मधेपुरा लोकसभा सीट: लालू के साथ आकर भी क्यों नहीं जीत पाए शरद यादव, 10 वजहें

लोकसभा चुनाव 2019 रिजल्टः इस चुनाव में जनता ने स्थानीय मुद्दों को तवज्जो नहीं दी. ज्यादातर चर्चा पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक, राष्ट्रवाद और आतंकवाद पर ही रही. इसका फायदा एनडीए को मिला.

News18Hindi
Updated: May 23, 2019, 8:09 PM IST
मधेपुरा लोकसभा सीट: लालू के साथ आकर भी क्यों नहीं जीत पाए शरद यादव, 10 वजहें
लोकसभा चुनाव 2019 रिजल्टः इस चुनाव में जनता ने स्थानीय मुद्दों को तवज्जो नहीं दी. ज्यादातर चर्चा पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक, राष्ट्रवाद और आतंकवाद पर ही रही. इसका फायदा एनडीए को मिला.
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Updated: May 23, 2019, 8:09 PM IST
मधेपुरा का चुनाव अपने आप में दिलचस्प रहा. हैरानी की बात ये रही कि लालू की पार्टी में आकर और लालू के गढ़ से चुनाव लड़कर भी शरद यादव जीत नहीं हासिल कर पाए. मधेपुरा सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले में शरद यादव को हार का मुंह देखना पड़ा. यहां से जेडीयू प्रत्याशी दिनेश चंद्र यादव ने जीत हासिल की. दिनेश चंद्र यादव को कुल 572576 वोट हासिल हुए जबकि शरद यादव को 295372 वोटों से संतोष करना पड़ा.

लालू के गढ़ में क्यों हार गए शरद यादव


-लालू के गढ़ मधेपुरा में इस बार गैर यादव जातियों के वोट ने निर्णायक भूमिका निभाई. गैर यादव जातियों के वोट एनडीए की ओर से जेडीयू प्रत्याशी दिनेशचंद्र यादव को मिलते दिख रहे हैं. बीजेपी के साथ आने से जेडीयू उम्मीदवार दिनेश चंद्र यादव को सवर्णों के एकजुट वोट मिले. जिसने जीत की राह बनाई.

-मधेपुरा में सबसे ज्यादा यादव वोटर्स (करीब 3.5 लाख) हैं. मधेपुरा सीट पर चुनाव लड़ रहे तीनों बड़े चेहरे इस समुदाय से आते हैं. जेडीयू से दिनेश चंद्र यादव, आरजेडी से शरद यादव और जनअधिकार पार्टी की तरफ से पप्पू यादव के बीच यादव वोट बैंक बंटा. वोटों में बिखराव का फायदा जेडीयू प्रत्याशी को मिला.

-इस बार के जातीय गणित के मुताबिक जिस पार्टी ने गैरयादव और गैरमुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण कर लिया, उसकी जीत पक्की मानी जा रही थी. आरजेडी के मुस्लिम-यादव वोट बैंक के जवाब में बाकी जातियों का ध्रुवीकरण होता दिख रहा है. इसका सीधा फायदा जेडीयू उम्मीदवार को मिला.

-इस सीट पर करीब 18 फीसदी ब्राह्मण और राजपूत वोटर्स के अलावा 23 फीसदी वैश्य और पचपनियां जाति (5 पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों का समूह) और 22 फीसदी दलित मुसहर धानुक वोटर्स हैं. इन जातियों के ज्यादातर वोट जेडीयू के दिनेश चंद्र यादव को मिलते दिख रहे हैं.

-इस सीट के चुनाव पर नीतीश कुमार की खास नजर थी. जेडीयू से अलग होकर शरद यादव ने एक तरह से नीतीश कुमार को चुनौती दी थी. लालू के गढ़ में शरद यादव की हार नीतीश कुमार की व्यक्तिगत जीत की तरह है.
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-इस चुनाव में जनता ने स्थानीय मुद्दों को तवज्जो नहीं दी. ज्यादातर चर्चा पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक, राष्ट्रवाद और आतंकवाद पर ही रही. इसका फायदा एनडीए को मिला.

-पीएम के तौर पर नरेंद्र मोदी की मजबूत छवि और विपक्ष के कुनबे में विरोधाभासों की भरमार ने जनता का रुख एनडीए की तरफ रखा.

-पप्पू यादव के जनअधिकार पार्टी की तरफ से चुनाव में उतरने का फायदा एनडीए प्रत्याशी को ही मिला. एक ओर सुपौल से उनकी पत्नी कांग्रेस उम्मीदवार हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस के समर्थन वाली महागठबंधन उम्मीदवार के खिलाफ वो चुनाव मैदान में थे. जनता ने इस विरोधाभास के विरोध में वोट दिया.

-मधेपुरा लोकसभा सीट की 6 विधानसभा सीटों में से 3 पर जेडीयू का कब्जा है. इन विधानसभा सीटों पर जेडीयू की मजबूती ने एनडीए प्रत्य़ाशी को फायदा पहुंचाया.

-मधेपुरा की लड़ाई एक तरह से नीतीश कुमार और शरद यादव की लड़ाई थी. ये नीतीश कुमार के लिए नाक का सवाल था. इस जीत को नीतीश कुमार लालू के गढ़ में अंतिम फतह की तरह पेश कर सकते हैं.

-मधेपुरा में स्थानीय स्तर पर बहुत समस्याएं हैं. किसानों और युवा छात्रों की सबसे दयनीय स्थिति है. लेकिन किसान, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दे चुनाव को प्रभावित नहीं कर पाए.

-2014 के चुनाव में बीजेपी के विजय कुमार ने करीब ढाई लाख वोट हासिल किए थे. उस चुनाव में बीजेपी और जेडीयू अलग होकर लड़ी थी. इस बार दोनों के मिलकर लड़ने का फायदा मिला.

-जेडीयू प्रत्याशी दिनेश चंद्र यादव सहरसा लोकसभा सीट से सांसद रह चुके हैं. शरद यादव के मुकाबले उनके स्थानीय होने का फायदा मिला.

-इस सीट पर शरद यादव 4 बार जीत हासिल कर चुके हैं. लेकिन हर चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वी उनके बाहरी होने का मुद्दा उठाते हैं. एक तरफ शरद यादव का बाहरी होना दूसरी तरफ गरम मिजाज पप्पू यादव की बाहुबली वाली छवि की अपेक्षा लोगों ने स्थानीय नेता दिनेश चंद्र यादव को चुनना पसंद किया.

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