बिहार चुनाव: वह मुख्यमंत्री जो डंके की चोट पर कहते थे- वोट मांगने नहीं जाऊंगा, जनता लायक समझेगी तो खुद देगी

बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की फाइल तस्वीर.
बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की फाइल तस्वीर.

बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह (First Chief Minister of Bihar Shri Krishna Singh) के बारे में अध्ययन करने वाले जानकार बताते हैं कि 1957 में वह शेखपुरा जिले के बरबीघा से चुनाव लड़ रहे थे. उनके प्रचार के लिए सहयोगी सक्रिय थे, लेकिन श्रीबाबू बरबीघा सीट में प्रचार के लिए नहीं जाते थे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 21, 2020, 12:26 PM IST
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पटना. 21 अक्टूबर 1887 को बिहार के मुंगेर जिले में स्थित खनवां गांव (अब यह नवादा जिले में है) में बिहार केसरी कहे जाने वाले प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह (First Chief Minister of Bihar Shri Krishna Singh) का जन्म हुआ था. वह 1946 से 1961 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे. राजनीतिक-सामाजिक जीवन में उन्हें लोग सम्मान से श्रीबाबू कहते थे. बिहार में औद्योगिक क्रांति के लिए आज भी लोग श्रीबाबू को याद करते हैं. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा अनुग्रह नारायण सिन्हा के साथ श्रीबाबू को आधुनिक बिहार का शिल्पकार भी कहा जाता है. उन्हें करीब से जानने वाले लोग कहते हैं कि श्रीबाबू उसूलों से कभी कोई समझौता नहीं करते थे. बिहार में जमींदारी प्रथा खत्म करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है.

बता दें कि बिहार भारत का पहला राज्य था, जहां सबसे पहले उनके नेतृत्व में ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन उनके शासनकाल में हुआ था. इनकी उच्च शिक्षा कोलकाता विश्वविद्यालय से एम.ए. और कानून की डिग्री हासिल करने के साथ पूरी हुई थी. इसके बाद वह मुंगेर में वकालत करने लगे. उसी दौर में महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन आरंभ करने पर इन्होंने वकालत छोड़ दी और शेष जीवन सार्वजानिक कार्यों में लगा दिया. साइमन कमीशन के बहिष्कार और नमक सत्याग्रह में भाग लेने पर ये गिरफ्तार भी किए गए थे.

कृष्ण सिंह बड़े ओजस्वी अधिवक्ता थे. साल 1937 में केन्द्रीय असेम्बली और 1937 में ही बिहार असेम्बली के सदस्य चुने गए थे. 1937 के प्रथम कांग्रेस मंत्रिमंडल में वह बिहार के मुख्यमंत्री बने. राजनीतिक बंदियों की रिहाई के प्रश्न पर इन्होंने और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत ने त्यागपत्र की धमकी देकर अंग्रेज सरकार को झुकने के लिए बाध्य कर दिया था. साल 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ होने पर कृष्ण सिंह के मंत्रिमंडल ने त्यागपत्र दे दिया था. वर्ष 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए गांधीजी ने सिंह को बिहार का प्रथम सत्याग्रही नियुक्त किया था. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी श्रीबाबू जेल में बंद रहे.



1946 से 1961 (निधन होने तक) तक वह बिहार के मुख्यमंत्री रहे और इनके कार्यकाल में बिहार में महत्त्व के अनेक कार्य हुए. जमींदारी प्रथा समाप्ति के अलावा सिंदरी का खाद कारखाना, बरौनी का तेल शोधक कारखाना, मोकामा में गंगा पर पुल इनमें से विशेष उल्लेखनीय है. आज जब बिहार विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया जारी है और बिहार के विकास की बातों पर बहस भी हो रही है, तो आधुनिक बिहार के निर्माता के बारे में कई किस्से भी चर्चा में हैं.
श्रीबाबू के बारे में अध्ययन करने वाले जानकार बताते हैं कि 1957 में वह शेखपुरा जिले के बरबीघा से चुनाव लड़ रहे थे. उनके प्रचार के लिए सहयोगी सक्रिय थे, लेकिन श्रीबाबू बरबीघा सीट में प्रचार के लिए नहीं जाते थे. जब सहयोगियों ने इसकी वजह पूछा तो उन्‍होंने कहा कि वह अपने लिए वोट मांगने नहीं जाएंगे. तब उन्होंने कहा था कि अगर मैंने काम किया है या जनता मुझे अपने नेता होने के लायक समझेगी, तो मुझे खुद ही वोट देगी.

श्रीबाबू के बारे में एक किस्‍सा यह भी है कि सीएम रहते हुए जब अपने गांव आते थे, तब वह सिक्‍योरिटी गार्ड्स को गांव के बाहर ही रोक देते थे. अपनी सुरक्षा गार्ड से कहते थे कि यह मेरा गांव है, यहां मुझे कोई खतरा नहीं है. वह अपने गांव के अंदर बिलकुल देसी अंदाज में रहते थे. किसी को महसूस ही नहीं होता था कि उनके राज्‍य का सीएम उनके बीच में है.
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