बिहार चुनाव: क्या आपको पता है कि भाजपा के समर्थन से लालू पहली बार बने थे सीएम, जानें पूरी कहानी

लालू प्रसाद यादव
लालू प्रसाद यादव

लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) ने अपनी सियासत का नया दांव खेला और कमंडल विरोध की राजनीति को लालू ने अपना मुख्य हथियार बनाया, और 'MY' (मुस्लिम-यादव) समीकरण के बल पर बिहार में 15 साल तक बिहार में राज किया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 22, 2020, 5:11 PM IST
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पटना. 'अगर लालू जी BJP से हाथ मिला लेते तो वो आज हिंदुस्तान के राजा हरीशचंद्र होते. तथाकथित चारा घोटाला दो मिनट में भाईचारा घोटाला हो जाता अगर लालू जी का DNA बदल जाता.'  यह राजद नेता तेजस्वी यादव (Tejaswi yadav) का वह ट्वीट है जिनपर उनका ट्विटर अकाउंट खोलते ही सबसे पहली नजर पड़ती है. दरअसल उन्होंने अपने इस ट्वीट को Pin कर रखा है जिस वजह से कोई भी व्यक्ति पहले इसे ही पढ़ता है. जाहिर है लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों है?

राजनीतिक जानकार बताते हैं कि बिहार की सियासत में लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) का उभरना और दिल्ली दरबार में छा जाना कोई संयोग भर नहीं बल्कि पूरी रणनीति थी. दरअसल आज हर जगह लालू यादव को बीजेपी के मुखर विरोधी के रूप में जाना जाता है, लेकिन भाजपा के सपोर्ट से ही पहली बार बिहार के सीएम बने थे. यानी वह दौर कांग्रेस विरोध का था और भाजपा  के सपोर्ट से भी लालू को सीएम की कुर्सी पर बैठने में कोई गुरेज नहीं था.





कांग्रेस विरोध की राजनीति का था दौर
सियासत का एक दौर वह भी था जब हर छोटी-बड़ी पार्टी की लड़ाई सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस से हुआ करती थी. किसी भी बात पर ये कांग्रेस विरोधी दल एकजुट हो जाए और कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकनी की कवायद करते. भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लगाए आपातकाल के समय 1975 में यह पूरी एकजुटता के साथ सामने आया था.

जब मंडल-कमंडल दोनों ही आया साथ
इसके बाद बिहार के संदर्भ में बात 1990 विधानसभा चुनाव तक आती है. जब इमरजेंसी के विरोध में जब देश में मंडल आंदोलन की लहर थी और दूसरी ओर बीजेपी कमंडल की राजनीति को धार देने में जुटी थी. लेकिन कांग्रेस विरोध के मामले पर दोनों एकजुट थे. केंद्र में वीपी सिंह की अगुवाई में जनता दल की सरकार चल रही थी और बीजेपी का समर्थन उसे हासिल था.


वर्ष 1990 में यह था सीटों का समीकरण
इसी बीच बिहार में विधानसभा का चुनाव हुआ. तब झारखंड का हिस्सा भी बिहार राज्य में ही था. 324 सदस्यीय विधानसभा में सत्तारूढ़ कांग्रेस को सिर्फ 71 सीटें मिलीं. बहुमत के लिए कम से कम 163 विधायकों के समर्थन की जरूरत थी. जनता दल को 122 सीटें मिलीं, लेकिन बहुमत के लिए उसे और सीटों की जरूरत थी.


और बिहार में खत्म हुआ कांग्रेस का शासन
बीजेपी के 39 विधायक जीतकर पहुंचे थे. केंद्र की वीपी सिंह सरकार की तर्ज पर बीजेपी ने बिहार में भी जनता दल सरकार को समर्थन दिया. जनता दल में चली खींचतान के बीच पार्टी के अंदर हुई वोटिंग में पूर्व मुख्यमंत्री राम सुंदर दास को हराकर लालू यादव नेता चुने गए. 10 मार्च 1990 को लालू पहली बार बिहार के सीएम की कुर्सी पर बैठे. इसी के साथ लालू ने बिहार में कांग्रेस पार्टी के शासन का खात्मा कर दिया.


इसलिए छूटा लालू का बीजेपी से साथ
हालांकि, लालू के साथ बीजेपी का ये साथ लंबा नहीं चल सका. जल्द ही कांग्रेस विरोध की ये दोस्ती मंडल बनाम कमंडल की राजनीति का शिकार हो गई. सोमनाथ से अयोध्या के लिए निकले लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को लालू ने 23 सितंबर 1990 को समस्तीपुर में रुकवा दिया और आडवाणी को गिरफ्तार करा दिया. लालू के इस कदम के बाद बीजेपी ने केंद्र की वीपी सिंह सरकार और बिहार के लालू यादव की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया.


फिर तो लालू को हिला नहीं पाया कोई
बीजेपी के इस कदम से केंद्र की वीपी सिंह की सरकार तो गिर गई, लेकिन बिहार में लालू प्रसाद यादव अपना किला बचाने के लिए बड़ा दांव खेल गए. उन दिनों प्रदेश बीजेपी के बड़े नेता हुआ करते थे, इंदर सिंह नामधारी. नामधारी लालू के समर्थन में आ गए और बीजेपी में टूट हो गई. नामधारी का गुट लालू प्रसाद यादव के समर्थन में आया और इस तरह लालू ने अपनी कुर्सी बचा ली.


और बिहार में स्थापित हो गए लालू यादव
यहीं से लालू ने अपनी सियासत का नया दांव खेला. कमंडल विरोध की राजनीति को लालू ने अपना मुख्य हथियार बनाया. लालू ने पिछड़े और मुस्लिम वोटों को मिलाकर 'MY' (मुस्लिम-यादव) समीकरण का व्यूह रचा और उसी के बल पर बिहार में 15 साल तक राज किया और अब उनकी राजनीतिक विरासत को उनके बेटे तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव संभाल रहे हैं.

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