OPINION: तेजस्वी यादव का 'ओवररेटेड तेज'!

आरजेडी नेता तेजस्वी यादव बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान नए नायक के रूप में उभरे हैं (फोटो: न्यूज़ 18 ग्राफिक्स)
आरजेडी नेता तेजस्वी यादव बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान नए नायक के रूप में उभरे हैं (फोटो: न्यूज़ 18 ग्राफिक्स)

तेजस्वी अगर नीतीश कुमार (Nitish Kumar) और नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के बरक्स खड़े होते हैं, उन्हें चुनौती देते हैं तो इसमें सिर्फ उनका ही योगदान नहीं होता, बल्कि विरासत में मिली उनकी ताकत और लालू के जरिए खड़े सामाजिक समीकरण का भी सहयोग होता है. इन अर्थों में कह सकते हैं कि तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) को कुछ ज्यादा ही ताकतवर दिखाया जा रहा है

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 11, 2020, 9:48 PM IST
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नई दिल्ली. कहते हैं कि इतिहास विजेताओं का होता है... यह भी कहते हैं कि जो जीता वही सिकंदर. युद्ध और राजनीति की दुनिया की व्याख्याएं इन्हीं दो कहावतों के इर्द-गिर्द होती हैं. हां, खेल की दुनिया अपवाद है. चूंकि वहां राजनीति और युद्ध की तुलना में नियम कहीं ज्यादा प्रभावी होते हैं, खेल भावना प्रधान होती है, इसलिए वहां हारी हुई टीम का भी धुरंधर और मेहनती खिलाड़ी ‘मैन ऑफ द मैच’ (Man Of The Match) चुन लिया जाता है. भले ही उसकी टीम हार जाए, लेकिन टीम को उबारने की उसकी असाधारण कोशिश को खेल की दुनिया स्वीकार करती है. लेकिन राजनीति और खेल की दुनिया में ऐसे दृश्य अपवाद ही होते हैं. राजनीति और युद्ध की दुनिया में हारी हुई टीम के नेता के लिए सबसे ज्यादा अगर कोई कहावत सटीक बैठती है तो वो है, हारे को हरिनाम. लेकिन बिहार की चुनावी जंग (Bihar Assembly Election 2020) में पिछड़ चुके राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) के लिए ऐसा नहीं कहा जा सकता.

कहा जा रहा, तेजस्वी ने बिहार चुनाव में मोदी-नीतीश को पानी पिला दिया

तेजस्वी के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने छह वर्षों से देश के शीर्ष पर स्थापित और लोकतांत्रिक भारत के सबसे प्रभावी व्यक्ति यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पानी पिला दिया. कहा यह भी जा रहा है कि तेजस्वी ने उस नीतीश कुमार को भी एक तरह से पटखनी दे दी है, जो उनके जन्म से पहले से राजनीति की दुनिया में सक्रिय हैं, पंद्रह वर्षों से राजनीतिक तौर पर सर्वाधिक जागरूक माने जाने वाले राज्य बिहार के मुख्यमंत्री हैं, जो केंद्र की सरकार में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा चुके हैं. कहा तो यहां तक जा रहा है कि तेजस्वी ने अगर सिद्धार्थ गौतम को बुद्ध बनाने वाली सदानीरा गंगा-गंडक-कोशी की धरती पर देश की सबसे पुरानी पार्टी (कांग्रेस) का साथ नहीं लिया होता तो शायद वो आज उस बिहार के कर्णधार होते, जिसने दूसरी आजादी के आंदोलन को राह दिखाई थी.



विज्ञापन शब्दावली का एक सदस्य है मेकओवर.. छवि निर्माण की प्रक्रिया के लिए इस शब्द का इस्तेमाल विज्ञापनी दुनिया खूब करती है. उत्पाद या सामान के प्रति उपभोक्ताओं को लुभाने और अंतत: खरीद लेने के लिए मजबूर करने के लिए विज्ञापन की दुनिया जो छवि बनाती है, उसमें मेकओवर की प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होती है. इसके जरिए ही अपेक्षाकृत कम उपयोगी और कम गुणवत्ता वाला सामान भी बाजार में पहले अपनी जगह बनाता है, फिर उपभोक्ता को लुभाता है और अंतत: उपभोक्ता की जेब से निकले पैसों के बदले उसके घर, गाड़ी, जिंदगी आदि की शोभा की वस्तु बन जाता है. चूंकि आज जिंदगी के हर अनुशासन में उदारीकरण की दखल बढ़ गई है, ऐसे में राजनीति भला कैसे पीछे रहती. राजनीति की दुनिया भी मेकओवर के जरिए खुद को चमकाती है, राजनीति के उपभोक्ता यानी वोटर को लुभाती है और राजनीति के उत्पाद यानी अपनी दलगत नीतियों और नेताओं के लिए समर्थन जुटाती है. बिहार की चुनावी जंग में पिछड़ जाने वाले तेजस्वी यादव के बारे में कहा जा सकता है कि उनका मेकओवर करने वाले दिमाग और हाथ अपेक्षाकृत बेहतर रहे, इसीलिए उनका बेहतर मेकओवर किया गया और इसके जरिए योद्धा जैसी उनकी छवि गढ़ी गई. यह मेकओवर ही है कि उन्हें अब नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के बरक्स खड़ा कर दिया गया है.
बिहार के चुनावी दंगल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार ने एक साथ कई रैलियों और जनसभा को संबोधित किया था (फ़ाइल फोटो)


तेजस्वी ओवररेटेड हैं, उन्हें कुछ ज्यादा ही भाव दिया जा रहा है 

विज्ञापनों की दुनिया में ही एक और शब्द खूब इस्तेमाल किया जाता है, ओवर रेटेड यानी किसी उत्पाद को कुछ ज्यादा ही बेहतर (प्रचारित) बना देना. एक वर्ग यह भी कहने से बाज नहीं आ रहा कि तेजस्वी ओवररेटेड हैं, उन्हें कुछ ज्यादा ही भाव दिया जा रहा है. तेजस्वी अगर ओवररेटेड नहीं हैं तो क्या वो नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए बिहार की सीमाओं के बाहर के मैदानों में भी उतर सकते हैं? लोकतांत्रिक समाज और प्रक्रिया में हर कोई ताकतवर, प्रभावी और लोकप्रिय हस्तियों तक को चुनौती दे सकता है. लेकिन चुनौती देने वाली ताकत का आकलन प्रभावी व्यक्ति के सामने अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने की प्रक्रिया के दौरान होता है. तेजस्वी क्या इस निकष पर मोदी के सामने खरे उतर सकते हैं? अभी तक के अनुभव तो यही बताते हैं कि तेजस्वी ने भले ही बिहार में भीड़ जुटाई, नीतीश की अगुआई वाले गठबंधन को चुनौती दी, लेकिन यह भी सच है कि वो नरेंद्र मोदी को कम से कम अब भी बिहार से बाहर कहीं चुनौती देने की स्थिति में नजर नहीं आ रहे.

तेजस्वी को ज्यादा प्रभावी बताने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अच्छा या बुरा, जो भी हो, तेजस्वी के पास एक प्रभावी विरासत है. रांची के रिम्स अस्पताल में इलाज करवा रहे अपने सजायाफ्ता पिता लालू प्रसाद यादव और मां राबड़ी देवी के फोटो को तेजस्वी ने अपने और अपनी पार्टी के पोस्टरों से भले ही गायब कर दिया हो, लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि दुनिया नहीं जानती कि वो किसके बेटे हैं. तेजस्वी की पहली पहचान किसी सामान्य बिहारी माता-पिता के बेटे की नहीं है, बल्कि उनकी पहचान बिहार का प्रथम परिवार की तरह स्थापित हो चुके परिवार के बेटे की है. जिसके पिता और माता बिहार के कर्णधार रहे हैं. जिनके पास अकूत संपत्ति है, जिनके पिता की एक आवाज पर बिहार ही नहीं बिहार के बाहर भी भारी जुटान होता रहा है. लालू की छवि भले ही मसखराबाज राजनेता की रही हो, लेकिन यह उनका मेकओवर था और अपनी इस छवि को खुद लालू ने खुद के लिए गढ़ा और इसके जरिए सामान्य व्यक्ति तक संचार करने में सफल रहे. इसी सफलता के दम पर लालू यादव ने पंद्रह वर्षों तक बिहार पर सीधे राज किया. यह भूलना आसान नहीं है कि तेजस्वी उसी लालू के बेटे हैं, उनकी अपनी विरासत है.

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बिहार के कठिन चुनावी दंगल में एनडीए को 125 सीटों पर जीत हासिल हुई जबकि विपक्षी महागठबंधन 110 सीटों पर आकर रूक गई (फोटो: न्यूज़ 18 ग्राफिक्स)


शासन का मौका मिला तो उनके राज में लालू राज जैसे अनाचार नहीं होंगे

लालू-राबड़ी के फोटो पार्टी के पोस्टर से हटाकर तेजस्वी ने यह संदेश जरूर देने की कोशिश की, कि उन्हें अगर शासन का मौका मिला तो उनके राज में लालू राज जैसे अनाचार नहीं होंगे. बेशक वो अनाचार लालू राज के लिए बदनुमा दाग हो, लेकिन यह भी कटु सत्य है कि उस अनाचार के बावजूद लालू के चाहने वालों की संख्या कभी कम नहीं रही, उनकी एक आवाज पर रैलियां नहीं, रैला होता था. ऐसे परिवार के बेटे तेजस्वी अगर नीतीश और मोदी के बरक्स खड़े होते हैं, उन्हें चुनौती देते हैं तो इसमें सिर्फ उनका ही योगदान नहीं होता, बल्कि विरासत में मिली उनकी ताकत और लालू के जरिए खड़े सामाजिक समीकरण का भी सहयोग होता है. इन अर्थों में कह सकते हैं कि तेजस्वी यादव को कुछ ज्यादा ही ताकतवर दिखाया जा रहा है.

तेजस्वी के बारे में कहा गया कि चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने बेहद संतुलित बातें कीं. बेशक उन्होंने खूब मेहनत की, 251 सभाएं कीं लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि लालू यादव की विरासत उनके साथ नहीं रही, लालू की ताकत और प्रभाव को उन्होंने पूरी तरह झटक कर अलग कर दिया है. नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के बरक्स उनकी उम्र कम है, इसलिए उनकी मेहनत प्रशंसा का पात्र है. लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि रोहतास में दिया उनका भाषण उनकी फिसलन का गवाह है. सेल्फी लेने आए कार्यकर्ता के साथ बदसलूकी के वीडियो को तो उनके विरोधियों ने जमकर प्रचारित किया. जाहिर है कि तेजस्वी को राजनीति में अभी और परिपक्व होना होगा.
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