OPINION: बिहार की सियासी पिच तो नीतीश कुमार ही सेट करते हैं, विरोधी सिर्फ बोल्ड होने के लिए मैदान में उतरते हैं!
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OPINION: बिहार की सियासी पिच तो नीतीश कुमार ही सेट करते हैं, विरोधी सिर्फ बोल्ड होने के लिए मैदान में उतरते हैं!
बिहारके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

राजनीतिक जानकारों की मानें तो सीएम नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने चुनावी साल शुरू होते ही सियासत की पिच बनानी शुरू कर दी थी और विरोधियों को खेल के लिए आमंत्रित करने में लग गए थे.

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पटना. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) के अब चंद महीने ही बाकी हैं. निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों से बैठक कर ली है और सबके सुझावों के अनुरूप शीघ्र ही चुनाव की प्रक्रियाओं और उसके स्वरूप के बारे में निर्णय किया जाएगा. इस बीच, सूबे की सियासत भी तेज हो गई है. विपक्ष जहां प्रवासी मजदूर, रोजगार, पलायन और आरक्षण जैसे मुद्दों के साथ आगे बढ़ने की जुगत में है, वहीं सत्ता पक्ष इन मुद्दों की काट खोजने में लगा है. इन सबके बीच राज्य की राजनीति में मतदाताओं को लुभाने और अपने पाले में करने की रस्साकशी में एक बात जो स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आई है वो यह कि प्रदेश की पॉलिटिक्स में नीतीश कुमार (Nitish Kumar) न सिर्फ सबसे बड़े बैंलेंसिंग फैक्टर हैं, बल्कि वही सूबे की सियासत की पिच भी सेट करते हैं.

'सियासी पिच तो नीतीश ही सेट करते हैं'
राजनीतिक जानकारों की मानें तो सीएम नीतीश कुमार ने चुनावी साल शुरू होते ही सियासत की पिच बनानी शुरू कर दी थी और विरोधियों को खेल के लिए आमंत्रित करने में लग गए थे. वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि जनवरी में सीएम नीतीश की जल जीवन हरियाली मिशन यात्रा और मानव श्रृंखला का आयोजन इसी सियासी खेल का आगाज था. इससे पहले बीजेपी-जेडीयू के बीच तनाव के तमाम कयासों के बीत बीजेपी नेता अमित शाह को स्पष्ट करना पड़ा कि बिहार की चुनावी लड़ाई नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ी जाएगी. जाहिर है ये बीजेपी की ये घोषणा नीतीश कुमार का बड़ा सिक्सर था.

'नीतीश के आगे नतमस्तक है बीजेपी'



बकौल रवि उपाध्याय, दरअसल राजनीति में कब क्या हो जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता है. लेकिन, यह साफ है कि सभी राजनीतिक दलों के बीच सीट शेयरिंग बड़ा मुद्दा है. बिहार में बीजेपी-जेडीयू के बीच कई बार 'बराबरी' और 'बड़ा भाई कौन' को लेकर आपसी खींचतान दिखती रही है. हालांकि, दोनों ही दलों का एक साथ चुनाव लड़ना सियासी मजबूरी भी है. यही नहीं बीजेपी के पास बिहार का सबसे बड़ा वोट बैंक भी है, ये बात 2019 के चुनाव से भी पता लगता है.



'बीजेपी की भी मजबूरी हैं नीतीश कुमार'
वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि इन बातों की पुष्टि बिहार का चुनावी गणित भी करता है. दरअसल, 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार में एनडीए को 53.3 प्रतिशत वोट मिले. बीजेपी को 23.6 प्रतिशत, जेडीयू को 21.8 प्रतिशत, एलजेपी को 7.9 प्रतिशत वोटरों का समर्थन मिला था. वहीं, आरजेडी को 15.4 प्रतिशत और कांग्रेस 7.7 प्रतिशत मत मिले. बावजूद इसके सीएम चेहरा तो नीतीश कुमार ही घोषित किए गए. स्पष्ट है कि जेडीयू से अधिक वोट बैंक के साथ भी बीजेपी को नीतीश के सामने छोटा भाई ही बना रहना पड़ेगा, ऐसी सियासी मजबूरी भी है.

'सियासी संतुलन की डोर नीतीश कुमार के हाथ' 
बकौल अशोक शर्मा, साफ है कि नीतीश कुमार जिधर भी चले जाते हैं, उस गठबंधन का पलड़ा भारी हो जाता है. बिहार के संदर्भ में ये बात वर्ष 2005 और 2010 के विधानसभा चुनाव में साबित भी हुई, जब जेडीयू- बीजेपी ने साथ मिलकर एनडीए की सरकार बनाई. इसके बाद 2015 में लालू यादव की आरजेडी के साथ नीतीश गए तो सरकार की कमान एक बार फिर सीएम नीतीश के ही पास रही. यानि बीजेपी हो या आरजेडी, सबके लिए नीतीश कंपल्सरी है. यही वजह रही कि अमित शाह के स्पष्टीकरण से पहले बार-बार ये कयास लगते रहे थे कि सीएम नीतीश की अगुवाई में आरजेडी और जेडीयू इकट्ठे आने जा रही है.

'प्रवासी मजदूरों के मुद्दे पर भी बीस पड़े नीतीश'
रवि उपाध्याय कहते हैं कि हाल में ही कोविड 19 के कारण हुए लॉकडाउन में जब बिहार के प्रवासी मजदूरों के मसले पर विपक्ष ने हो- हंगामा किया और खूब सियासत की तो सीएम नीतीश ने यहां भी सिक्सर मारा और विपक्ष बोल्ड हो गया. दरअसल, विपक्ष की मांग से पहले ही पहले सीएम नीतीश ने प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए हेल्पलाइन खोल दी. इसके बाद बाहर फंसे मजदूरों के खातों में 1000-1000 रुपये देने का ऐलान भी कर दिया. जाहिर है नीतीश कुमार ने यहां भी विपक्ष के हाथ से एक मुद्दा छीन लिया.

'विपक्ष ने भेजी बस तो नीतीश ने चलवा दी ट्रेन'
बकौल रवि उपाध्याय, इसके बाद प्रवासी मजदूरों को बिहार लाने की बात पर जब सियासत गर्म हुई और मजदूरों की मदद के लिए विपक्षी दलों द्वारा बसें भेजने का ऐलान किया जाने लगा तो सीएम नीतीश ने सियासत के इस मैदान पर भी एक और जोरदार छक्का मार दिया. पहले प्रवासियों को बिहार मंगाने में ना-नुकुर करने वाले सीएम नीतश ने डायरेक्ट केंद्र सरकार से बात की और तुरंत स्पेशल ट्रेन चलवाने को मनवा लिया. इसके बाद तो बिहार आने के लिए तो जैसे मजदूरों का रेला लग गया. हालांकि, विपक्ष इसके बाद भी राजनीति से बाज नहीं आया.

'मजदूरों में वो गुस्सा नहीं दिखता जो विपक्ष चाहता था'
रवि उपाध्याय कहते हैं कि विपक्ष ने फिर क्वारंटाइन सेंटर की कुव्यवस्था का सवाल उठाया तो बिहार सरकार ने सभी मजदूरों के लिए यूज्ड बर्तन और कपड़े व अन्य सामानों को घर ले जाने को कहा. इसके साथ ही यहां रहने वाले लोगों को आर्थिक मदद भी दी. जाहिर है सीएम नीतीश ने ये सिर्फ मानवीय दृष्टिकोण से ही नहीं किया, बल्कि इसके पीछे सियासत का ऐसा दांव था जो मजदूरों के असंतोष को उभरने ही नहीं दिया. विपक्ष द्वारा सरकार को फेल बताए जाने के बावजूद मजदूरों में नीतीश सरकार के खिलाफ वो गुस्सा नहीं दिखता है, जिसकी उम्मीद विरोधी दल कर रहे थे.

'विपक्ष के एक बार फिर बोल्ड होने के इंतजार में बीजेपी-जेडीयू'
अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि एक बार फिर नीतीश कुमार ही वर्चुअल चुनाव की बात पर लीड ले रहे हैं. जेडीयू-बीजेपी ने जहां वर्चुअल चुनाव की बात कह कर विपक्ष को बैकफुट पर लाने का काम किया है. विपक्ष के कुछ दलों ने इस बात पर अपनी पीड़ा निर्वाचन आयोग के साथ सर्वदलीय मीटिंग के दौरान जाहिर भी कर दी है. खास तौर पर आरजेडी जैसी पार्टी के लिए तो ये वास्तव में मुश्किल स्थिति खड़ी करने वाली है. अगर वह वर्चुअल चुनाव से भागती है तो जेडीयू-बीजेपी द्वारा उसे 'लालटेन छाप' (बीते जमाने की) पार्टी कहकर संबोधित किया जाएगा. वहीं, अगर वह मैदान में डटती है तो जाहिर है बीजेपी-जेडीयू इस मसले में उसपर भारी पड़ेगी. यानि यहां भी नीतीश कुमार ने अपनी पिच सेट कर दी है और इंतजार विरोधियों के एक बार फिर बोल्ड होने का है.
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