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    OPINION: तो बिहार भी हुआ मोदीमय… लेकिन इस बार चुनाव के संदेश कुछ अलग हैं!

     सरकार दिवाली से पहले दिवाली गिफ्ट दे सकती है
    सरकार दिवाली से पहले दिवाली गिफ्ट दे सकती है

    अब युवा बिहार (Bihar) में ही रोजगार, उद्योग, शिक्षा का हब और स्मार्ट पुलिस प्रणाली चाहता है ताकि राज्य प्रगति की राह पर तेजी से आगे बढ़े. आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार करने के लिए बिहार को उसका सारथी बनाना ही होगा. चाणक्य की धरती से इस बार जो चुनावी संदेश निकला है, वो यही है. अगर सरकार ने इस पर अब ध्यान नहीं दिया तो बिहार की राजनीति आने वाले समय में करवट लेगी, जिसमें शायद ही किसी को संदेह होगा

    • News18Hindi
    • Last Updated: November 13, 2020, 3:25 PM IST
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    नई दिल्ली. चाणक्य की धरती बिहार का यह विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election 2020) एक बड़ा संदेश लेकर आया है. लेकिन इस जनादेश को समझने से पहले 2019 के लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election 2019) पर पहले नजर डालना जरूरी है. वर्ष 2014 का चुनाव पूरी तरह से मनमोहन सरकार (Manmohan Government) के खिलाफ था, जिसमें नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) उम्मीद की किरण बने थे. लेकिन 2019 का आम चुनाव पूरी तरह से मोदी का चुनाव था जिसमें पांच साल के कामकाज का लेखा-जोखा था और विकास के एजेंडे को राष्ट्रवाद की चाशनी में डुबोकर परोसा गया था. इसका नतीजा सबके सामने था कि दूसरी बार नरेंद्र मोदी जीते तो उन्होंने खुद 2014 के मोदी (PM Modi) को हराकर एक बड़ी लकीर खींच दी थी. यानी आम आदमी और गांव-गरीब तक पहुंचा विकास, वोटों में तब्दील हुआ और पहले से बड़ा जनादेश लाकर इतिहास रच दिया.

    2015 की तुलना में BJP ने सामाजिक समीकरण को साधने का फॉर्मूला बदला 

    लेकिन यहां सवाल उठ सकता है कि 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में मोदी मैजिक क्यों नहीं चला? इसे एक उदाहरण से समझना होगा. 2015 के चुनाव में बीजेपी के एक बड़े रणनीतिकार ने मुझसे कहा था, 'हमने हर विधानसभा में 20 हजार लोगों को बीमा योजना बांटी है. एक परिवार में चार वोटर के हिसाब से हमारे 80 हजार वोट तय समझिए. अगर एक विधानसभा में 60 फीसदी वोट पड़ता है तो वोट एक से डेढ़ लाख के बीच पड़ेगा. इसमें से कुछ वोट निर्दलीय ले जाएंगे और बीजेपी की जीत का अंतर 50-60 हजार हो सकता है.' तब भी बीजेपी ने सधी हुई रणनीति अपनाते हुए आक्रामकता दिखाई थी. तत्कालीन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने 14 अप्रैल, 2015 को पटना के कार्यकर्ता समागम में कहा था, '2014 के लोकसभा चुनाव में बिहार के 62,779 बूथों में से 9,302 बूथों पर महज 50 वोटों के अंतर से फैसला हुआ था इसलिए हमें सारी ऊर्जा बूथ पर लगानी होगी. अगर हम बूथ जीतेंगे तो चुनाव जीतेंगे. हमें हर बूथ पर कम से कम 100 वोट बढ़ाने की चिंता करनी है.' यानी शाह फॉर्मूले के हिसाब से 36 विधानसभा सीटों पर 50 वोटों का अंतर पार्टी की इस प्रतिष्ठा की लड़ाई में निर्णायक साबित हो सकता था. लेकिन उस वक्त न तो यह गणित का फॉर्मूला चला और ना ही सामाजिक समीकरण को बीजेपी साध पाई. इसकी बड़ी वजह थी कि मोदी को केंद्र की सत्ता में आए महज सवा साल हुए थे और योजनाएं जमीन पर उस तरह से साकार नहीं हो पाई थी.




    लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में जनता से जुड़ी योजनाएं जमीन पर थीं तो बदली परिस्थिति में सामाजिक समीकरण को साधने का फॉर्मूला भी बदल दिया गया था. अगर कोरोना काल के पलायन को देखें, जिसे दिल्ली में बैठकर एक अलग नजरिए से देखा जा रहा था, लेकिन इसकी सच्चाई जमीन पर कुछ और ही थी. दिल्ली में जब मजदूरों का रोजगार छिना और रहने को घर भी मयस्सर नहीं हो पा रहा था, उसी वक्त बिहार में उनके गांवों में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज के तहत 25 किलो अनाज, दाल, जनधन में 500 रुपए, उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त गैस सिलेंडर, दिव्यांग-बुजुर्ग पेंशन में एक हजार रुपए सीधे घर पर मिल रहे थे. उस वक्त जिन मजदूरों की अपने घर पर बात होती थी तो घरवाले कहते थे यहां तो बहुत कुछ मिल रहा है, आ जाओ. मजदूरों के पलायन में यह भी एक बड़ी वजह थी. कोरोना काल में पहुंची अन्न योजना और अन्य सुविधाएं सीधे गांवों तक पहुंची तो बीजेपी ने भी माइंड मैपिंग की रणनीति को तरीके से अंजाम दिया. किसान जब फसल की बुआई कर के लौट रहा था तभी किसान सम्मान निधि के तौर पर दो हजार रुपए की किस्त सरकार ने खाते में डाल दी. यानी लोगों के मस्तिष्क पर अपनी छाप छोड़ने की कोशिश हुई.

    Bihar Election Result
    बिहार में रोजगार के एजेंडे से शुरू हुआ चुनाव प्रचार तीसरे चरण आते-आते तक ध्रुवीकरण में बदल गया था (फाइल फोटो)


    नीतीश सरकार के खिलाफ कमजोर कड़ी को तेजस्वी ने मुद्दा बनाया 

    इन उदाहरणों का जिक्र करने की तीन वजह है- इस चुनाव को मैं तीन तरीके से देखता हूं, जिसे अंग्रेजी में Inception, Perception, Equation कह सकते हैं. यानी जब चुनाव की शुरुआत हुई तो यह स्पष्ट था कि सामने कोई नहीं है और एनडीए सत्ता में वापस लौटेगा. लेकिन अचानक से यह धारणा बनने लगी कि 15 साल के जंगलराज के बाद सुशासन बाबू के 15 साल में आखिर ऐसा क्या बदला जो उन्हें सत्ता में फिर मौका दिया जाए. इसी धारणा को भुनाने की कोशिश आरजेडी के तेजस्वी यादव ने की. नीतीश सरकार के खिलाफ कमजोर कड़ी को ही तेजस्वी ने अपना मुद्दा बनाया और लोक-लुभावन वायदों की झड़ी लगा दी. रही सही कसर उनकी रैलियों में जुटी भीड़ ने पूरी कर दी. इसमें कोई संदेह नहीं कि नीतीश कुमार की छवि वैसी नहीं थी जो 2015 के विधानसभा चुनाव में दिख रही थी. उस वक्त नीतीश कुमार के नाम के साथ सम्मानसूचक शब्द 'जी' लगाना जैसे अनिवार्य हो गया था. प्रशांत किशोर ने उस वक्त एक नारा दिया था- बिहार में बहार है, नीतिशे कुमार है. इस नारे पर जबरदस्त नाराजगी सामने आई थी और कार्यकर्ताओं ने फीडबैक दिया था कि यह सम्मान की भाषा नहीं है. लेकिन इस चुनाव में नीतीश कुमार के लिए पहले जैसा सम्मान नहीं था, जो चुनाव नतीजों से भी जाहिर होता है.

    लेकिन तीसरा और सबसे अहम है जो बिहार की राजनीति का सार्वभौमिक सत्य है- सामाजिक समीकरण. बिहार चाहे कुछ भी बोले, लेकिन वोट सामाजिक समीकरण यानी जाति पर जाकर टिकती है. इसी समीकरण में नीतीश कुमार वर्ष 2000 के बाद से ही ऐसे प्लेयर हैं जो महादलित, अति पिछड़ा और अपनी जाति कुर्मी समुदाय के वोट के साथ 15 फीसदी का आधार रखते हैं. वो जब आरजेडी के साथ गए तो उसकी सरकार बनी और बीजेपी के साथ आए तो एनडीए की सरकार बनी. यानी बिहार की जनता ने फिर से सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखा लेकिन इस जाति समीकरण को बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग के तहत साधा. विकास की योजनाएं जो पिछले विधानसभा चुनाव में साकार नहीं हो पाई थी, इस बार उसे पार्टी ने रणनीति के तहत जमीन पर उतारकर लोगों के मन मस्तिष्क में जगह बनाने की कोशिश की. तेजस्वी यादव ने 10 लाख सरकारी नौकरियों का वादा किया तो बीजेपी ने जवाब में 19 लाख रोजगार का वादा कर दिया, ताकि रणनीतिक चूक न हो.

    सामाजिक समीकरण के बीच मुकाबला इतना कड़ा कैसे रहा

    ऐसे में सवाल उठ सकता है कि सामाजिक समीकरण के बीच मुकाबला इतना कड़ा कैसे रहा. इसकी बड़ी वजह थी कि आरजेडी के बारे में बनी धारणा को उनके सामाजिक समीकरण ने बड़ी मजबूती से लिए और भारी संख्या में वोट करने निकले. जबकि नीतीश कुमार के खिलाफ एक खास तबके में नाराजगी ने एक भ्रम पैदा करने की कोशिश की. शिक्षक समुदाय, खास तौर से संविदा शिक्षक नीतीश कुमार की सरकार से बेहद खफा थे. लेकिन उनके साथ सकारात्मक पक्ष था महिलाओं का ज्यादा संख्या में घरों से निकलकर वोट करना. शराबबंदी इसकी बड़ी वजह है.

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    कोरोना काल में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में पूर्व में यहां हुए सभी चुनावों से सबसे ज्यादा वोटिंग हुई (फोटो: न्यूज़ 18 ग्राफिक्स)


    अगर चुनाव नतीजों को एक समग्र सोच के साथ देखा जाए तो निश्चित तौर से नीतीश कुमार की सरकार के खिलाफ नाराजगी दिखने लगी है. लेकिन बीजेपी के संसाधनों से लैस संगठन ने मजबूती से जमीन पर अपनी रणनीति को अंजाम दिया और एनडीए में भी वो पहली बार बड़े भाई के तौर पर उभरा है. लेकिन इस जनादेश के मायने भी हैं. अब 15 साल का जंगलराज का मुद्दा चुनाव में नहीं चलने वाला, भविष्य में एनडीए सरकार को बिहार के विकास के लिए एक समग्र दृष्टि से काम करने की जरूरत है क्योंकि अभी भी स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार समेत कई ऐसे मानक हैं जिसमें बिहार अन्य राज्यों और राष्ट्रीय औसत से कम है. अब युवा बिहार में ही रोजगार, उद्योग, शिक्षा का हब और स्मार्ट पुलिस प्रणाली चाहता है ताकि राज्य प्रगति की राह पर तेजी से आगे बढ़े. आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार करने के लिए बिहार को उसका सारथी बनाना ही होगा. चाणक्य की धरती से इस बार जो चुनावी संदेश निकला है, वो यही है. अगर सरकार ने इस पर अब ध्यान नहीं दिया तो बिहार की राजनीति आने वाले समय में करवट लेगी, जिसमें शायद ही किसी को संदेह होगा.
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