बिहार के चुनाव में यूं ही 'किंगमेकर' नहीं कहे जाते यादव वोटर, पढ़ें लालू के वोट बैंक की इनसाइड स्टोरी

बिहार की 243 विधानसभा सीटों के लिए तीन चरणों में चुनाव हो रहे हैं. जबकि वोटों की गिनती 10 नवंबर को होगी. (न्यूज़ 18 ग्राफिक्स)
बिहार की 243 विधानसभा सीटों के लिए तीन चरणों में चुनाव हो रहे हैं. जबकि वोटों की गिनती 10 नवंबर को होगी. (न्यूज़ 18 ग्राफिक्स)

Bihar Election 2020: इस बार के चुनाव में लालू (Lalu Prasad) के कैडर वोट कहे जाने वाले यादवों पर बीजेपी, जेडीयू (JDU) के साथ-साथ पप्पू यादव जैसे राजनेताओं ने भी डोरे डालने की पूरी कोशिश की है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 15, 2020, 2:22 PM IST
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सुमित झा

पटना. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Election 2020) की सियासत जाति के इर्द-गिर्द ही रही है. इस बार का चुनाव भी जाति के आसपास सिमटता नजर आ रहा है. आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने जिस यादव-मुस्लिम (M-Y) समीकरण के जरिए 15 साल तक राज किया था, उसे लेकर सियासी संग्राम छिड़ गया है. खास तौर पर आरजेडी (RJD) के परंपरागत वोट बैंक माने जाने वाले यादव को लेकर जोर आजमाइश तेज है. इसकी बानगी टिकट बंटवारे में साफ दिखी है.

जेडीयू ने इस बार के चुनाव में 19 यादव प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं, जबकि बीजेपी ने अपने कोटे के 110 उम्मीदवारों की लिस्ट में कुल 15 यादवों को जगह दी है. इसके अलावा पप्पू यादव की भी यादव वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश में हैं. हालांकि, यादवों को अपने पाले में बनाए रखने के लिए आरजेडी ने भी एक बार फिर यादवों पर भरोसा जताया है. आरजेडी ने MY समीकरण को खास तवज्जो देते हुए 52% सीटें यादव-मुस्लिम को ही दी हैं, जिसमें यादव उम्मीदवार सबसे ज्यादा हैं. तीनों चरण में 58 यादव और 17 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में होंगे.



आरजेडी-जेडीयू ने इस बार पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले ज्यादा यादव उम्मीदवार उतारे हैं. पिछली बार आरजेडी ने 48 सीटों पर यादवों को टिकट दिए थे, जिनमें से से 42 जीतने में सफल रहे थे, जबकि इस बार आरजेडी के 58 यादव उम्मीदवार हैं. वहीं, जेडीयू ने पिछले विधानसभा चुनाव में 12 टिकट यादवों को दिए थे, जिनमें से 11 ने जीत दर्ज की थी. इस बार जेडीयू ने 19 यादव उम्मीदवार उतारे हैं. हालांकि, बीजेपी ने यादवों को टिकट देने में कंजूसी की है. पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 22 टिकट यादवों को दिए थे, जिनमें से 6 जीते थे, जबकि इस बार बीजेपी ने 15 यादव उम्मीदवार ही उतारे हैं. वहीं पिछली बार कांग्रेस ने 4 पर यादव प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से दो जीतकर विधानसभा पहुंचे थे, इस बार भी कांग्रेस ने सवर्णों पर ही भरोसा जताया है.
माना जा रहा है कि यादवों का एक वर्ग आरजेडी से नाराज भी है. नाराजगी की वजह सवर्णों को लेकर आरजेडी का उमड़ा प्यार है. खास तौर पर अनंत सिंह को आरजेडी का टिकट मिलना यादवों की नाराजगी की एक बड़ी वजह मानी जा रही हैं. साल 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान यादवों को अपने पाले में लाने के लिए लालू ने जिस अनंत सिंह को गिरफ्तार करवाया था, जिस अनंत सिंह पर हर चुनावी मंच से यादव की हत्या करने का दोषी बताते रहे, आज उसी अनंत सिंह को लालू के लाल ने गले लगा लिया और मोकामा से अनंत सिंह को आरजेडी का टिकट थमा दिया.

इसके अलावा भी कई भूमिहार, राजपूत और ब्राह्मण चेहरे पर तेजस्वी ने भरोसा जताया है. माना जा रहा है कि यादवों का एक वर्ग तेजस्वी यादव के इस कदम से नाराज है, जिसका फायदा जेडीयू विशेषतौर पर उठाना चाह रही है. दरअसल, बिहार चुनाव में यादवों की अहम भूमिका रही है. माना जाता है कि यादवों का एकमुश्त वोट जिधर जाता है, सत्ता में उसकी भूमिका उतनी ही अहम हो जाती है.

बिहार की सियासत में 15 फीसदी यादव मतदाता किंगमेकर माना जाता है. पिछली बार के चुनाव में सबसे ज्यादा अगर किसी जाति का विधायक बना था तो वह यादव जाति का था. 243 सदस्यीय विधानसभा में सबसे ज्यादा 61 यादव विधायक चुनकर आए थे. बिहार के आधे से अधिक जिलों की विधानसभा सीटों पर यादवों का प्रभाव माना जाता है. बिहार की 243 सीटों में 98 सीटें यादव बाहुल्य हैं, वहीं 147 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां यादवों का प्रभाव माना जाता है. साल 2000 में बिहार में यादव विधायकों की संख्या 64 थी, जो 2005 में 54 हो गई और फिर 2010 में संख्या घटकर 39 पर आ गई थी. लेकिन, 2015 में बढ़कर फिर 61 तक पहुंच गई, ऐसे में 2020 के रण में इस बार भी नजरें यादवों पर हैं.
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