'15 साल के जंगलराज' पर क्‍यों 'कश्मकश' में हैं तेजस्‍वी यादव, क्‍या हैं इसके सियासी मायने?
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'15 साल के जंगलराज' पर क्‍यों 'कश्मकश' में हैं तेजस्‍वी यादव, क्‍या हैं इसके सियासी मायने?
तेजस्वी यादव और उनके माफीनामे की हकीकत क्या है?

Bihar Assembly Elections 2020: तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) ने कहा कि जिसमें रीढ़ का हड्डी होती है, वही झुकता है और जिसका नहीं वो रेंगता है.'

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पटना. विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) के लिए बिहार की सभी सियासी पार्टियों ने अपनी रणनीतियों पर चलना शुरू कर दिया है. JDU जहां विकासवाद के मुद्दे पर लड़ाई को आगे बढ़ाना चाहती है, वहीं आरजेडी (RJD) सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक न्याय के नारे के साथ आगे बढ़ रही है. हालांकि, बिहार की राजनीति में पिछले कुछ महीने से '15 साल का जंगलराज बनाम 15 साल का सुशासन' पर आरजेडी और जेडीयू की ओर से काफी पोस्टरबाजी हुई है. जाहिर है बिहार एनडीए इस मुद्दे को अपने लिए बेहद अहम मानती है. वहीं, आरजेडी 'जंगलराज' के ठप्पे से पार्टी को छुटकारा दिलाने की कवायद में लगी हुई है. इसी क्रम में हाल के दिनों में तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) ने कई बार कहा कि अगर 15 वर्षों के आरजेडी के शासनकाल में कुछ गलतियां हुई हैं तो वे इसके लिए बिहार की जनता से माफी मांगते हैं.

तेजस्वी अपने बयान में यह भी जोड़ते हैं कि 'हमने स्वीकार किया कि उन 15 सालों तेजस्वी था भी नहीं सरकार में, लेकिन फिर भी अगर हमसे कोई भूल हुई होगी तो हमको माफ कीजिएगा. लेकिन, लोग कहते हैं कि माफीनामा ठीक है भाई, हम कहते हैं जिसका रीढ़ का हड्डी होता है वही झुकता है और जिसका नहीं होता हैं वो रेंगता है.' जाहिर है तेजस्वी इसके साथ ही अपने ऊपर खड़े किए जा रहे सवालों का जवाब भी दे देते जिसके आधार पर विरोधी उनपर तंज कसेंगे.

आरजेडी नेता का बड़ा दांव!
माना जा रहा है कि आरजेडी नेता का यह बड़ा दांव है और लालू के 15 साल बनाम नीतीश के 15 साल के राजनीतिक चक्रव्यूह को तोड़ने की तेजस्वी की बड़ी कवायद भी है. हालांकि, राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह तेजस्वी के उस कशमकश, उस छटपटाहट को भी दिखाता है, जिसकी वजह से वह अपने राजनीतिक आधार का विस्तार नहीं कर पा रहे हैं. या यूं कहें कि आरजेडी के 'जंगलराज' के उस इमेज से छुटकारा नहीं दिला पाए हैं जो उन्हें विरासत में मिली है. सवाल यह है कि क्या तेजस्वी इस छवि से बाहर निकल पाएंगे.
राजनीतिक चर्चा के केंद्र में तेजस्वी


तेजस्वी यादव ने कहा, 'ठीक है, 15 साल हम सत्ता में रहे, लेकिन हम तो सरकार में नहीं थे. हम तो छोटे थे, लेकिन फिर भी हमारी सरकार रही. इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय किया.' वह कहते हैं कि लालू प्रसाद ने बिहार में सामाजिक न्याय किया. वह दौर अलग था. हालांकि, अगर इसी प्रकार की कोई कमी हुई हो तो उसके लिए वह माफी मांगते हैं. जाहिर है तेजस्वी अपनी इस माफी को लेकर बिहार की राजनीतिक चर्चा के केंद्र बिंदु में हैं.

'जंगलराज' इसलिए पड़ रहा भारी
राजनीतिक जानकार बताते हैं कि दरअसल 1990 से लेकर 2005 तक लालू एंड फैमिली का शासन रहा. इस दौरान राजनीति और अपराध में तालमेल था. जातिगत आधार पर कई जातीय नरसंहार हुए. भ्रष्टाचार का भी बोलबाला रहा और रंगदारी व किडनैपिंग जैसे अपराध आम हो गए थे. ऐसे ही हालात को देख पटना हाईकोर्ट ने शासन को "जंगलराज' कहा था. यही वो एक शब्द है जो विपक्ष की ताकत बनी और 2005 में सीएम नीतीश कुमार ने बिहार की सत्ता पर कब्जा कर लिया.

नीतीश ने 'जंगलराज' को खूब भुनाया
चाहे जैसे भी हो 2005 से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लगभग सीएम नीतीश ही काबिज हैं. ( बीच में कुछ महीने के लिए जीतन राम मांझी सीएम बने थे.) बहरहाल  सीएम नीतीश कुमार ने लालू के 15 साल के राज को ही मुद्दा बनकर बदलाव की उम्मीद लोगों में जगाकर नवंबर 2005 में बिहार में सत्ता की कमान संभाली थी, और अब भी वे इसी बदलाव की बात करते हैं.

नीतीश बना लालू-राबड़ी शासन की तुलना
हाल के दिनों सीएम नीतीश कार्यकर्ताओं के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये बात की तो उन्होंने एक बार फिर संकेत दिए कि इस बार भी लालू-राबड़ी राज बनान नीतीश राज ही मुद्दा बनेगा. उन्होंने बूथ कार्यकर्ताओं से स्पष्ट तौर पर कहा कि हमने पंद्रह सालों में हर क्षेत्र में काफी काम किया है और अगर आप लालू-राबड़ी के 15 सालों से तुलना करेंगे तो जनता को ये बताने की जरूरत नहीं होगी कि आखिर एक बार हमें फिर से वोट क्यों दें?

यूं गिरता चला गया आरजेडी का वोट प्रतिशत
दूसरी तरफ आरजेडी तेज प्रताप यादव और ऐश्वर्या राय प्रकरण के कारण काफी फजीहत झेल चुकी है. बीते लोकसभा चुनाव में आरजेडी का वोट प्रतिशत तो गिरा ही, साथ ही ऐतिहासिक हार भी हुई और उसके खाते में एक भी सीट नहीं आई. वहीं वोट प्रतिशत भी लगातार गिरता चला गया. 2004 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी को कुल वोटों का 30.7 प्रतिशत मत मिला था.2005 विधानसभा चुनाव में 23.45, 2009 लोकसभा चुनाव में 19.3,  2010 विधानसभा चुनाव में 18.8, 2014 लोकसभा में 20.5, 2015  विधानसभा में 18.3 और 2019 के लोकसभा चुनाव में 15.4 प्रतिशत वोट ही आरजेडी को मिले.

'मोदी युग' में बदल गया सामाजिक समीकरण
राजनीतिक जानकार बताते हैं कि बदले समय की राजनीति और केंद्र में मोदी युग आने के कारण बिहार के सियासी समीकरण में भी बड़ा बदलाव आया है. नीतीश कुमार को इसका एज है तभी तो 2017 में सीएम नीतीश ने आरजेडी का साथ छोड़ फिर से एनडीए का हिस्सा बनाना मुनासिब समझा. दरअसल बदले दौर की राजनीति में  लालू यादव ने भूरा बाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) साफ करो की नीति अब कारगर नहीं रही. इसके साथ ही लालू यादव अपने कोर वोट बैंक एम-वाई (मुस्लिम-यादव) पर ही ज्यादा विश्वास किया करते थे, वह भी इंटैक्ट नहीं रहा. ऐसे में आरजेडी तेजस्वी के नेतृत्व में बदलता हुआ दिखना चाहती है. या यूं कहें कि इसकी शुरुआत भी हो चुकी है.

सर्वसमाज को साधने की कोशिश में तेजस्वी
तेजस्वी यादव ने आरजेडी को यादव-मुस्लिम टैग से बाहर निकालकर सर्वसमाज की पार्टी बनाने की कवायद की है.पहले आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी राजपूत बिरादरी के जगदानंद सिंह को सौंपी और ब्राह्मण चेहरा मनोज झा को राज्यसभा भेजा. वहीं, पार्टी ने अपने कोर वोटबैंक की जगह भूमिहार तबके से आने वाले अमरेंद्र धारी सिंह को राज्यसभा भेजकर बड़ा संदेश देने की कोशिश की.

बार-बार माफी के समझिये मायने
खास बात यह है कि तेजस्वी ने इससे पहले इसी साल 23 फरवरी को पटना के वेटनरी कॉलेज मैदान में  कहा था कि लालू-राबड़ी सरकार के समय कुछ गलतियां हुई होंगी, मैं उसे स्वीकार करता हूं. उसके लिए आप सबसे माफी भी मांगता हूं.  किंतु अब नया जमाना है और पुरानी बातों को भूलकर हमें नया बिहार बनाना है. यही बात बीते पांच जुलाई को राष्ट्रीय जनता दल के स्थापना दिवस पर भी दोहराई.  वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि तेजस्वी बार-बार इसलिए माफी मांग रहे हैं कि बीते लोकसभा चुनाव में उन्होंने सवर्ण आरक्षण का विरोध किया. मुस्लिम-यादव गठजोड़ की भी राजनीति की, पर हाथ तो सिफर ही लगा. वे यह भी समझते हैं कि वे लालू नहीं हैं जो जनता किसी भी स्थिति में उनके पीछे लाठी उठाकर चल देगी, जमाना अब बदल गया है.

नये जमाने में लालू के 'जंगलराज' से मुक्ति जरूरी
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि तेजस्वी ये जानते हैं कि वे खुद नए हैं और अब यूथ को अब जाति-जमात की राजनीति में बांधना कठिन काम है. ऐसे में अब तीन  दशक पहले जिस रास्ते पर चलते हुए लालू प्रसाद यादव को मंजिल मिली थी, वह रास्ता अब घिस-पिट गया है. ऐसे में सत्ता के लिए समाज के सभी तबके को जोड़कर थोड़ा-थोड़ा हिस्सा पाना जरूरी होगा.

क्या तेजस्वी यादव की माफी दिलाएगी आरजेडी को सत्ता?
रवि उपाध्याय कहते हैं कि हालांकि तेजस्वी इस बात से वाकिफ हैं कि अभी भी यादव और मुस्लिमों के वोटों का सबसे अधिक हिस्सा उन्हीं के साथ है. ऐसे में अगर दूसरी जातियों में थोड़ी-थोड़ी सेंधमारी भी करने में कामयाब हुए तो कामयाबी मिल सकती है. जाहिर है यही वजह है कि पार्टी के जातीय समीकरण को बदलते हुए लगातार माफी मांग रहे हैं. ऐसे में देखना दिल्चस्प होगा कि तेजस्वी की यह कोशिश चुनाव में कितना असर दिखाती है.

 
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