हैप्‍पी बर्थडे जीतन राम मांझी: जब बिना बहुमत के भी CM की कुर्सी छोड़ने से कर दिया था इनकार

जीतन राम मांझी (फाइल फोटो)
जीतन राम मांझी (फाइल फोटो)

जीतन राम मांझी (Jeetan Ram Manjhi ) के साथ सबसे बड़ी बात यह रही है कि वो जब से राजनीति में आए हैं, तब से बीच का कुछ वक्त छोड़ दें तो लगातार सत्ता में या सत्‍ता के साथ रहे हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 6, 2020, 12:34 PM IST
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पटना. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी (Jeetan Ram Manjhi) का जन्म 6 अक्टूबर 1944 को हुआ था. वह जनता दल (यूनाइटेड) के नेता के तौर पर प्रदेश के 23वें मुख्यमंत्री रह चुके हैं. मांझी एक ऐसे राजनेता के तौर पर अब जाने जाते हैं, जिनकी सियासत कभी स्थिर नहीं रही है. पिछले तीन दशक से कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू के सहारे राजनीति में सक्रिय मांझी को जब हालात ने शीर्ष पर पहुंचाया, तब वहां भी उनका मन डोलता रहा. एक ऐसा ही दिलचस्प वाकया तब का है, जब उन्होंने अल्पमत में होते हुए भी मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने से इनकार कर दिया था. इस बार उनका जन्‍मदिन ऐसे समय में आया है, जब बिहार में चुनावी माहौल गरमाया हुआ है.

दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू के खराब प्रदर्शन के बाद कुछ समय के लिये जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया गया था. मुख्यमंत्री बनने के 10 महीनों के बाद पार्टी ने उनसे नीतीश कुमार के लिये पद छोड़ने को कहा, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया. जाहिर है राजनीति गरमाई और मांझी एवं नीतीश के लिए फजीहत का सबब भी बनी. काफी जिच हुई, लेकिन मांझी ने जब इस्तीफा नहीं दिया तो जेडीयू ने उनको पार्टी से निष्कासित कर दिया. इसके बाद 20 फरवरी 2015 को बहुमत साबित न कर पाने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. आज के दिन वही जीतन राम मांझी विधानसभा चुनाव से ऐन पहले एक बार फिर से जेडीयू में शामिल हो गए हैं.

मुख्यमंत्री की कुर्सी गई तो उन्होंने जेडीयू का साथ छोड़ा और अपनी पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा बना ली. फिर भी मन डोलता ही रहा. कभी महागठबंधन तो कभी एनडीए में आते-जाते रहे. वष 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी रास आ रही थी. चुनाव खत्म हुआ और नतीजे अच्छे नहीं आए तो मन ऊब गया.



लोकसभा चुनाव आते-आते मांझी ने फिर पाला बदला. बीजेपी से रिश्ता तोड़कर आरजेडी के साथ खड़े हो गए. लालू  यादव के सहयोग से बेटे संतोष मांझी को विधान पार्षद बनवा लिया. वक्त बीतता गया और थोड़े ही महीनों बाद फिर लालू भी अच्छे नहीं लगने लगे. साल 2019 में जैसे-तैसे महागठबंधन के साथ बने रहे, लेकिन एक भी सीट हाथ नहीं आई.
इसके बाद 2020 का विधानसभा चुनाव करीब आ रहा था तो मांझी की नाव बीच मंझधार में थी. सहारा नजर नहीं आया तो चिराग पासवान के तल्ख तेवर के बीच फिर सीएम नीतीश कुमार से नजदीकियां बढ़ा लीं. 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री रहते हुए जिस जेडीयू से मांझी ने खुद को किनारा किया था, पांच वर्ष बीतते-बीतते उसी जेडीयू में आ गए.

कहा जाता है कि जीतन राम मांझी के साथ सबसे बड़ी चीज़ यह रही है कि वो जब से राजनीति में आए हैं तब से बीच का कुछ वक्त छोड़ दें तो लगातार सत्ता में रहे हैं. वो 1980 के दशक से सत्ता में हैं. फिलहाल बिहार की सियासत को मांझी के अगले कदम का इंतजार है.
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