बिहार चुनाव: राजद के 42 में 19 यादव कैंडिडेट! जानें तेजस्वी के 'नतमस्तक' रहने की असल कहानी

तेजस्वी यादव और लालू प्रसाद यादव (फाइल फोटो)
तेजस्वी यादव और लालू प्रसाद यादव (फाइल फोटो)

हाल में चंद्रिका राय, जयवर्धन यादव (राम लखन सिंह यादव के पोते) जैसे कई यादव नेता जेडीयू में शामिल हो चुके हैं. वहीं लालू (Lalu) के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव (Tej Pratap Yadav) और उनकी बहू ऐश्वर्या राय (Aishwarya Rai) के बीच तलाक के मामले से यादवों में लालू परिवार के लिए परसेप्शन बदला है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 8, 2020, 8:53 AM IST
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पटना. राष्ट्रीय जनता दल (RJD)ने अभी तक जिन 42 उम्मीदवारों को पार्टी सिंबल बांटा है, उनमें अच्छे खासे यादव प्रत्याशी हैं. पहले लिस्ट में 19 यादव प्रत्याशी आरजेडी ने उतारे हैं, जिसके चलते तेजस्वी यादव ( Tejaswi yadav) पर सवाल खड़े हो रहे हैं कि वह अपनी जातिवादी मानसिकता को छोड़ नहीं पा रहे हैं. दरअसल, पिछले कुछ समय से तेजस्वी लगातार यह कहते आ रहे हैं कि आरजेडी A-Z यानी सर्वसमाज की पार्टी है. हालांकि तेजस्वी के सामने भी सियासी मजबूरी उभरकर आ गई है और वह भी अपने परंपरागत वोट बैंक के आगे नतमस्तक होने को मजबूर दिख रहे हैं.

दरअसल बिहार में यादव मतदाता 15 से 16 प्रतिशत के करीब है और मुस्लिम भी करीब 17 प्रतिशत माना जाता है. बिहार की सियासत को देखें तो करीब 17 प्रतिशत आबादी वाले मुस्लिम समुदाय के मतों में बिखराव भी होता रहा है और वह जेडीयू से भी जुड़े हैं. लेकिन, यादव को आरजेडी का परंपरागत वोटर माना जाता है. हालांकि लालू प्रसाद की आरजेडी के इस मूल वोट बैंक यादव समुदाय पर बीजेपी और जेडीयू की नजर है.

हाल में चंद्रिका राय, जयवर्धन यादव (राम लखन सिंह यादव के पोते) जैसे कई यादव नेता जेडीयू में शामिल हो चुके हैं. वहीं लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव और उनकी बहू ऐश्वर्या राय के बीच तलाक के मामले से यादवों में लालू परिवार के लिए परसेप्शन बदला है. जाहिर है तेजस्वी इस बात को भलिभांति जानते हैं और अपने आधार वोट को नाराज नहीं करना चाहते हैं. हालांकि पप्पू यादव जैसे नेता भी लगातार यादव वोटों को अपनी ओर गोलबंद करने की जुगत में लगे हुए हैं.



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बता दें कि 2000 में बिहार में यादव विधायकों की संख्या 64 थी. 2005 में यह 54 हो गई. इसके बाद   2010 में संख्या घट गई और 39 पर आ गई. लेकिन 2015 में फिर बढ़कर 61 पहुंच गई. गौरतलब है कि 2015 के विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी ने 101 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें उसने 48 सीटों पर यादवों को टिकट दिए थे. इनमें से 42 पर जीत मिली थी.

दूसरी ओर नीतीश कुमार अतिपिछड़ों के सर्वमान्य नेता माने जाते हैं. 2015 में इसी रणनीति के तहत यादव राजनीति को बैलेंस करने के लिए 101 सीटों पर लड़ी जेडीयू ने भी 12 टिकट यादवों को दिए थे, जिनमें से 11 ने जीत दर्ज की थी. कांग्रेस ने 41 सीटों में से 4 पर यादव प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से दो जीतकर विधानसभा पहुंचे थे.

बिहार की सियासत में  भाजपा को सवर्णों की पार्टी मानी जाती है, लेकिन बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए ने भी 2015 के चुनाव में यादव राजनीति को साधने की कोशिश की थी. एनडीए ने कुल 26 यादव प्रत्याशियों को उतारा था जिनमें 22 बीजेपी, दो एलजेपी और दो मांझी की पार्टी हम की ओर से थे. बीजेपी से 6 यादव विधायक जीतकर आए थे.


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जाहिर है यादवों को अपनी ओर करने के लिए दोनों ही ओर से रस्साकशी का दौर जारी है. दरअसल दोनों ही खेमों को इस सियासी समीकरण की मजबूरी और मजबूती दोनों ही पता है. एनडीए जानता है कि मुस्लिम और यादव समूह में सेंधमारी हुई तो जीत की राह आसान होगी.


वहीं, तेजस्वी यादव किसी भी कीमत पर पिता लालू यादव के द्वारा तैयार किए गए आधार को गंवाना नहीं चाहते हैं. ऐसे में जेडीयू-बीजेपी भले ही यादवों का परसेप्शन बदलने में लगी है, और ओवैसी-पप्पू यादव के द्वारा मुस्लिम-यादव समीकरण को डैमेज करने के खतरे बीच भी तेजस्वी ने इस वोट बैंक की डोर कसकर पकड़ रखी है.

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