NDA और महागठबंधन में जबरदस्त उहापोह, क्या फिर दांव-पेंच में फंस गई बिहार की राजनीति?

आने वाले दिनों में बिहार में फिर कोई राजनीतिक भूचाल तो नहीं आ रहा? क्यों बीजेपी-जेडीयू के नेताओं ने एक दूसरे के सियासी इफ्तारों से बनाई दूरी?

Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: June 3, 2019, 5:00 PM IST
NDA और महागठबंधन में जबरदस्त उहापोह, क्या फिर दांव-पेंच में फंस गई बिहार की राजनीति?
तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार (फाइल फोटो)
Deepak Priyadarshi
Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: June 3, 2019, 5:00 PM IST
लोकसभा चुनाव के बाद बिहार में एनडीए और महागठबंधन दोनों में जबरदस्त उहापोह चल रहा है. पूरे चुनाव अभियान में एक दूसरे का हाथ थामे दिख रही दोनों गठबंधन की पार्टियां इस समय एक दूसरे से आंख चुरा रही हैं. इस समय सभी पार्टियों की नजर में अब 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव है. ऐसे में सभी पार्टियां इस मंथन में जुट गई है कि किसका हित किसके साथ जाने और रहने पर सधेगा.

महागठबंधन में शामिल हम पार्टी के नेता जीतन राम मांझी नीतीश कुमार के इफ्तार में गए. आरजेडी के बड़े नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने एक बार फिर नीतीश कुमार को साथ लाने का बयान दे दिया. सबसे बड़ा सवाल यह है कि बीजेपी और जेडीयू के बीच एक साथ रहने के बाद भी तल्खी क्यों दिख रही है. अगर तल्खी नहीं होती तो 2 जून को बीजेपी और जेडीयू की ओर आयोजित सियासी इफ्तार से दोनों पार्टी के नेता दूरी क्यों बनाते?

लोकसभा चुनाव के बाद बिहार की राजनीति करवट लेने की कगार पर
बिहार की राजनीति एक बार फिर करवट लेने के कगार पर है. लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद ऐसा लगा कि महागठबंधन में तूफान तो आएगा लेकिन एनडीए में ऑल इज वेल है. लेकिन मोदी मंत्रिमंडल में सांकेतिक भागीदारी ने इस दोस्ती में अघोषित दरार पैदा कर दी. उसका नतीजा यह था कि जेडीयू ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने से इनकार किया तो बिहार में नीतीश कुमार के ऑफर के बाद भी बीजेपी ने भी मंत्रिमंडल विस्तार में शामिल होने से फिलहाल इनकार कर दिया. जबकि दो मंत्री बीजेपी की ओर से बनाने का स्कोप है.

जीतन राम मांझी और नीतीश कुमार (फाइल फोटो)


दोनों ही पार्टियां भले ही ऑल इज वेल कह रही हों, सरकारी बैठकों और कार्यक्रमों में नीतीश कुमार और सुशील मोदी साथ साथ दिख रहे हो लेकिन सबकुछ पहले की तरह स्वभाविक नहीं है. 2 जून को सुशील मोदी और जेडीयू की ओर से इफ्तार का आयोजन हुआ लेकिन दोनों ही दलों ने एक दूसरे के इस सियासी इफ्तार से दूरी बना ली. दोनों ही पार्टियों की ओर से कोई नेता एक दूसरे के इस आयोजन में नजर नहीं आया.

लोकसभा के बाद सबकी नजरें अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव पर
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सबसे दिलचस्प पहलू यह था कि जेडीयू के इफ्तार में हाल के दिनों में उनके धुर विरोधी बने हम के नेता जीतनराम मांझी ने शिरकत की. सियासी गलियारों में इसे नीतीश कुमार का बीजेपी को दिए जा रहे एक संकेत के रूप में देखा जा रहा है. राजनीति में इस तरह का हर कदम कुछ न कुछ संदेश जरूर देता है. ऐसे में माना यह जा रहा है कि दिल्ली से लौटने के बाद नीतीश कुमार का तल्ख बयान, आनन फानन में मंत्रिमंडल विस्तार और इस तरह के आयोजन से दूरी के जरिए नीतीश कुमार शायद यह संदेश भी देने की कोशिश में हैं कि 2020 की चुनावी लड़ाई गठबंधन की नहीं बल्कि वे अपनी शर्तों के आधार पर लड़ेंगे.

गठबंधन का मकड़जाल इस समय महागठबंधन में भी जबरदस्त है. हार के बाद कांग्रेस ने आरजेडी से बड़ी दूरी बना ली है. हार की समीक्षा करने के लिए महागठबंधन की बैठक में कांग्रेस की ओर से कोई नहीं गया. कुछ नेताओं ने तो तेजस्वी के फैसलों और उनके नेतृत्व पर भी सवाल खड़े कर दिए. तेजस्वी पिछले कई दिनों से दिल्ली में हैं. उन्होंने कांग्रेस के आलाकमान सहित राहुल गांधी से मुलाकात करने की कोशिश की, लेकिन सूत्रों के अनुसार अभी तक किसी भी बड़े नेता ने उनसे मुलाकात नहीं की है.

कांग्रेस भी नीतीश पर बरत रही नरमी
कहा तो यह भी जा रहा कि कांग्रेस अब आरजेडी से अलग राह चुनने की तैयारी में है. कुछ ऐसी ही सोच हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा यानी हम के नेता जीतनराम मांझी का है. उन्होंने तो दो टूक शब्दों में बयान दे दिया कि तेजस्वी महागठबंधन का चेहरा नहीं हैं. विधानसभा चुनाव में महागठबंधन का चेहरा कौन होगा, यह चुनाव से पहले तय होगा.

राहुल गांधी और तेजस्वी यादव (फाइल फोटो)


इस बीच जीतनराम मांझी ने जेडीयू के इफ्तार में जाकर सबको चौंका दिया. एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि हार के बाद आरजेडी और कांग्रेस की ओर से बीजेपी पर हमले तो किए गए लेकिन नीतीश कुमार के प्रति नरम रवैया रहा. उस नरम रवैया का ही परिणाम है कि रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे नेता फिर से मान रहे हैं कि बीजेपी को विधानसभा चुनाव में हराना है तो नीतीश कुमार को साथ में लाना होगा.

कुल मिलाकर बिहार की राजनीति एकबार फिर से दोराहे पर है. जहां से कौन किस रास्ते किससे हाथ मिला ले, कहना मुश्किल है. लेकिन इतना तो जरूर है कि जो परिस्थितियां दिख रही है, उसमें आने वाले दिनों में अगर फिर से 2014-15 की तरह कोई भूचाल देखने को मिले तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

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First published: June 3, 2019, 4:53 PM IST
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