Analysis: तेजस्वी के नीतीश पर लगाए आरोप क्या सिर्फ चुनावी माइलेज के लिए या फिर कुछ और?

सितम्बर 2018 को सक्रिय राजनीति में आए कभी रणनीतिकार और अब जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर के बारे में यह माना गया कि वे नहीं चाहते थे कि जेडीयू और बीजेपी फिर से एक साथ आए.

Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: April 15, 2019, 5:33 PM IST
Analysis: तेजस्वी के नीतीश पर लगाए आरोप क्या सिर्फ चुनावी माइलेज के लिए या फिर कुछ और?
File Photo
Deepak Priyadarshi
Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: April 15, 2019, 5:33 PM IST
लोकसभा चुनाव के बीच बिहार की राजनीति में इन दिनों एक भूचाल सा है. वह भूचाल यह कि क्या वाकई नीतीश कुमार बीजेपी के साथ आने के छह महीने बाद ही महागठबंधन में फिर से लौटने को बेताब थे? क्या वापसी करने को लेकर प्रशांत किशोर के जरिए उन्होंने कई बार लालू यादव के पास प्रस्ताव भेजा? क्या आरजेडी से प्रस्ताव ठुकराने के बाद नीतीश कुमार ने जेडीयू के कांग्रेस में मर्जर का प्रस्ताव कांग्रेस आलाकमान तक भिजवाया था? अभी नेटवर्क 18 के एडिटर इन चीफ राहुल जोशी को साथ खास बातचीत में तेजस्वी यादव ने ये आरोप नीतीश कुमार पर मढ़ा भी, इसका दावा भी किया. इसके बाद बिहार के सियासी हलकों में भूचाल तो आया, लेकिन महागठबंधन में सहयोगी कांग्रेस ने तेजस्वी यादव के आरोपों और दावों से तुरंत खुद को किनारे कर लिया कि इस तरह का प्रस्ताव कांग्रेस के पास आया ही नहीं.

इस पूरी कहानी की शुरुआत तब हुई, जब पहले चरण के लोकसभा चुनाव से कुछ ही दिनों पहले आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की आत्मकथा 'गोपालगंज टू रायसीना' आई. इस किताब में लालू प्रसाद ने इस कहानी का जिक्र किया कि कैसे आरजेडी से अलग होने के बाद से ही नीतीश कुमार ने फिर से अलग होने और फिर से आरजेडी के साथ आने की बेताबी थी. उसके बाद लालू प्रसाद यादव की पत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने बोल दिया कि फिर से नीतीश कुमार का प्रस्ताव लेकर प्रशांत किशोर कई बार लालू प्रसाद यादव से मिले. राबड़ी देवी ने कहा कि प्रस्ताव को न सिर्फ ठुकराया गया बल्कि प्रशांत किशोर को उन्होंने बाहर कर दिया. इसके बाद प्रशांत किशोर ने ट्वीट कर पलटवार किया कि अगर वे मुंह खोल देंगे तो लालू प्रसाद यादव जबाव नहीं दे पाएंगे.



प्रशांत किशोर (File Photo)


16 जून 2013 को बीजेपी और जेडीयू की 17 साल पुरानी दोस्ती टूट गई थी. इसकी वजह यह मानी गई कि 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार खुद को पीएम कैंडिडेट के रूप में देख रहे थे, लेकिन बीजेपी ने नरेन्द्र मोदी को अपना पीएम कैंडिडेट बना दिया. यह दोस्ती टूटते ही नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव के साथ हो गए. हालांकि इसके बाद भी लोकसभा चुनाव में जेडीयू आरजेडी से अलग लड़ी, जिसमें जेडीयू की काफी बुरी हार मिली. राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो इस हार ने नीतीश कुमार को हिलाकर रख दिया. इसी कारण 2015 का विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार, लालू के साथ मिलकर लड़े और बीजेपी को बुरी तरह शिकस्त दी थी. वह भी तब जबकि उस समय जबरदस्त मोदी लहर थी.

यह भी पढ़ें- Exclusive: तेजस्वी ने क्यों कहा- नीतीश जी और मोदी जी का साथ रहना और दिखना मजबूरी

लेकिन बड़े भाई-छोटे भाई का यह साथ बहुत दिनों तक नहीं रहा और 26 जुलाई 2017 को इस तर्क के साथ नीतीश कुमार ने आरजेडी का साथ छोड़ दिया कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति से समझौता नहीं कर सकते. और बीजेपी के साथ फिर हो गए. लेकिन 2018 में मध्य से लगातार यह खबर मीडिया में छन छनकर आती रही कि नीतीश कुमार फिर से आरजेडी के साथ होना चाहते हैं.

नीतीश और प्रशांत किशोर (File Photo)

Loading...

सितम्बर 2018 को सक्रिय राजनीति में आए कभी रणनीतिकार और अब जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर के बारे में यह माना गया कि वे नहीं चाहते थे कि जेडीयू और बीजेपी फिर से एक साथ आए. मार्च 2019 के पहले सप्ताह में प्रशांत किशोर के हवाले से एक चर्चा मीडिया में आई थी कि नीतीश कुमार को 2017 में नया जनादेश मांगना चाहिए था. उस समय राजनीतिक हलकों में ये भी कहा जाने लगा था कि खुद प्रशांत किशोर इससे खुश नहीं थे कि जेडीयू बीजेपी फिर एक साथ आएं. वे चाहते थे कि नीतीश कुमार को चुनाव में जाना चाहिए था. लेकिन प्रशांत किशोर की इस सोच का खुद आरसीपी सिंह ने खंडन कर दिया था. प्रशांत किशोर लालू यादव से संपर्क में है, इसकी भी चर्चा खुद नीतीश कुमार ने नेटवर्क 18 के एडिटर इन चीफ राहुल जोशी के साथ खास बातचीत में की थी. यह भी माना गया कि इस तरह के घटनाक्रम के बाद प्रशांत किशोर जेडीयू की राजनीतिक गतिविधि से दूर होने लगे.

यह भी पढ़ें- Exclusive- तेजस्‍वी का बड़ा आरोप- JDU का कांग्रेस में विलय चाहते थे CM नीतीश

तेजस्वी यादव ने इस मामले को तब उठाया है जब लोकसभा चुनाव का एक चरण पूरा हो गया और दूसरा चरण होने को है. जाहिर है कि राजनीति में इस तरह के बयान सटीक मौके को भुनाने के लिए ही दिए जाते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक कन्हैया भेलारी का मानना है कि यह बयान राजनीतिक लाभ के लिए ही है. लेकिन इससे बहुत लाभ मिलेगा, इसकी संभावना कम है. क्योंकि तेजस्वी यादव को अपने वोटरों को यह समझाने में मशक्कत करनी होगी कि नीतीश कुमार पर भरोसा नहीं किया जा सकता.


कभी बीजेपी के नेता रहे और अब राजनीतिक समीक्षक हरेन्द्र प्रताप का कहना है कि इस मामले के उठने से नीतीश कुमार के ऊपर सवाल खड़े तो होते हैं. लेकिन लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार फैक्टर नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी फैक्टर हैं. अगर यह विधानसभा होता तो नीतीश कुमार के लिए ज्यादा मुश्किल होती.

बहरहाल, तेजस्वी के हर आरोप से कांग्रेस ने तो किनारा कर लिया है. वहीं जेडीयू और बीजेपी के नेता और प्रवक्ता इसे आरजेडी की हताशा बताकर खंडन कर रहे हैं. लेकिन नीतीश जी चुप है.

ये भी पढ़ें--

Analysis: BJP ने बनाया मास्टर प्लान, फिरोजाबाद में ऐसे टूटेगा यादव परिवार का 'तिलिस्म'

सरकार बनने पर फिर से संसद में लाएंगे तीन तलाक का बिल: पीएम नरेंद्र मोदी

ढाई साल चलेगा SP-BSP गठबंधन, विश्वास के लायक नहीं माया-अखिलेश: शिवपाल

Analysis: पूर्वांचल में BJP की चाल से 'कमल' को घेरने की कोशिश में कांग्रेस, चला ये बड़ा दांव!

एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएंगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी WhatsApp अपडेट्स
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...

News18 चुनाव टूलबार

  • 30
  • 24
  • 60
  • 60
चुनाव टूलबार