ANALYSIS: क्या नीतीश के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर अपनाकर बिहार में दोहरा खेल खेल रही है कांग्रेस?

Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: September 11, 2019, 6:10 PM IST
ANALYSIS: क्या नीतीश के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर अपनाकर बिहार में दोहरा खेल खेल रही है कांग्रेस?
कांग्रेस में लगातार नीतीश कुमार के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर बना हुआ है.

एक ओर महागठबंधन में रहते हुए आरजेडी (RJD) पर दबाव बनाकर ड्राइविंग सीट पर आने की कोशिश है? वहीं पूरी कोशिश इसकी भी है कि किसी तरह नीतीश कुमार (Nitish Kumar) का साथ मिल जाए, ताकि उनकी ताकत के भरोसे अपने पैरों पर फिर से खड़ी हो सके. 

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पटना. लोकसभा चुनाव 2019 (Lok Sabha Election 2019) में महागठबंधन की करारी हार ने हर पार्टी को बुरी तरह से तोड़कर रख दिया, लेकिन इसमें अकेली कांग्रेस (Congress) ही ऐसा पार्टी थी जिसने अपने सहयोगी दलों पर भौहें टेढ़ी कर दीं. महागठबंधन की ओर से इकलौती किशनगंज (Kishanganj) की सीट जीतकर कांग्रेस ने अपने सहयोगी दलों के यह अहसास कराया कि अगर किसी में कोई ताकत है तो वो कांग्रेस ही है. यही कारण है कि अब कांग्रेस बिहार की पांच विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव में तीन सीटों पर ताल ठोक रही है. इसके लिए आलाकमान को राजी करने के लिए बिहार कांग्रेस के बड़े नेता गुरुवार को दिल्ली में सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) से मिलेंगे.

कुल मिलाकर कांग्रेस, यह संदेश देने में जुटी है कि अगर महागठबंधन रहेगा तो अब ड्राइविंग सीट पर आरजेडी (RJD) की जगह कांग्रेस बैठेगी. यह अलग बात है आरजेडी इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है. इस बीच लगातार कांग्रेस के नेता नीतीश कुमार पर डोरे डाल रहे हैं. 2019 के चुनाव परिणाम के बाद दो बार महागठबंधन के नेता हार की समीक्षा करने और आगे की रणनीति बनाने के लिए बैठे, लेकिन पहली बार तो कांग्रेस ने पूरी तरह से बैठक से किनारा किया और दूसरी बार उसके नेता मीटिंग में गए. लेकिन बॉडी लैंग्वेज से ऐसा लगा मानो वो बे-मन से आए हैं.

लोकसभा चुनाव नतीजों में मुंह की खाने के बाद महागठबंधन विशेष कर कांग्रेस नीतीश कुमार पर डोरे डालने की कोशिश कर रही है 


'महागठबंधन में फिलहाल सीएम कैंडिडेट कोई नहीं'

कांग्रेस के नेता लगातार यह बयान देते रहे हैं कि महागठबंधन में फिलहाल सीएम कैंडिडेट कोई नहीं है. जबकि आरजेडी की ओर से लगातार यह कहा जाता रहा कि नेता तो तेजस्वी यादव ही होंगे, लेकिन हर बार कांग्रेस ने इससे किनारा किया. इस बीच कांग्रेस ने अकेले चुनाव में जाने की बात कही जिससे महागठबंधन में हड़कंप मच गया है. कांग्रेस के बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल ने साफ तौर पर संदेश दिया कि अगर साथ मिलकर चुनाव लड़ना है तो पर्सनल एजेंडा छोड़ना होगा, नहीं तो हम कोई भी फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं.

महागठबंधन में लीड रोल में आना चाहती है कांग्रेस
यह साफ संदेश था कि तेजस्वी को महागठबंधन की ओर से सीएम कैंडिडेट बनने का ख्याल फिलहाल छोड़ना होगा तभी कांग्रेस, महागठबंधन में साथ रहेगी. जाहिर है कि यह बयान महागठबंधन में बैचेनी बढ़ाने वाला था. शायद यही कारण था कि मामले को सुलझाने के लिए उपेन्द्र कुशवाहा को शक्ति सिंह गोहिल से मिलना पड़ा. चुनाव में हार की फजीहत और तेजस्वी के असफल नेतृत्व के बाद कांग्रेस अब खुद महागठबंधन में लीड रोल में आना चाहती है. विधानसभा की पांच सीटों पर उपचुनाव होना है. जिसमें से तीन पर कांग्रेस ने दावेदारी ठोककर आरजेडी को एक और मैसेज दे दिया कि अब चीजें आपसे अधिक चाहिए, कम तो बिल्कुल नहीं चलेगा.
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चुनाव में हार की फजीहत और तेजस्वी के असफल नेतृत्व के बाद कांग्रेस अब खुद महागठबंधन में लीड रोल में आना चाहती है.


बिहार कांग्रेस के नेता गुरुवार को दिल्ली में पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात करने वाले हैं. जिसमें पार्टी के कार्यक्रमों और आगे की रणनीति वो सामने रखेंगे और उन्हें (सोनिया गांधी) इस बात के लिए सहमत करने की कोशिश करेंगे कि बिहार कांग्रेस को फिर से अपने बलबूते पर खड़ा होने की कोशिश करनी चाहिए.

नीतीश कुमार के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर
इस बीच कांग्रेस में लगातार नीतीश कुमार के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर बना हुआ है. मोदी मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होने से उपजे विवाद पर कांग्रेस ने बीजेपी पर तो हमला बोला, लेकिन नीतीश कुमार के प्रति सॉफ्ट रही. यहां तक कि बीजेपी नेता संजय पासवान के बयान से भी बिहार की राजनीति में तूफान उठा है, लेकिन उसमें भी कांग्रेस, नीतीश कुमार के प्रति नरम है.

बीजेपी नेता संजय पासवान के बयान से बिहार की राजनीति में तूफान उठा है, लेकिन उसमें भी कांग्रेस, नीतीश कुमार के प्रति नरम है. (फाइल फोटो)


 

ऐसे में कांग्रेस का यह रवैया कुछ विचित्र है. एक ओर वो महागठबंधन में दबाव बनाकर रखना चाहती है ताकि आरजेडी के सही बारगेनिंग (मोल-भाव) किया जा सके. तो वहीं, नीतीश कुमार के प्रति भी नरम रुख बनाए हुए है कि अगर नीतीश कुमार का बीजेपी के प्रति थोड़ा भी मन डोला तो वो उनके साथ हो लेंगे.

कांग्रेस के पास बिहार में कितनी राजनीतिक ताकत है, यह बात किसी से छिपी नहीं है. पहले लालू प्रसाद यादव के दम पर पार्टी को लंबे समय तक जीवित रखा और फिर तेजस्वी को भरोसे में लेने के लिए आ गयी. लेकिन तेजस्वी के फेल होते ही अब उनसे मोह भंग हो गया है. ऐसे में कांग्रेस को लगता है कि अगर नीतीश कुमार का साथ मिला तो फिर से वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है. खेल फिलहाल दोहरा है, लेकिन उसमें सफलता किधर से मिलेगी, कहना मुश्किल है.

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First published: September 11, 2019, 5:35 PM IST
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