Analysis: जिन पार्टियों के फेवरेट थे लालू अब उन्होंने ही RJD से क्यों बना ली दूरी?

इस बीच आरजेडी की ओर से राबड़ी आवास पर इफ्तार पार्टी हुई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग आए. लेकिन उस इफ्तार में कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए तेजस्वी नहीं आए.

Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: June 5, 2019, 8:33 PM IST
Analysis: जिन पार्टियों के फेवरेट थे लालू अब उन्होंने ही RJD से क्यों बना ली दूरी?
लालू यादव (File Photo)
Deepak Priyadarshi
Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: June 5, 2019, 8:33 PM IST
लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम ने बिहार में महागठबंधन की सभी पार्टियों को बैकफुट पर खड़ा कर दिया है. लेकिन इन सबमें सबसे अधिक फजीहत आरजेडी की हुई है. महागठबंधन की अगुवाई करने वाली आरजेडी एक भी सीट नहीं जीत सकी. लोकसभा रिजल्ट ने आरजेडी के इतिहास पर ही दाग लगा दिया कि आरजेडी का एक भी सांसद लोकसभा में नहीं दिखेगा.

अब हालत यह है कि रिजल्ट आने के बाद से आरजेडी के मौजूदा सबसे बड़े नेता बने तेजस्वी यादव दिल्ली से वापस लौटने का नाम ही नहीं ले रहे और न ही कुछ बोल रहे हैं. पूरी पार्टी में सन्नाटा सा छाया हुआ है. सहयोगी दल भी अब इधर उधर छिटकने लगे हैं. पार्टी की हालत तो यह हो गई है कि रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे बड़े नेता आरजेडी को वापस ट्रैक पर लाने के लिए तेजस्वी की तरफ नहीं बल्कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तरफ देख रहे हैं. क्योंकि उन जैसे नेताओं को ऐसा लग रहा है कि 2015 में जिस तरह लालू-नीतीश एकजुट हुए थे, उस समय भी मुश्किलों में खड़ी आजेडी को संजीवनी मिली थी. अगर इस बार भी नीतीश कुमार फिर से साथ आ गए तो हताशा में जा रही आरजेडी फिर से अपने पैरों पर खड़ी होने लगेगी.

तेजस्वी यादव (File Photo)


लोकसभा में मिली हार के बाद बदली स्थितियां

लोकसभा की हार ने नेता से लेकर कार्यकर्ताओं को हिलाकर रख दिया है. हार की समीक्षा को लेकर जब बैठक हुई तो तेजस्वी के नेता बने रहने पर सभी ने अपनी सहमति तो दे दी, लेकिन सभी यह मान भी रहे कि रणनीति बनाने, मुद्दे चुनने, उम्मीदवार तय करने में भारी चूक हुई. जिसरा खामियाजा पार्टी को उठना पडा. पार्टी के बड़े नेताओं में नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि चुनाव के दौरान सभी को दरकिनार कर तेजस्वी यादव ने वही किया, जो वे चाहते थे.

इफ्तार पार्टी में नहीं आए तेजस्वी

इस बीच आरजेडी की ओर से राबड़ी आवास पर इफ्तार पार्टी हुई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग आए. लेकिन उस इफ्तार में कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए तेजस्वी नहीं आए. यहां तक कि सहयोगी दलों के बड़े नेताओं ने भी दूरी बनाकर रखी. कांग्रेस तो अभी इस कदर आरजेडी से छिटक गई है कि न तो उसके नेता समीक्षा में ही गए, न ही इफ्तार में. हालांकि इस बात की भी संभावना पूरी है कि अगर इस हालात में चुनाव तक आरजेडी टूट होगी तो टूट कांग्रेस में भी संभव है.
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2020 विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू 

बिहार की मौजूदा राजनीतिक हालात में अब सभी पार्टियां 2020 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गई हैं. एनडीए में नीतीश कुमार तल्ख अंदाज भी विधानसभा चुनाव से ही जोड़कर देखा जा रहा है. लेकिन आरजेडी की ओर से कोई हलचल नहीं है. हालांकि रघुवंश प्रसाद सिंह के नीतीश कुमार को एक मंच पर वापस लाने के बयान ने कुछ सुगबुगाहट जरूर पैदा कर दी है. रघुवंश सिंह का यह बयान कि राजनीति में कोई दोस्त दुश्मन नहीं होता. अब एकजुटता जरूरी है. रघुवंश सिंह की यह कोशिश इस मायने में अहम दिख रही है कि अगर पूरा पिछड़ा वर्ग एकजुट होगा तो इसका लाभ आरजेडी को मिलेगा. साथ ही यह तेजस्वी के उस बयान को जबाव भी है, जिसमें तेजस्वी यादव ने कहा था कि नीतीश कुमार के लिए महागठबंधन के रास्ते बंद हैं.

(File Photo)


इससे साफ जाहिर है कि अब तक जो हुआ सो हुआ, लेकिन अब पार्टी में सिर्फ अकेले तेजस्वी के फैसले सर्वमान्य नहीं होंगे. इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि चुनाव से पहले आरजेडी में कहीं टूट न हो जाए. जाहिर है कि रघुवंश प्रसाद सिंह का यह बयान इस संदर्भ में भी महत्वपूर्ण होता है कि अब आरजेडी को नीतीश कुमार की जरूरत है. लेकिन नीतीश कुमार को आरजेडी की जरूरत है या नहीं, यह कहना मुश्किल है. क्योंकि नीतीश कुमार ने सिवाए जीतनराम मांझी को छोड़कर किसी भी नेता में दिलचस्पी नहीं दिखाई है.

नीतीश कुमार होंगे किसके साथ ?

लेकिन यह सब इतना आसान भी नहीं होगा. नीतीश कुमार की तल्खी उन्हें अलग राह पर ले जाएगी या नहीं, नीतीश कुमार आरजेडी के साथ मिलकर अपनी राह बनाएंगे या फिर जिस अलग राह पर वे चलेंगे, उसमें आरजेडी को अपने साथ रखेंगे या नहीं, फिलहाल यह कहना मुश्किल है. लेकिन जब मोदी मंत्रिमंडल में जेडीयू की सांकेतिक भागीदारी नीतीश कुमार को इतनी चुभ सकती है तो तेजस्वी यादव के बार बार पलटू चाचा के शब्दों को इतनी आसानी से नीतीश कुमार भुला देंगे, यह भी मुश्किल ही है.

बहरहाल आरजडी अभी मुश्किलों में है. खुद उसके सहयोगी उसके साथ कितना और कहां तक साथ निभाएंगे, कहना मुश्किल है. जीतनराम मांझी की पार्टी हम और कांग्रेस ने तो इसके खुलकर इसके संकेत दे दिए भी दिए हैं. कहीं एक समय पर पूरा विपक्ष एकजुट रखने वाली आरजेडी आने वाले दिनों में अलग थलग न पड़ जाए.

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First published: June 5, 2019, 6:58 PM IST
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