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Opinion: आखिर क्यों नीतीश सरकार के खिलाफ लोगों के दिलों में बढ़ रहा आक्रोश, बिहार चुनाव पर भी होगा असर?

Opinion: आखिर क्यों नीतीश सरकार के खिलाफ लोगों के दिलों में बढ़ रहा आक्रोश, बिहार चुनाव पर भी होगा असर?

बिहार के लंबित राशन कार्ड धारकों को मिलेंगे एक-एक हजार रुपए (फाइल फोटो)

बिहार के लंबित राशन कार्ड धारकों को मिलेंगे एक-एक हजार रुपए (फाइल फोटो)

विपक्षी दल इस कोरोना काल (Corona era) में बहुत कुछ तो नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन नीतीश सरकार को घेरने का कोई अवसर भी नहीं जाने देना चाह रहे. सवाल यह भी है कि नीतीश सरकार क्या खुद अपने ही सवालों में उलझी हुई है या फिर वह विपक्ष को जवाब देना मुनासिब नहीं समझती है.

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पटना. कोरोना संकट काल (COVID-19 crisis) में बिहार सरकार कैसा काम कर रही है? क्या वह जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतर रही है?  क्या वह आम लोगों की भावनाओं का सही आकलन कर पा रही है?  क्या वह इस स्थिति में है कि बिहार की जनता एक बार फिर नीतीश सरकार पर भरोसा जताए? दरअसल, ये सवाल इसलिए उत्पन्न हो रहे हैं, क्योंकि अब बिहार विधानसभा चुनाव को महज 4-5 महीने ही शेष बचे हैं.

दरअसल अक्टूबर-नवंबर में संभावित चुनाव के मद्देनजर विपक्षी दल इस कोरोना संकट को लेकर बहुत कुछ तो नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन नीतीश सरकार को घेरने का कोई अवसर भी नहीं जाने देना चाह रहे. यही वजह है कि तेजस्वी यादव और उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेता बार-बार कोटा में फंसे छात्रों और अप्रवासी मजदूरों का मुद्दा लगातार सोशल मीडिया पर उठाते रहे हैं.

जवाब से भागती नीतीश सरकार!
यहां सवाल यह भी है कि नीतीश सरकार क्या खुद अपने ही सवालों में उलझी हुई है या फिर वह विपक्ष के सवालों का जवाब देना भी मुनासिब नहीं समझती है. इन प्रश्नों के बीच दो बड़े सवाल ऐसे हैं जिसका आने वाले चुनाव पर क्या असर होगा इस बात का जवाब स्वयं 15 वर्षों से बिहार की सत्ता पर काबिज नीतीश सरकार के पास भी नहीं है.

CM नीतीश के सामने ये हैं चुनौतियां
दरअसल, ये दो सवाल भर ही नहीं, बल्कि 'आक्रोश की ज्वालामुखी' हैं जो आने वाले समय में नीतीश सरकार पर फट सकते हैं. आक्रोश की दो ज्वालामुखी अप्रवासी मजदूर और हमारे वे छात्र और उनके परिवार हैं, जो बाहर के प्रदेशों में फंसे हुए हैं. इनमें से कुछ तो वापस आ पाए हैं, मगर अधिसंख्य बिहार आने की छटपटाहट में दिन काट रहे हैं. राजनीतिक जानकारों की मानें तो ये दो 'आक्रोश' नीतीश सरकार के लिए काफी मुश्किलें खड़ी करने वाले हैं.

नीतीश सरकार के रवैये पर सवाल
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मणिकांत ठाकुर कहते हैं- सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक, तीनों क्षेत्रों पर कोरोना संकट का इफेक्ट रहेगा. बिहार के चुनाव के संदर्भ में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को दो बातों से बड़ा नुकसान हो सकता है. पहला ये कि जिस तरीके का रवैया नीतीश सरकार का अप्रवासी मजदूरों के प्रति रहा है, उससे ये अप्रवासी मजदूर नीतीश से दिल से उखड़ गए हैं. कोरोना के कहर से अधिक बिहार सरकार की सख्ती से उनका जीवन नर्क हो गया.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. (फाइल फोटो)


कामगारों पर टूटा पहाड़
मणिकांत ठाकुर कहते हैं, 'कोरोना-बंदी की घोषणा के वक्त माइग्रेंट के बारे में नहीं सोचा गया, ये केंद्र सरकार की गलती थी. अचानक इस फैसले से असंगठित क्षेत्र के कामगार-मजदूरों पर बड़ा पहाड़ टूट पड़ा. ये जान-बूझकर नहीं कहा जा सकता है, लेकिन इस बड़ी समस्या के बारे में सोचा ही नहीं गया.'

क्यों कुतर्क गढ़ रही बिहार सरकार? 
इसके बाद तो बिहार की नीतीश सरकार की भी 'आपराधिक' चूक हुई है. जब मौका था कि अप्रवासियों को एक्सेप्ट कर लेना चाहिए था. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने खुद को 'बुरा फंसे' समझ कर अपने लिए समय रहते इस समस्या का निवारण कर लिया. उसी राह पर एमपी की शिवराज सरकार भी चल रही है, मगर बिहार सरकार अपनी जिद में इसे टालती रही. यही नहीं, उस पर तर्क भी कुतर्क के साथ गढ़ती रही.

बकौल मणिकांत ठाकुर 'जिस तरह से लोग सड़कों पर आ गए और जैसे-तैसे बिहार आने लगे. रेलगाड़ी और ट्रकों-बसों के जरिये व्यवस्थित तरीके से बुलाते तो ये ठीक रहता. दो हजार-चार हजार लोग पैदल चले आ रहे थे, क्या ये नीतीश सरकार को नहीं दिख रहा है.'

कैसे भरेंगे लोगों के 'मन के घाव'?
मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि चूंकि बिहार में सर्वाधिक माइग्रेंट हैं वे सब लोग आने वाले चुनाव तक तो घर लौटेंगे ही. ऐसा इसलिए भी होगा क्योंकि उसी समय दुर्गापूजा और छठ पर्व हुआ करता है. ऐसे में अगर ये आ गए तो इनके 'मन के घाव' की कीमत नीतीश सरकार को चुकानी होगी. यही नहीं कोटा और अन्य प्रदेशों में फंसे छात्रों के साथ बाहर जो फंस गए, उनको भी एड्रेस नहीं किया गया.

चुनाव के महज 4-5 महीने ही शेष हैं पर बिहार विपक्ष के पास नीतीश सरकार पर हमलावर होने का मौका भी नहीं है. (फाइल फोटो)


बकौल मणिकांत ठाकुर- 'कोटा वाला प्रकरण तो बहुत बड़ा फेल्योर था. जैसे भी होता बाहर फंसे छात्रों को बुला लेना चाहिए था. मगर जिद पर अड़ गए. मेरा तो मानना है कि जितना कोरोना से नुकसान नहीं हुआ, उससे ज्यादा नीतीश सरकार की जिद और प्रस्तुत किए गए उनके कुतर्क से होगा. जो सामर्थ्यवान थे वो चले आए. लेकिन जो फंसे हैं वे जब लौटेंगे, उनका आक्रोश आने वाले चुनाव में असर दिखाएगा ही.'

क्या बदलेगी बिहार की राजनीति?
वहीं वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि सीएम नीतीश कुमार को लगता है कि वे पीएम मोदी के नाम के सहारे चुनाव जीत जाएंगे. पर ये भी जमीनी सच्चाई है कि कोरोना संकट अभी लंबा चलेगा, ऐसे में केंद्र की सरकार के खिलाफ भी असंतोष बढ़ने की ही आशंका अधिक दिख रही है.

बकौल अशोक कुमार शर्मा विपक्ष इस आक्रोश को भुनाने की कोशिश में तो जरूर है, पर कोरोना संकट और लॉकडाउन की वजह से वह बहुत कुछ कर पाने की स्थिति में फिलहाल नहीं है. लेकिन जनता के हाथ खुले हैं और ये दोनों आक्रोश भी लोगों के दिलों में जीवित हैं और आने वाले चुनाव तक अगर इसी तरह आक्रोश की ये आग धधकती रही तो बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव हो सकते हैं.

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Tags: Bihar News, BJP, Congress, Corona Virus, COVID 19, Jdu, Jitan ram Manjhi, Lockdown, Nitish kumar, PATNA NEWS, RJD, Tejaswi yadav, Upendra kushwaha

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