बिहार चुनाव: सीएम नीतीश पर निशाना क्यों? 5 प्वाइंट्स में समझें चिराग का सियासी गणित

चिराग पासवान और नीतीश कुमार (फाइल फोटो)
चिराग पासवान और नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

Bihar Elections 2020: हाल में ही चिराग पासवान (Chirag Paswan) ने बिहार (Bihar) के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के नेतृत्व को पहले नकार दिया. फिर एक खुला पत्र लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि किसी भी कीमत पर ‘बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट‘ की सोच को मिटने नहीं दूंगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 6, 2020, 3:19 PM IST
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पटना. लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान (LJP President Chirag Paswan) के तल्ख तेवर और पार्टी की ओर से कही जा रही इन दो बातों पर गौर करें- पहला, मोदी से बैर नहीं, नीतीश तुम्हारी खैर नहीं. दूसरा, हम भाजपा के साथ सरकार बनाएंगे. जाहिर है बीजेपी (BJP) के साथ रहने और सीएम नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) को टारगेट कर चिराग पासवान जिस तरह के बयान दे रहे हैं, इससे भविष्य की सियासत के कई संकेत मिल रहे हैं. राजनीतिक जानकार बताते हैं कि बिहार की सियासत के मद्देनजर चिराग पासवान कुछ खास योजना के साथ आगे बढ़ रहे हैं.

हाल में ही चिराग पासवान ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व को पहले नकार दिया. फिर एक खुला पत्र लिखा जिसमें उन्होंने पिता को याद करते हुए कहा कि किसी भी कीमत पर ‘बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट‘ की सोच को मिटने नहीं दूंगा. यह फैसला बिहार पर राज करने के लिए नहीं, बल्कि नाज करने के लिए लिया गया है. जाहिर है यह उनके बिहार की राजनीति को अपने तरीके से डील करने की एक पहल मानी जा रही है.

नीतीश कुमार के विकल्प के तौर पर खुद को पेश करने की कोशिश
वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि चिराग पासवान ने बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए (NDA) का हिस्सा बने रहते हुए ही अलग चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. यह जाहिर तौर पर सीधे नीतीश कुमार को नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन इससे भी बड़ी तस्वीर यह है कि चिराग पासवान आगामी 2025 का टारगेट लेकर चल रहे हैं, जिसमें वे भविष्य में सीएम नीतीश के विकल्प के तौर पर उभर सकें.




लोजपा का अलग अस्तित्व कायम रखने की रणनीति पर चल रहे चिराग 
वर्ष 2017 में मणिपुर विधानसभा चुनाव में एलजेपी ने भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ा था. बाद में लोजपा सरकार में शामिल हो गई. इसके बाद वर्ष 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव में भी लोजपा ने एनडीए से अलग चुनाव लड़ा था. हालांकि, वोटों का प्रतिशत बेहद कम (एक प्रतिशत भी नहीं) था, लेकिन चिराग ने इस फैसले से पार्टी के अलग अस्तित्व का अहसास तो जरूर करवाया था.

भाजपा-नीतीश नहीं तो RJD के साथ भी बन सकता है समीकरण
बिहार में भाजपा के साथ और जदयू के खिलाफ लड़ने की बात कहने वाले चिराग पासवान अक्सर तेजस्वी यादव को छोटा भाई बताते रहे हैं. हाल में जब उन्होंने जदयू के खिलाफ 143 सीटों पर प्रत्याशी उतारने का ऐलान किया और फिर तेजस्वी यादव को छोटा भाई बता दिया तो सियासत को समझने वाले इस संकेत को भांप गए. वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि चिराग ने अपने लिए आरजेडी के साथ जाने के एक विकल्प को हमेशा जीवित रखना चाहते हैं.

त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में चिराग पासवान के लिए भी है यह चांस
वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 157, जदयू 101 और लोजपा 42 सीटों पर लड़ी थी. तब भाजपा और लोजपा का ही अलायंस था और जदयू महागठबंधन में था. उस वक्त भाजपा 53 सीटों पर जीती और 104 सीटें ऐसी थीं जहां वह नम्बर 2 पर रही. लोजपा पिछली बार जिन 42 सीटों पर लड़ी थी, उनमें से वह जीती भले ही 2 ही सीटें हो, लेकिन 36 पर दूसरे और सिर्फ 2 पर तीसरे नंबर पर रही थी.

ऐसे में गणित यह कहता है कि भाजपा की जीती हुई और नंबर 2-3 की सीटें मिलाकर 155 होती हैं और लोजपा की जीती हुई और हारी हुई सीट मिलाकर 42 हो जाती हैं. यानी भाजपा और लोजपा के एक और दो नंबर को मिला दें तो ये अकेले 195 सीटों पर प्रभावित करती दिखाई देती है. ऐसे में कहीं त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनती है तो हो सकता है कि चिराग पासवान के लिए सीएम पद का भी एक चांस बन जाए. हालांकि, यहां भी भाजपा के अपर हैंड की बात कही जा रही है.
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