बिहार: बेगूसराय में कन्हैया कुमार पर कैसे भारी पडे़े गिरिराज, पढ़ें पांच वजह

बेगूसराय की सीट पर सबसे दिलचस्प चुनावी लड़ाई मानी जा रही थी. कन्हैया कुमार के लिए वामपंथी धड़ों के कई सेलिब्रेटीज भी बेगूसराय पहुंचे, लेकिन कोई रणनीति काम नहीं आई.

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: May 23, 2019, 2:56 PM IST
बिहार: बेगूसराय में कन्हैया कुमार पर कैसे भारी पडे़े गिरिराज, पढ़ें पांच वजह
फाइल फोटो
Vijay jha | News18 Bihar
Updated: May 23, 2019, 2:56 PM IST
बिहार के सबसे हॉट सीट बेगूसराय में बीजेपी के उम्मीदवार गिरिराज सिंह ने लगभग तीन लाख से ज्यादा मतों से सीपीआई के कन्हैया कुमार को हरा दिया है.  हालांकि शुरुआती दौर में जब यहां के बछवाड़ा और तेघड़ा (कम्युनिस्ट प्रभाव वाला क्षेत्र) के ईवीएम की गिनती हुई तो कन्हैया कुमार कई बार दूसरे स्थान पर रहे. लेकिन गिरिराज सिंह ने बाद में निर्णायक बढ़त बना ली और अंत में वे तीन लाख के भारी मतों के अंतर से जीतने में कामयाब हो गए.

दरअसल बेगूसराय की सीट पर सबसे दिलचस्प चुनावी लड़ाई मानी जा रही थी. कन्हैया कुमार के लिए वामपंथी धड़ों के कई सेलिब्रेटीज भी बेगूसराय पहुंचे, लेकिन कोई रणनीति काम नहीं आई. आइए हम नजर डालते हैं उन कारणों पर जो गिरिराज सिंह की जीत और कन्हैया कुमार की हार की वजह बनी.

पीएम मोदी के चेहरे पर विश्वास 

इस हाईप्रोफाइल सीट पर कन्हैया कुमार  ने बार-बार पीएम मोदी को निशाना बनाया, जो यहां की जनता ने खारिज कर दिया. पीएम मोदी पर लगाए जाने वाले जिन आरोपों के तहत कन्हैया ने अपना जनाधार बढ़ाना चाहा, उन्हीं बातों को गिरिराज सिंह ने अपना हथियार बना लिया और पीएम मोदी के चेहरे पर ही वोट मांगा. गिरिराज सिंह को ऐसे भी पीएम मोदी का काफी करीबी माना जाता है.

राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह की लड़ाई

जिस अंदाज में गिरिराज सिंह ने अपना प्रचार शुरू किया था इससे साफ था कि वे चुनावी लड़ाई को देशद्रोह और देशभक्ति के बीच की लड़ाई बनाना चाहते हैं. इसमें वह काफी हद तक कामयाब भी रहे. उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर वंदे मातरम जैसे नारों को भी बार-बार उछाला और जनभावना के साथ चले.

वामपंथी मॉडल को लोगों ने नकारा
कन्हैया की नजर जिन वोटों पर थी, उनका बड़ा हिस्सा उनके प्रचार के तरीके के बाद खिसकता गया. उनका समर्थन करने वाले लोग जो दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों आए थे, उन्होंने... हम लेके रहेंगे आजादी जैसे नारों को ही अपना आधार बनाया. आज हिंदुस्तान की जनता उसे सीधे जेएनयू में लगाए गए देशद्रोही नारे से जोड़कर देखती है. ऐसे में लोगों ने कन्हैया को उसी नजर से देखना शुरू कर दिया.

भूमिहार वोटों में नहीं लग पाई सेंध

कन्हैया कुमार जाति से भूमिहार हैं और वह बेगूसराय के ही रहने वाले हैं. हालांकि ये दोनों ही फैक्टर उनके काम नहीं आए. दरअसल कन्हैया कुमार जब बेगूसराय पहुंचे तो सबकी नजर भूमिहार वोटरों पर थी. लेकिन लालू के उदय के साथ ही भूमिहारों की पहली प्राथमिकता लालू का विरोध हो गया. ऐसे में कन्हैया का लालू यादव का पैर छूने की बात यहां के भूमिहार भूल नहीं पाए. गिरिराज सिंह ने इसे अपनी रणनीति का हिस्सा भी बनाया था.

नीतीश कुमार का मिला साथ 

चुनाव प्रचार करने से पहले जब गिरिराज सिंह ने नीतीश कुमार से मुलाकात की तो उन्हें उनका समर्थन भी मिल गया. इसके साथ ही यह परसेप्शन बन गया कि नीतीश कुमार भी चाहते हैं कि गिरिराज सिंह जीते. उन्होंने नीतीश कुमार की तीन सभाएं अपने क्षेत्र में करवाईं, इससे नीतीश समर्थक वोट भी गोलबंद हो गए और गिरिराज सिंह के पक्ष में भारी मतदान किया.

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