ध इतिहास और सशक्त भौगोलिक बनावट के बाद भी नवादा जिला विकास की दौड़ में पिछड़ गया है. जिले का दक्षिणी इलाका वनों से घिरा है. पहाड़ और वादियां यहां की खूबसूरती में चार-चांद लगाती हैं. 23 लाख आबादी वाले नवादा जिले की 75 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है.

नवादा जिला मुख्यालय से 6 किलोमीटर दूर कादिरगंज में रेशम के कपड़ों की बुनाई होती है. कादिरगंज में ऐसे कई घर मिल जाएंगे जहां पावरलूम हैं. रेशम यहां कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है. यहां के कारीगर कच्चा माल झारखंड से लाते हैं फिर अपने तैयार माल को भागलपुर ले जाकर बेचते हैं. कारीगरों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर उन्हें बाज़ार मिले तो आर्थिक स्थिति सुधरने में देर नहीं लगेगी.

नवादा में बेरोजगारी का आलम ये है कि रोजगार की तलाश में दर-दर भटकते लोग आपको हर जगह मिल जाएंगे. खेती के बाद निर्माण कार्य में गरीब लोगों को मजदूरी का काम मिलता है लेकिन जब काम नहीं मिलता है तो दूसरे राज्यों में पलायन इनकी मजबूरी है. जिले में उच्च शिक्षा के लिए कोई संस्थान नहीं है. ऐसे तो यहां 4 कॉलेज हैं लेकिन किसी कॉलेज में PG की पढ़ाई नहीं होती. इसके लिए छात्रों को गया या पटना का रूख करना पड़ता है. कृषि प्रधान इस इलाके में सिंचाई की कोई सुविधा नहीं है. फसल पूरी तरह से बरसात पर निर्भर है.

नवादा में किसका चलेगा सिक्का

नवादा लोकसभा सीट से 2014 में BJP के फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह जीते थे तब दूसरे स्थान पर रहे थे RJD के राजबल्लभ यादव. इसे महज संयोग कह सकते हैं कि अब तक यहां के ज्यादातर सांसद बाहरी ही हुए हैं. कभी ये सीट सुरक्षित हुई तो कभी सामान्य. 2009 से नवादा लोकसभा सीट सामान्य है. नवादा संसदीय क्षेत्र में विधानसभा की 6 सीटें आती हैं- बरबीघा, हिसुआ, नवादा, रजौली, गोबिंदपुर और वारसलीगंज.

इनमें से रजौली सुरक्षित सीट है. 2015 के विधानसभा चुनाव में इनमें से 2-2 सीटें कांग्रेस और आरजेडी और बीजेपी के खाते में गईं. नवादा में भूमिहार और यादव जाति के लोगों की अच्छी आबादी है. एलजेपी उम्मीदवार चंदन कुमार को जहां सवर्ण वोट बैंक के साथ दलितों के साथ का भरोसा है, वहीं आरजेडी की विभा देवी को यादव-मुस्लिम वोटबैंक का आसरा है.

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First published: May 4, 2019, 3:10 PM IST
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