Bihar Election: क्या बदलाव के संकेत हैं तेजस्वी की सभा में आ रही भीड़ ? जानें जीत-हार का गणित

चुनावी रैली को संबोधित करते तेजस्वी यादव. (File Photo)
चुनावी रैली को संबोधित करते तेजस्वी यादव. (File Photo)

Bihar Election: बिहार की राजनीति (Bihar Politics) में भीड़ और वोट के अलग-अलग मायने होते हैं. कहा जाता है कि भीड़ तो हेलिकॉप्टर देखने भी आती है लेकिन वोट किसे देना है इसका फैसला लोग पहले ही कर चुके होते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 3, 2020, 10:35 PM IST
  • Share this:
सुमित झा

पटना. बिहार में हो रहे विधानसभा चुनाव (Bihar Election 2020) के बीच एक शब्द जो लोगों के जेहन में सबसे अधिक है वो है भीड़. दरअसल ये वो शब्द या यूं कहें दृश्य है जिसके ईर्द गिर्द चुनाव के नतीजों के रहने के कयास लगाए जा रहे हैं. क्या भीड़ से तय होते हैं चुनाव के नतीजे? या फिर वोट में तब्दील नहीं हो पाती है भीड़? क्या भीड़ से तय होती है जीत-हार? ये सवाल अगर उठ रहे हैं तो इसके पीछे वजह है आरजेडी खेमे की ओर से तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) की सभा में जुटने वाली भीड़ को लेकर जीत के दावे.

खुद तेजस्वी यादव अपने ट्विटर हैंडल से हर रोज अपनी सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ की तस्वीर डालते हैं और भीड़ को सत्ता परिवर्तन का संकेत बताते हैं. तेजस्वी यादव की जनसभा में उमड़ने वाली भीड़ को लेकर तेजस्वी के पक्ष में लहर होने का आरजेडी का दावा है लेकिन इस दावे को सीएम नीतीश ने सिरे से खारिज किया. न्यूज 18 बिहार-झारखंड को दिए इंटरव्यू ने सीएम नीतीश ने कहा कि भीड़ से नतीजों का कोई मतलब नहीं, हालांकि नीतीश के दावों में कुछ हद तक दम भी नज़र आता है. समझने के लिए ज़रा ये तस्वीर देखिए.



2010 की रैली में लालू के साथ रामविलास

2010 विधानसभा चुनाव के दौरान जब लालू और रामविलास पासवान साथ थे तब उन्होंने एक साझा रैली की थी जिसकी ये तस्वीर है. लालू-रामविलास की 2010 की रैली में खूब भीड़ उमड़ी थी लेकिन फिर भी 2010 में आरजेडी-एलजेपी गठबंधन की करारी हार हुई थी. आरजेडी-एलजेपी गठबंधन को महज 25 सीटें हासिल हुईं. आरजेडी 22 पर सिमट गई, तो एलजेपी को महज 3 सीटें मिली थीं.

अब जरा 2015 चुनाव के दौरान पीएम मोदी की सभा में उमड़ी तस्वीर देखिए

बिहार में हुई पीएम नरेंद्र मोदी की रैली में उमड़ी भीड़


2015 चुनाव में पीएम मोदी की हर जनसभा में खूब भीड़ उमड़ी थी लेकिन एनडीए की करारी हार हुई थी बीजेपी को सिर्फ 53 सीटें मिली, हालांकि वोट प्रतिशत में बीजेपी ने बाजी मारी थी और 25 फीसदी वोट मिले थे. इन दोनों चुनावों से साफ है भीड़ को चुनाव नतीजों का पैमाना नहीं माना जा सकता है. हालांकि भीड़ को लेकर जीत के दावे सभी करते हैं. जहां तेजस्वी यादव भीड़ ज़रिए सत्ता परिवर्तन का दावा करते हैं, वहीं पीएम मोदी भी अपनी रैलियों में उमड़ी भीड़ को एनडीए की जीत के तौर पर पेश करते हैं

वैसे सवाल ये भी है कि चुनावी सभा में आने वाली भीड़ में कौन लोग होते हैं। सीएम नीतीश कुमार ने भी न्यूज़ 18 को दिए इंटरव्यू में ये सवाल उठाए हैं. नीतीश ने पूछा है कि आखिर तेजस्वी की सभा में आने वाली भीड़ में कौन लोग होते हैं. नीतीश के सवाल का जवाब समझने के लिए तेजस्वी की सभा में उमड़ी भीड़ और नीतीश की सभा में उमड़ी भीड़ को समझिए. तेजस्वी की सभा में भीड़ आक्रामक और शोर करती नज़़र आती है. नीतीश की सभा में भीड़ शांत रहती है.



आरजेडी का मुस्लिम-यादव वोट बेस मुखर माना जाता है. नीतीश का वोटर बेस 'ईबीसी' शांत माना जाता है. तेजस्वी की सभा में लाल झंडा लहराते वामपंथी समर्थक भी रहते हैं. नीतीश की सभा में कोर एनडीए समर्थक और वोटर रहते हैं. तेजस्वी की सभा में भीड़ बिल्कुल मंच के पास खड़ी रहती है. मंच के पास भीड़ के होने से कैमरे पर एक बज क्रिएट होता है. नीतीश की सभा में मंच से करीब 50 मीटर दूरी पर भीड़ रहती है. दूरी पर रहने से कैमरे में भीड़ कम नज़र आती है. तेजस्वी की सभा में महिलाओं की बहुत कम होती है, नीतीश की सभा में महिलाएं नजर आती हैं. भीड़ को लेकर दावों के बीच सवाल ये भी है कि क्या भीड़ में आने वाले लोग भाषण सुनकर अपना वोट तय करते हैं या फिर सभा में आने वाली भीड़ उसी नेता को वोट देते हैं.

वैसे भीड़ बनकर नेताओं को लोग सुनने जरूर जाते हैं, लेकिन उनके ज़ेहन में खुद से जुड़ा मुद्दा पहले से ही तय रहता है, हालांकि कई बार भीड़ प्रायोजित भी होती है, जिसे नेता के भाषण से कोई मतलब नहीं होता है. ऐसे में भीड़ नहीं, बल्कि मतदान केंद्र पर पहुंचने वाले वोटर तय करेंगे सरकार किसकी बनेगी.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज