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मोदी पर हमला और नीतीश से प्रेम! क्या अभी भी कन्फ्यूजन में हैं कुशवाहा?

नीतीश कुमार से मिले उपेंद्र कुशवाहा

नीतीश कुमार से मिले उपेंद्र कुशवाहा

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) से मिलने के बाद उपेंद्र कुशवाहा (Upendra Kushwaha) ने सफाई भी दी. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री से मुलाकात करना कोई अपराध नहीं है,

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पटना. बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) के नेतृत्व में नई सरकार बन चुकी है. इस बीच विपक्ष की ओर से राज्य सरकार पर तल्खी से सियासी हमले किए जा रहे हैं. लेकिन, सूबे की सियासत में एक बार फिर नये समीकरण के संकेत तब उभरकर सामने आने लगे जब रा्ष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा (Upendra Kushwaha) की सीएम नीतीश कुमार से गुपचुप मुलाकात की खबरें सामने आईं. सीएम हाउस में 2 दिसंबर को हुई इस मुलाकात की खबर 4 दिसंबर को सामने आने के बाद से ही इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि कुशवाहा-नीतीश फिर एक होने जा रहे हैं.

हालांकि, सियासी अटकलों के बीच कुशवाहा की सफाई भी आ गई और उन्होंने साफ कहा कि मुख्यमंत्री से मुलाकात करना कोई अपराध नहीं है. सीएम से मुलाकात हुई है, इससे ज्यादा कोई राजनीतिक अर्थ निकालना मुनासिब नहीं है. इस बीच एक बात और साफ हुई कि किसान आंदोलन को लेकर कुशवाहा ने केंद्र सरकार पर जोरदार हमला बोला और कृषि बिल को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा. उपेंद्र कुशवाहा ने कृषि बिल वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि ये छोटे किसानों के लिए घातक साबित होंगे और पूंजीपतियों और उद्योगपतियों को इसका लाभ मिलेगा.

कितनी हकीकत-कितना फसाना?
बीते चार-पांच दिनों के घटनाक्रम को देखें तो दो बातें साफ हैं. पहला यह कि उपेंद्र कुशवाहा सीएम नीतीश के करीब आना चाहते हैं. दूसरा यह कि वे केंद्र सरकार से दूरी बनाए रखना चाहते हैं. हालांकि, इसके पीछे की रणनीति क्या है, इसकी वास्तविकता तो वही बता सकते हैं, लेकिन इतना जरूर है कि मोदी पर हमला और नीतीश से प्रेम दिखाते हुए वह आने वाली राजनीति के लिए नई रणनीति पर चल रहे हैं. इस बीच उनकी पार्टी रालोसपा के जेडीयू में विलय की भी अटकलें लगाई जा रही हैं, लेकिन इस बात में कितनी सच्चाई है इसको लेकर कुछ कहना अभी जल्दबाजी होगी.

सीएम नीतीश के साथ दिखने की कोशिश
बता दें कि कुशवाहा और नीतीश के करीबी की पृष्ठभूमि उस घटना के बाद बनी जब हाल में ही 17वीं बिहार विधानसभा में पहले सत्र के अंतिम दिन (27 नवंबर) नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव द्वारा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व एनडीए के विधायकों पर की गई अमर्यादित टिप्पणियों के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी आक्रोशित हो उठे थे और पहली बार सदन में उन्हें काफी तल्ख अंदाज में देखा गया. उन्होंने तेजस्वी यादव के आचरण को अशोभनीय कहा था. इसी बात को लेकर उपेंद्र कुशवाहा ने तेजस्वी के व्यवहार की आलोचना करते हुए सीएम नीतीश कुमार के साथ खड़े रहने का ऐलान किया था.

नीतीश-कुशवाहा मीटिंग के सियासी मायने
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि कुशवाहा की इस बिन मांगे समर्थन से अकेले पड़ते जा रहे नीतीश कुमार को काफी बल मिला और सियासत की नई धारा की रोशनी भी. कहा जा रहा है कि इसके बाद ही कुशवाहा-नीतीश की इस नई दोस्ती की बुनियाद पड़नी शुरू हुई है. राजनीतिक गलियारे में तो चर्चा यही है कि खुद नीतीश कुमार ने ही कुशवाहा को इस मुलाकात के लिए आमंत्रण दिया और कहा, विरोध छोड़िये और हमारे साथ आइए, नए सिरे से मिलकर काम करते हैं! बहरहाल इसकी हकीकत को नीतीश-कुशवाहा के अलावा कोई नहीं बता सकता, लेकिन मुलाकात के सियासी मायने तो हैं ही, यह हर कोई बता रहा है.

'लव-कुश' राजनीति को फिर साधने की कवायद
दरअसल, बिहार की सियासत में नीतीश-कुशवाहा की दोस्ती के बड़े मायने हैं. 'लव-कुश' (कुर्मी व कोयरी जाति) की राजनीति के आधार यही दोनों चेहरे रहे हैं. इसी जातिगत समीकरण की वजह से आज तक नीतीश कुमार एनडीए हो या महागठबंधन, बिहार में हमेशा बड़े भाई की भूमिका में रहते आए थे. नीतीश कुमार की राजनीति की बुनियाद ही लव-कुश समीकरण पर रखी थी. कभी कुशवाहा और नीतीश एक साथ ही थे. कालांतर में मतांतर हुए और दोनों की राहें जुदा हो गईं. हालांकि कुशवाहा समाज नीतीश कुमार के साथ जुड़ा रहा था.

क्या बिहार की सियासत में होंगे बड़े बदलाव?
लेकिन, इस बार के चुनाव में इस आधार में सेंध लग गई और बिहार चुनाव 2020 में नीतीश कुमार ने 15 कुशवाहा नेताओं को टिकट दिया जिसमें से 10 हार गए. यानि कोयरी जाति का समर्थन नीतीश कुमार को पहले जैसा नहीं मिलता और कुशवाहा के कारण इसमें कुछ तो जरूर गड़बड़ी हो गई. ऐसे में इस आधार का कमजोर होना ही नीतीश के लिए सेटबैक साबित हुआ है. ऐसे में कुशवाहा-नीतीश की दोस्ती एक बार फिर परवान चढ़ती है तो फिर JDU का वोट बैंक बढ़ना एक तरह से तय है. यानि नीतीश का मजबूत होना भी पक्का है. हालांकि दोनों की दोस्ती की गाड़ी आगे बढ़ती है तो बिहार में बड़े बदलाव हो सकते हैं.

नीतीश-कुशवाहा मीटिंग से निकलेगी सियासी राह?
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि नीतीश कुमार इस बार एनडीए में छोटे भाई की भूमिका में आ गए हैं और राजनीतिक रूप से कमजोर भी दिखते हैं. हालांकि नेतृत्व उन्हीं का है, पर विरोध का वातावरण यथावत है. वहीं, कुशवाहा केंद्र सरकार से बाहर निकलकर गलती कर चुके हैं और बिहार विधानसभा चुनाव में भी उनके हिस्से एक भी सीट नहीं आई है. जाहिर है वे भी राजनीतिक रूप से एक तरह से हाशिये पर हैं. ऐसे में सवाल ये है कि नीतीश और कुशवाहा की दोस्ती की दिशा क्या होगी?

इस सियासी कवायद में कुशवाहा के लिए क्या है?
हालांकि, कुशवाहा अब भी कन्फ्यूज दिख रहे हैं, क्योंकि एक तरफ नीतीश से दोस्ती की आस तो दूसरी तरफ केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधने की नीति राजनीतिक जानकारों की समझ से भी परे है. इसकी वजह से जो सवाल उठता है वो ये कि नीतीश-दोस्ती की दोस्ती क्या बिहार में किसी तीसरे कोण की संभावना बन रही है? राजनीतिक जानकार इसका जवाब 'ना' में देते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि तो कुशवाहा के लिए क्या है?

क्या बिना बीजेपी के आगे बढ़ेगी कुशवाहा-नीतीश की सियासत?
इसके जवाब में राजनीतिक जानकार कहते हैं कि नीतीश-कुशवाहा की दोस्ती कितनी आगे बढ़ेगी यह वक्त बताएगा, लेकिन इतना तो तय है कि इस तीसरे कोण का बिहार की सियासत में इसलिए भी महत्व नहीं होगा, क्योंकि नीतीश की राजनीति भी ढलान पर है और अब आने वाले समय में उन्हें रिटायरमेंट प्लान पर ही काम करना पड़ेगा. वहीं, नीतीश कुमार महागठबंधन के साथ अब कतई नहीं जाएंगे. वहीं, बीते दो दशकों का राजनीतिक इतिहास बताता है कि बिना बीजेपी के न तो नीतीश और न ही कुशवाहा अपनी राजनीति बहुत आगे बढ़ा पाएंगे.

फिलहाल इंतजार के सिवा कुछ नहीं!
ऐसे में राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कुशवाहा की भाजपा विरोध और नीतीश प्रेम की राजनीति एक साथ बहुत आगे नहीं बढ़ेगी. अगर नीतीश कुमार भी उपेंद्र कुशवाहा तभी साथ आ पाएंगे जब वे भाजपा के साथ आने को तैयार होंगे. वहीं, यह बात भी सिर्फ कयास तक ही है कि रालोसपा का जदयू में विलय होने जा रहा है. दरअसल, अगर ऐसा हुआ तो रिटायरमेंट प्लान की ओर बढ़ रहे नीतीश के लिए तो सही रहेगा, लेकिन महत्वाकांक्षी कुशवाहा की अपनी राजनीति के लिए तो कतई नहीं. ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि बिहार की ताजा सियासत क्या मोड़ लेती है.

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