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मोदी-शाह के करीबी इस नेता की रणनीति होती है 'अभेद्य', बिहार में BJP को बड़ी जीत की उम्मीद

भूपेन्द्र यादव (फाइल फोटो)

भूपेन्द्र यादव (फाइल फोटो)

21 दिसंबर, 2018 को अमित शाह से बात करने के बाद भूपेन्‍द्र यादव सीधे रामविलास पासवान के घर जा पहुंचे. उन्‍होंने पिता-पुत्र (रामविलास-चिराग) का हाथ पकड़ा और अमित शाह के पास ले आए.

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देश की अधिकतर सर्वे एजेंसियां और राष्ट्रीय चैनल्स बिहार में एनडीए की बंपर जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं. हर किसी के आंकड़ों में अंतर जरूर है, लेकिन सभी ये दावा कर रहे हैं कि 40 में से दो तिहाई सीटें जीतने में एनडीए कामयाब रहेगा. इतना ही नहीं बीजेपी के लिए तो कहा जा रहा है कि वह अपने हिस्से की सभी 17 सीटें जीतने जा रही है. यानि भाजपा के लिए शत-प्रतिशत सफलता के दावे किए जा रहे हैं. जाहिर है यह उपलब्धि असामान्य है. इस उपलब्धि के पीछे जिस शख्स की रणनीति काम कर रही है, वह बिहार बीजेपी के प्रभारी भूपेन्द्र यादव हैं.

भूपेन्द्र यादव पीएम मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेहद करीब माने जाते हैं. यह इससे भी समझा जा सकता है कि  वर्ष 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी मुश्किल में लग रही थी तो मोदी-शाह की जोड़ी ने भूपेन्द्र यादव को वहां जीत दिलाने की जिम्मेदारी सौंपी थी.

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पर्दे के पीछे बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव के पद पर कार्यरत भूपेंद्र की प्लानिंग का ही कमाल था, जिन्‍होंने विरोधियों के तमाम तिकड़मों को मात देते हुए मोदी और शाह के गृह प्रदेश गुजरात विधानसभा चुनाव में लगातार छठी बार चुनाव में जीत दिलाई.

राजस्थान के अजमेर निवासी भूपेन्द्र यादव का बिहार से कोई डायरेक्ट कनेक्शन तो नहीं है, लेकिन वह 2015 विधानसभा चुनाव के समय भी बिहार बीजेपी के प्रभारी बनाए गए थे. हालांकि, तब लालू और नीतीश की जोड़ी बन जाने से बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन पार्टी के वोटिंग परसेंटेज में कमी नहीं आई.

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रणनीति को अंजाम तक पहुंचाने में माहिर

भूपेन्‍द्र यादव वर्ष 2012 से राज्यसभा सांसद भी हैं और मोदी-शाह की रणनीति को अंजाम तक पहुंचाने की कला में माहिर भी हैं. बिगड़ी बात को वह कैसे बना लेते हैं यह इस बात से भी समझा जा सकता है कि जब एनडीए के महत्वपूर्ण नेता रामविलास पासवान 2018 में एनडीए से दूरी बनाने की राह पर चले तो भूपेंद्र यादव ने उन्हें दोबारा मोदी-शाह के करीब पहुंचा दिया.

21 दिसंबर, 2018 को अमित शाह से बात करने के बाद वह सीधे रामविलास पासवान के घर जा पहुंचे. यादव ने पिता-पुत्र (रामविलास-चिराग) का हाथ पकड़ा और अमित शाह के पास ले आए. इसके बाद ही एनडीए में जारी खींचतान एक झटके में ही खत्म हो गया.

इसी तरह जब जेडीयू से सीट शेयरिंग पर फाइनल बात नहीं बन पा रही थी तो भूपेन्द्र यादव ने सीएम नीतीश से बात की और बीच का रास्ता निकाला. फिर पीएम मोदी और अमित शाह की सहमति के साथ ही 17+17+6 का फाइनल फॉर्मूला भी निकाल लिया गया.

बिहार में NDA को एकजुट करने में रहे कामयाब

यही वजह रही कि बिहार में एनडीए एकजुट होकर चुनाव लड़ पाया और एग्जिट पोल के अनुसार वह प्रदेश में शानदार सफलता प्राप्त कर रहा है. भूपेंद्र यादव 2013 में राजस्थान, 2014 में झारखंड और 2015 में बिहार, 2017 में उत्तर प्रदेश और 2018 में गुजरात विधानसभा चुनाव में भी पार्टी के चुनाव प्रभारी बने.

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इनमें बिहार विधानसभा चुनाव, 2015 को छोड़ दिया जाए तो उन्होंने राजस्थान, बिहार, झारखंड, यूपी और गुजरात में पार्टी को बड़ी जीत दिलाई थी. इस बार बिहार लोकसभा चुनाव में भी एक बड़ी सफलता दोहराने की उम्मीद लगाई जा रही है.

पार्टी के लोग मानते हैं कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह योजना बनाते हैं. पीएम मोदी की मुहर के बाद भूपेन्द्र यादव उसे अमल में लाते हैं. रैलियां करने का अपना महत्व है, लेकिन स्थानीय स्तर पर फोकस भी उतना ही जरूरी है. चुनाव के दौरान पार्टी व्यवस्थित तरीके से काम करती है.

भूपेन्द्र व्यवहार में बहुत कुछ अपने बॉस की तरह ही नजर आते हैं. भूपेंद्र रैली में जाकर भाषणबाजी के जरिए चुनाव लड़ने के बजाए वॉर रूम में रहकर पूरी प्रक्रिया को करना पसंद करते हैं.

वर्ष 2012 से राज्यसभा सांसद भूपेन्द्र यादव कई भाषाओं के अच्छे जानकार हैं. पेशे से वह वकील रहे और सुप्रीम कोर्ट में प्रेक्टिस कर चुके हैं. उनकी पत्नी का नाम बबीता यादव है और वे दो बच्चों के पिता भी हैं.

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