क्या लालू की विरासत को संभालने में नाकाम साबित हुए तेज-तेजस्वी?

Deepak Priyadarshi | News18Hindi
Updated: August 30, 2019, 4:58 PM IST
क्या लालू की विरासत को संभालने में नाकाम साबित हुए तेज-तेजस्वी?
क्‍या लालू प्रसाद यादव की विरासत को संभालने में नाकाम रहे हैं तेज और तेजस्‍वी?

आरजेडी (RJD) के मुकाबले भले ही एलजेपी (LJP) थोडी छोटी पार्टी हो, लेकिन अपने पिता रामविलास पासवान (Ramvilas Paswan) की राजनीतिक विरासत को संभालने के मामले में चिराग लालू यादव (Lalu yadav) के बेटों से कहीं आगे निकल गए.

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आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) ने बिहार में अपनी एक राजनीतिक विरासत बनायी. जिसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अपने बेटों को सौंपी. खासकर तेजस्वी यादव (Tejaswi Yadav) को, जिन्हें लालू यादव ने सार्वजनिक मंच से अपना उत्तराधिकार सौंपा. लेकिन आज लालू प्रसाद यादव की वही राजनीतिक विरासत सवालों के घेरे में है.

लोकसभा चुनाव के दौरान लालू-राबडी के दोनों बेटे तेजप्रताप और तेजस्वी के बीच की खाई का ऐसा असर हुआ कि पूरी आरजेडी (RJD) शून्य पर आ गयी. हद तो तब हो गयी कि चुनाव के परिणाम आते ही तेजस्वी यादव गायब हो गए और बडे बेटे तेजप्रताप (Tej Pratap) धूनी रमाने और बासुंरी बजाने में मग्न हो गए. वह भी तब जब पार्टी के गिरते मनोबल को संभालने के लिए लालू यादव की गैर-मौजूदगी में दोनों बेटों का एक साथ खड़े रहना बेहद जरूरी था. एक ओर तेज-तेजस्वी के कारण लालू यादव की विरासत हाशिए पर जाने लगी तो वहीं दूसरी ओर पिता की राजनीतिक विरासत को आगे ले जाने में एलजेपी सुप्रीमो रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान कुछ हद तक सफल रहे.

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही अपनी एक छाप छोड़ी. लालू स्टाइल का जलवा यह रहा कि एक समय में हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने उनके मैनेंजमेंट स्किल का आकर अध्ययन किया. साथ ही अपने छात्रों को संबोधित करने के लिए भी बुलाया. एक समय में लालू प्रसाद यादव बिहार और केन्द्र में पावर सेंटर बने. मुसलमानों और यादवों (Muslims and Ydav) के साथ मिलकर चर्चित एमवाई समीकरण को स्थापित कर दिया. विकास में गरीब-गुरबा की बात करके बिहार के जनमानस को अपना मुरीद बना लिया. लेकिन लालू यादव ने सपने में नहीं सोचा होगा कि जिस राजनीतिक पूंजी को उन्होंने अपने खून पसीने से सींचकर जमा किया, वह एक झटके में उनके लाल खत्म कर देंगे.

राजनीतिक समझ अधिक होने के कारण लालू यादव ने अपने छोटे बेटे तेजस्वी को उत्तराधिकारी बनाया.
राजनीतिक समझ अधिक होने के कारण लालू यादव ने अपने छोटे बेटे तेजस्वी को उत्तराधिकारी बनाया.


पहले बात तेजस्वी की
लालू-राबड़ी के दोनों बेटों ने राजनीतिक जीवन में प्रवेश किया तो लगा कि जिस विरासत को लालू यादव ने स्थापित किया उसे उनके बेटे कहीं आगे ले जाएंगे. राजनीतिक समझ अधिक होने के कारण लालू यादव ने अपने छोटे बेटे तेजस्वी को उत्तराधिकारी बनाया. चारा घोटाले में जेल में होने के कारण तेजस्वी ने लोकसभा चुनाव में न सिर्फ आरजेडी बल्कि पूरे महागठबंधन का नेतृत्व किया. यह वह जमीन थी जहां से तेजस्वी न सिर्फ नेता बल्कि बडे नेता के रूप में स्थापित होते. लेकिन तेजस्वी ने अपने कथित एटीट्यूड में अपने बड़े भाई तेजप्रताप और बड़ी बहन मीसा को साइडलाइन किया और अपनी पार्टी के दिग्गज नेताओं को भी नहीं पूछा. परिवार के अंर्तकलह और एकतरफा फैसलों ने पार्टी को शून्य पर लाकर खड़ा कर दिया. लेकिन हद तो तब हो गयी कि रिजल्ट आने के तुरंत बाद बीमारी के नाम पर ऐसे गायब हुए कि किसी को पता तक नहीं चला कि वे आखिर है कहां. लालू प्रसाद यादव ने भी कई बार बुरा दौर देखा लेकिन कभी भी पीठ नहीं दिखायी. लेकिन उनके उत्तराधिकारी पहली ही परीक्षा में फेल होकर मैदान छोड़कर चल दिए.

जब तेजस्वी गायब हुए तो पार्टी को संभालने के लिए आगे आने की बजाए तेजप्रताप कभी बांसुरी बजाने लगे तो कभी भभूत लगाकर भगवान शंकर का रुप धर लिया तो कभी कृष्ण बनकर कृष्णलीला करने में लगे रहे.
जब तेजस्वी गायब हुए तो पार्टी को संभालने के लिए आगे आने की बजाए तेजप्रताप कभी बांसुरी बजाने लगे तो कभी भभूत लगाकर भगवान शंकर का रुप धर लिया तो कभी कृष्ण बनकर कृष्णलीला करने में लगे रहे.

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अब बात तेजप्रताप की
तेजस्वी की पार्टी की कमान संभालने से भड़के तेजप्रताप बार-बार यह कहते रहे कि लालू की विरासत संभालने का असल माद्दा उनमें ही है. उनमें ऐसा क्या नहीं है जो तेजस्वी में है. कई बार उन्होंने वहीं स्टाइल कॉपी करने की कोशिश की, लेकिन वह राजनीतिक समझ की झलक नहीं दिखा पाए, जो लालू यादव में थी. टिकट बंटवारे में हिस्सेदारी को लेकर पूरे चुनाव उन्होंने जो कुछ भी किया, उसका भी खमियाजा पार्टी को भुगतना पडा. जब तेजस्वी गायब हुए तो पार्टी को संभालने के लिए आगे आने की बजाए कभी बांसुरी बजाने लगे तो कभी भभूत लगाकर भगवान शंकर का रूप धर लिया तो कभी कृष्ण बनकर कृष्णलीला करने में लगे रहे. कुल मिलाकर न कृष्ण रूपी तेजप्रताप को अर्जुन रूपी अपने भाई तेजस्वी की परवाह रही और न ही अर्जुन को कृष्ण की.

वहीं दूसरी ओर, एलजेपी सुप्रीमो रामविलास पासवान ने भी अपने बेटे चिराग पासवान को राजनीति में उतारा. रामविलास पासवान ने भी बिहार से लेकर देश में अपनी एक विरासत के रूप में पहचान बनायी. आरजेडी के मुकाबले भले ही एलजेपी थोडी छोटी पार्टी हो, लेकिन अपने पिता की राजनीतिक विरासत को संभालने के मामले में चिराग लालू यादव के बेटों से कहीं आगे निकल गए. पिता रामविलास पासवान ने पार्टी की कमान तक सौंप दी, लेकिन बगैर पिता की मर्जी के उन्होंने कोई फैसला अकेले नहीं किया. चिराग पासवान की बढ़ती राजनीतिक समझ की खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी तारीफ कर चुके हैं.

कुल मिलाकर, लालू यादव ने जिस राजनीतिक विरासत को जी जान से बनाया, आज उसी के अस्तित्व पर संकट है. जिस लालू यादव के फैसले पर कोई सवाल खड़ा करने की हिमाकत नहीं करता था, आज उसी आरजेडी की हालत यह है कि कोई अब तेजस्वी को नेता तक मानने को तैयार नहीं है. अब देखना है कि लोकसभा में शून्य पर आई आरजेडी अपने इस उत्तराधिकारी के भरोसे विधानसभा में कितने अंक ला पाती है.

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First published: August 30, 2019, 12:51 PM IST
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