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...तो क्या अरविंद केजरीवाल की जीत ने पक्की कर दी है CM नीतीश की जीत?

News18 Bihar
Updated: February 13, 2020, 7:49 PM IST
...तो क्या अरविंद केजरीवाल की जीत ने पक्की कर दी है CM नीतीश की जीत?
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो)

सीएम नीतीश कुमार (Nitish Kumar) भी अपना फोकस जनहित के मुद्दों पर ही करते रहे हैं. इसलिए दिल्ली विधानसभा चुनाव में एनडीए की हार के बावजूद बिहार में सीएम नीतीश कुमार के जीत की संभावना देखी जा रही है.

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पटना. दिल्ली विधानसभा चुनाव  (Delhi Assembly Elections) में आम आदमी पार्टी (AAP) ने बंपर जीत हासिल की. कहा जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल (Arwind Kejriwal) का जनता से सीधा कनेक्शन और जनहित के मुद्दों को तरजीह दिए जाने का दिल्ली के लोगों ने उन्हें इनाम दिया है. राजनीतिक जानकारों की राय में दिल्ली का चुनाव ये पैटर्न सेट करता दिख रहा है कि विधानसभा के चुनाव में स्थानीय मुद्दे ही हावी रहेंगे और जो भी जनता के हित की बात करेगा उसे लोग सिर आंखों पर बिठाएंगे. बिहार के संदर्भ में भी कुछ-कुछ यही बात साबित होती लगती है.

दरअसल सीएम नीतीश कुमार (Nitish Kumar) भी अपना फोकस जनहित के मुद्दों पर ही करते रहे हैं. इसलिए दिल्ली विधानसभा चुनाव में एनडीए की हार के बावजूद बिहार में सीएम नीतीश कुमार के जीत की संभावना देखी जा रही है. गौरतलब है कि केजरीवाल के राजनीति में आने से बहुत पहले ही सीएम नीतीश ने जनता से जुड़े काम को ही अपना मूल मंत्र बना रखा है. सवाल यही है कि क्या बिहार में इस बार बीजेपी के एजेंडे पर नहीं बल्कि नीतीश कुमार अपने एजेंडे पर चुनाव लड़ने जा रहे हैं.

सीएम नीतीश कई वादे पूरे किए
वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि वर्ष 2005 में जब नीतीश कुमार सीएम बने तो सबसे प्रमुख मुद्दा कानून-व्यवस्था का था. चुनाव के दौरान नीतीश कुमार ने वादा किया था कि वे कानून-व्यवस्था सुधारकर रहेंगे. उन्होंने इसे पूरा किया और आज भी सीएम नीतीश कुमार का 2005 से 2010 का कार्यकाल इस वजह से खास तौर पर याद किया जाता है. हालांकि हाल के दिनों में लॉ एंड ऑर्डर को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं, लेकिन लालू-राबड़ी काल में अपराध से त्रस्त जनता आज भी सीएम नीतीश को इसका क्रेडिट देते हैं.

अपने एजेंडे पर चलते रहे नीतीश
बकौल अशोकर कुमार शर्मा 2010 का चुनाव उन्होंने अपना वादा पूर करने की बात पर लड़ा और अभूतपूर्व जीत हासिल की. यही वह दौर था जब जेडीयू और बीजेपी के बीच तल्खी बढ़ने लगी थी. भाजपा के साथ रहने के बावजूद उन्होंने अपना एजेंडा नहीं छोड़ा और आगे बढ़ते रहे. भाजपा से अलग हुए तो 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने वादा किया था कि घर-घर बिजली नहीं पहुंची तो हम वोट मांगने नहीं आएंगे. वह इस पर कायम भी रहे और वादा पूरा भी कर दिखाया.

जनमानस के जेहन में जगह बनाईवरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि 2015 के विधानसभा चुनाव भी नीतीश अपने काम के नाम पर ही लड़े. राजद की मंडलवादी राजनीति जारी रही तो सीएम नीतीश ने विकास के मुद्दे को ही आधार बनाया. आरजेडी के भीतरी तौर पर विरोध के बाद भी शराबबंदी लागू की. दहेज प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ अभियान चलाया. 2010 से लेकर अब तक उन्होंने स्कूलों की दशा-दिशा सुधारी और साइकिल-पोशाक योजना के साथ महादलितों के विकास के लिए अलग से कई योजनाओं के आसरे वे से जनमानस के जेहन में समाते चले गए.

काम के आधार पर लड़ेंगे चुनाव
रवि उपाध्याय कहते हैं कि 2015 में वे सात निश्चय योजना लेकर आए और वे इस पर आगे बढ़ रहे हैं. हर घर नल का जल और जल जीवन हरियाली अभियान जैसे खास एजेंडे के साथ वे आगे बढ़ते जा रहे हैं. जाहिर है इसी वर्ष होने जा रहे विधानसभा चुनाव में भी नीतीश कुमार विकास या कामकाज के आधार पर ही आगे बढ़ने वाले हैं. अब जब दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की जनहित की राजनीति ने अपना झंडा गाड़ दिया है तो ऐसे में राजनीतिक जानकार यही कहते हैं कि सीएम नीतीश कुमार भी जनहित के मुद्दों पर ही चुनाव लड़ेंगे और जनता उन्हें फिर से आशीर्वाद देने में हिचकेगी नहीं.

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First published: February 13, 2020, 4:11 PM IST
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