अपनी धुन में 'मस्त' CM नीतीश क्या जनमानस का मन नहीं पढ़ पा रहे?

अनुच्‍छेद 370 को हटाने के समर्थन से अल्पसंख्यक वोट फिसलने का डर रहता तो मायावती जैसी नेता कभी भी ऐसा नहीं करतीं. उन्होंने वक्त का तकाजा समझा.

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: August 8, 2019, 1:07 PM IST
अपनी धुन में 'मस्त' CM नीतीश क्या जनमानस का मन नहीं पढ़ पा रहे?
धारा 370 के मामले पर नीतीश कुमार की पार्टी ने क्यों लिया यू टर्न?
Vijay jha | News18 Bihar
Updated: August 8, 2019, 1:07 PM IST
जेडीयू ने अनुच्‍छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने के आदेश और जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल का पहले तो विरोध किया. वहीं, मंगलवार को बिल पास होने के एक दिन बाद ही अपना रुख बदल लिया. जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद आरसीपी सिंह ने दो टूक कहा कि अब यह कानून बन गया है और कानून पूर देश में लागू होता है. ऐसे में हम सभी को इसका पालन करना चाहिए. जाहिर है जेडीयू के इस यू टर्न से सवाल उठने लगा है कि क्या बिहार की राजनीति में बीजेपी ने नीतीश कुमार को बैकफुट पर भेज दिया है?

धुर विरोधी पार्टियों ने भी किया समर्थन
दरअसल, अनुच्‍छेद 370 के निष्प्रभावी होने और जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल पर बीजेडी, अन्‍नाद्रमुक, वाईआरसीपी जैसी पार्टियों के साथ बीजेपी की धुर विरोधी बीएसपी, टीडीपी और टीआरएस जैसे दल भी केंद्र सरकार के साथ खड़ी हो गईं. हद तो यह हुई कि कांग्रेस में भी इस मसले पर फूट पड़ गई और उनके बड़े नेताओं ने व्हिप जारी होने के बाद भी पार्टी से अलग रुख अपना लिया.

एनडीए में अलग-थलग पड़ी जेडीयू

यही नहीं जेडीयू को छोड़ एनडीए में शामिल शिवसेना और शिरोमणि अकाली दल समेत सभी दलों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया. यहां तक कि एक समय बिहार में अल्पसंख्यक मुख्यमंत्री की वकालत करने वाली लोजपा ने भी अब केन्द्र के फैसले का समर्थन कर दिया. ऐसे में इस बिल का विरोध करने की वजह से नीतीश कुमार एनडीए में अलग-थलग पड़ गए हैं. माना जा रहा है कि जेडीयू ने बिहार में अपने राजनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए अलग स्टैंड लिया. परंतु सवाल ये है कि इससे क्या नुकसान हुआ?

बालाकोट हमले के विरोध ने आरजेडी को डुबोया
दरअसल बालाकोट हमले की सत्यता पर सवाल खड़े करने का जितना खामियाजा आरजेडी को भुगतना पड़ा है यह किसी से छिपा नहीं है. लोकसभा चुनाव में पार्टी को एक अदद सीट भी नहीं मिल सकी और 'ऑल टाइम वर्स्ट' प्रदर्शन किया. जानकारों की मानें तो देश का नैरेटिव में बड़ा बदलाव आया है. क्षेत्रीय हितों के साथ-साथ अब राष्ट्र हित भी अहम माने जाना लगा है. युवा वोटरों की बढ़ती भागीदारी के कारण अब वोटिंग पैटर्न भी बदल चुका है.
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जनमानस को पढ़ पाने में नाकाम रही आरजेडी की लोकसभा चुनाव में करारी हार हुई.


जनमानस से जुड़ गई मोदी सरकार
वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि जम्मू कश्मीर को देश के सभी नागरिकों के लिए सुलभ बनाना, एक ऐतिहासिक फैसला है. जो भाजपा के समर्थक नहीं हैं, वे भी इस फैसले से खुश नजर आ रहे हैं. धारा 370 को हटाने के फैसले ने जनमानस को मोदी सरकार से जोड़ दिया है. यहां तक कि कई मुस्लिम संगठनों ने भी मोदी सरकार को इसके लिए शुक्रिया कहा है. इसका विरोध कर के नीतीश कुमार शायद रॉंग नम्बर डायल कर दिया.

नीतीश को किस बात का सता रहा है डर?
वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार के अनुसार नीतीश कुमार के डर को इस बात से भी समझा जा सकता है कि उनके करीबी जेडीयू नेता आरसीपी सिंह ने कहा कि बिहार की सबसे बड़ी पार्टी जेडीयू है, इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए. जाहिर है यह उस बात की आशंका का प्रकटीकरण ही है जिसमें अब तक बड़े भाई की भूमिका के तौर पर रही जेडीयू के बीजेपी के सामने बैकफुट पर जाने का खतरा है. सवाल यह कि क्या बिहार की राजनीति भी बदलती लग रही है?

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बिहार के युवा वोटरों का मिजाज जाति से बाहर राष्ट्रीय हितों के मुद्दों की ओर झुकता जा रहा है.


अति पिछड़ी जातियों ने बदला पाला तो...
बकौल अशोक शर्मा बदली परिस्थितियों में जिन अत्यंत पिछड़ी जातियों के भरोसे नीतीश कुमार गेम खेलने के लिए तैयार बैठे हैं अगर उनके युवा वोटरों ने इरादा बदल दिया तो क्या होगा ? इस मामले में बिहार के नौजवान जाति, और समुदाय से ऊपर उठ कर जोश से लबरेज नजर आ रहे हैं. अगर उन्होंने क्रांतिकारी फैसले का समर्थन कर दिया तो जेडीयू के मंसूबे मिट्टी में मिल जाएंगे. यही नहीं जेडीयू के दोहरे मानदंड को अल्पसंख्यक समुदाय भी बखूबी समुदाय समझ रहा है.

मायावती ने समझा वक्त का तकाजा
अशोक शर्मा कहते हैं कि सवाल ये भी है कि अगर अुच्छेद 370 को हटाने के समर्थन से अल्पसंख्यक वोट फिसलने का डर रहता तो मायावती जैसी नेता कभी भी ऐसा नहीं करतीं. वे तो उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ लड़ाई लड़ रही हैं. फिर भी उन्होंने वक्त का तकाजा समझा. ऐसा लग रहा है कि अपनी धुन में मस्त नीतीश जनमानस का मन पढ़ नहीं पा रहे हैं.

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First published: August 8, 2019, 12:10 PM IST
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