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ANALYSIS: आखिरकार क्या मतलब है तेजस्वी यादव के राजनीतिक वैराग्य का?

Deepak Priyadarshi | News18Hindi
Updated: October 10, 2019, 6:29 PM IST
ANALYSIS: आखिरकार क्या मतलब है तेजस्वी यादव के राजनीतिक वैराग्य का?
लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद तेजस्वी यादव राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं हैं. ऐसे में अपनी ही पार्टी के नेताओं के निशाने पर भी हैं.

तेजस्वी अगर ठीक से सत्ता पक्ष पर हमला करते तो नीतीश सरकार को मुश्किल में डाल सकते थे, लेकिन वो सामने तक नहीं आए. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि तेजस्वी यादव के वैराग्य का क्या मतलब है?

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  • Last Updated: October 10, 2019, 6:29 PM IST
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पटना. मुजफ्फरपुर का चमकी बुखार (Chamki Fever), मॉब लिंचिंग (Mob Lynching), बड़ी आपराधिक घटनाएं (Crime), पटना का भीषण जलजमाव (Patna Flood) ये ऐसे मुद्दे थे, जिस पर नीतीश कुमार की सरकार (Nitish Government) कठघरे में थी. मीडिया (Media) से लेकर जनता तक तेजस्वी यादव (Tejaswi Yadav) को खोज रही थी, लेकिन वो उनके बीच नहीं पहुंचे. तेजस्वी यादव की राजनीति में सक्रियता इसलिए जरूरी थी क्योंकि बिहार की राजनीति एक बार फिर करवट बदलने को बेताब है. एनडीए (NDA) और महागठबंधन (Mahagathbandhan) दोनों ही में घमासान मचा हुआ है. 2020 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव के लिए कौन किसके साथ है, कौन साथ रहेगा, कौन साथ छोड़ेगा, कौन दोस्त दुश्मन बनेगा और कौन दुश्मन दोस्त. बदली हुई परिस्थितियों में यह बात किसी को भी पता नहीं. ऐसे में सभी पार्टियां अपने-अपने अपने हिसाब से राजनीतिक बिसात पर गोटियां सेट करने में लग गई हैं.

लेकिन, बिहार में अगर किसी पार्टी के भीतर ही उहापोह मची हो, खुद उसके ही नेताओं को नहीं मालूम कि करना क्या है? ऐसी कोई पार्टी यदि इस समय कोई है तो वो राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) है. इसकी वजह यह है कि उसके नेता तेजस्वी यादव लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम आने के बाद से ऐसे वैराग्य में चले गए हैं कि यह समझना भी मुश्किल हो रहा है कि क्या उन्हें बिहार की राजनीति में अब कोई दिलचस्पी रह गई है या नहीं. क्योंकि तेजस्वी न तो बिहार में टिक रहे हैं और न ही सूबे के बड़े-बड़े मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं. तेजस्वी अगर ठीक से सत्ता पक्ष पर हमला करते तो नीतीश सरकार को मुश्किल में डाल सकते थे, लेकिन वो सामने तक नहीं आए. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि तेजस्वी यादव के वैराग्य का क्या मतलब है?

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तेजस्वी यादव के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो)


तेजस्वी यादव को लोकसभा चुनाव के पहले तक बिहार की राजनीति का सबसे उदीयमान चेहरा समझा जा रहा था. राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर भी उनकी चर्चा होने लगी थी. देश का विपक्ष उनमें दूसरा लालू प्रसाद यादव (Lalu Yadav) देख रहा था, लेकिन मई में जैसे ही लोकसभा चुनाव के नतीजे आए तेजस्वी का नेतृत्व सवालों के घेरे में आ गया. चुनाव नतीजों में आरजेडी का खाता तक नहीं खुल सका. इसके बाद तेजस्वी यादव बिहार से मानो गायब ही हो गए. वो कहां गए, किसी को नहीं पता चला. इसी बीच मुजफ्फरपुर का चमकी बुखार, मॉब लिचिंग, बड़ी आपराधिक घटनाओं ने बिहार सहित देश भर में तूफान मचाकर रख दिया. इसे लेकर घिरी नीतीश सरकार बैकफुट पर थी. राजनीतिक रूप से यह सरकार पर हमलावर होने और फिर से जनता के बीच पैठ जमाने का सही मौका था.

लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद से गायब

मीडिया, जनता, पीड़ित सभी तेजस्वी यादव को खोज रहे थे, लेकिन तेजस्वी यादव नहीं आए. फिर एक महीने से अधिक का विधानसभा का सत्र चला. उनकी पार्टी के विधायक समेत पूरा विपक्ष अपने नेता का इंतजार करता रहा कि वो आकर सरकार पर हमले का नेतृत्व करेंगे, लेकिन तेजस्वी महज एक-दो दिन  हाजिरी बनाकर निकल गए. अलबत्ता पटना में दूध बाजार और फल मंडी तोड़े जाने पर वो धरना पर जरुर बैठे, लेकिन इसका कोई मतलब नहीं था. हाल ही में भारी बारिश से पटना शहर में भारी जलजमाव हुआ. जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी. नीतीश सरकार एक बार कठघरे में थी, लेकिन तेजस्वी यादव इस बार भी नहीं पहुंचे. हालांकि इस बीच हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए अपने बहनोई के नॉमिनेशन में उनकी मौजूदगी की खबर जरुर आई.
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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटना के एक बाढ़ग्रस्त इलाके का मुआयना करते हुए (फोटो: पीटीआई)


सवाल यह है कि आखिर तेजस्वी ने बिहार और उसके मुद्दों से इतनी दूरी क्यों बना ली? क्यों वो बिहार से बाहर रह रहे हैं और क्यों नहीं वो जनता के बीच जा रहे? क्या इसके राजनीतिक कारण हैं या फिर व्यक्तिगत कारण. व्यक्तिगत कारण इस मायने में कि उनके घर में ही इस समय तेजप्रताप और उनकी पत्नी ऐश्वर्या के रिश्तों को लेकर घमासान मचा हुआ है. क्या ये कारण इतना बड़ा है कि वो अपना राजनीतिक भविष्य दांव पर लगाकर एकदम से वैरागी हो जाएं? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तेजस्वी यादव का वैराग्य भाव इसलिए भी हो सकता है कि एनडीए में बीजेपी-जेडीयू के रिश्तों में खटास पैदा हो गई है. ऐसे में पुरजोर चर्चा है कि नीतीश कुमार फिर से आरजेडी के साथ हो सकते हैं. अगर ऐसा होता है कि यह बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है. क्योंकि 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी से अलग होकर नीतीश कुमार ने जब लालू यादव से हाथ मिलाया था तब प्रचंड मोदी लहर के बावजूद बिहार में बीजेपी को करारी हार मिली थी. जाहिर है बीजेपी उस कहानी को फिर से दोहराने देने का मौका नहीं देना चाहती.

आरजेडी का भविष्य अब किसके हाथ?

when lalu prasad yadav was criticized for his comment on flood victim in bihar
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तेजस्वी यादव की बड़ी परेशानी उनके उपर IRCTC जैसे मामले की लटकती तलवार रही है. कोर्ट में सुनवाई शुरू होने के बाद से यह कयास लगाए जा रहे हैं कि तेजस्वी यादव क्या गिरफ्तार भी हो सकते हैं? अगर ऐसा हुआ तो न सिर्फ तेजस्वी बल्कि पूरी आरजेडी का भविष्य दांव पर लग जाएगा. माना यह भी जा रहा है कि तेजस्वी यादव लगातार दिल्ली में कैंप इसलिए भी कर रहे हैं वो अपने उपर लटके तलवार को हटा सकें. जो बिहार में रहकर और सरकार के विरोध में नारे लगाकर संभव नहीं हो पाएगा. इस बीच उन्हीं के पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का भी दबाव है कि आरजेडी और जेडीयू एक साथ हो जाए.

तेजस्वी यादव की दुविधा का जवाब किसके पास?

तेजस्वी की दुविधा है कि यदि सरकार का विरोध करते हैं तो खुद उनके लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं और पार्टी के वरिष्ठ नेता नाराज होंगे. अगर नीतीश कुमार के साथ आने की कोशिश करते हैं तो उनके उपर सवाल खड़े होंगे कि नेता के रुप में वो फेल हो गए और उन्हें नीतीश कुमार की बैसाखी का सहारा लेना पड़ा. फिलहाल पांच विधानसभा सीटों और लोकसभा की एक सीट का उपचुनाव सिर पर है. ऐसे में इसमें भी पार लगाना उनके लिए किसी बड़ी परीक्षा से कम नहीं है. लेकिन, राजनीति तो अपने नेताओं को खोजती है. अगर नेता ही नहीं रहे तो फिर राजनीति होगी कैसे और करेगा कौन?

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First published: October 10, 2019, 5:08 PM IST
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