'लालू बिन सून' है बिहार की राजनीति! क्या मिस कर रहे हैं लोग, क्या खो चुकी है पार्टी ?

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: August 29, 2019, 4:47 PM IST
'लालू बिन सून' है बिहार की राजनीति! क्या मिस कर रहे हैं लोग, क्या खो चुकी है पार्टी ?
कई राजनीतिक जानकार लालू यादव को राजनीति का चमत्कार मानते हैं.

बीते तीन दशक में बिहार ही नहीं देश की राजनीति में लालू यादव ने अपनी अलग पहचान बनाई और हर लड़ाई में फ्रंट फुट पर खड़े रहे. उनके नेतृत्आव में आरजेडी ने वोट बैंक का ऐसा आधार तैयार किया जिससे डेढ़ दशक तक उनका राज बिहार में कायम रहा.

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जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू...  बिहार की राजनीति (Bihar Politics) में एक कहावत बड़ी मशहूर रही है. दरअसल बीते चार दशक से प्रदेश से लेकर देश स्तर की राजनीति में लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) ने जो छाप छोड़ी है वह शायद ही कोई कर पाया हो. कोई चुनाव हो रहे हों, टीवी चैनलों पर कोई चर्चा हो रही हो, संसद (Parliament) में किसी बात पर बहस हो रही हो या फिर कोई राजनीतिक गठबंधन (Political Alliance) बनाने की बात हो... वे हर जगह मौजूद रहते थे. कही राजनीतिक जानकार तो उन्हें भारतीय लोकतंत्र का चमत्कार बताते रहे हैं. बीते चार दशकों में बिहार की राजनीति में लालू की छाप हर स्तर पर दिखी है. लेकिन लालू यादव पिछले ढाई साल से जेल में बंद हैं. जाहिर है बिहार में उनके बिना राजनीति में एक शून्यता दिखती है.

हंसोड़ अंदाज का हर कोई कायल 
लालू प्रसाद पहली बार 1977 में बिहार के सारण से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे, तब से बिहार के हर चुनाव में लालू प्रसाद की अपनी भूमिका रही है. लेकिन, 2019 में 42 साल बाद ये पहला मौका आया जब किसी चुनाव में लालू यादव की मौजूदगी नहीं रही. इस दौरान लोगों ने लालू यादव का जहां हंसोड़ अंदाज मिस किया वहीं जनसमूह को ललकारने की उनकी अदा भी लोग नहीं देख पाए.

Lalu Yadav
लालू यादव के हंसोड़ अंदाज की पूरी दुनिया कायल है.


लालू के नेतृत्व में खड़ा हुआ राजद
बीते तीन दशक में बिहार ही नहीं देश की राजनीति में लालू यादव ने अपनी अलग पहचान बनाई और हर लड़ाई में फ्रंट फुट पर खड़े रहे. उनके नेतृत्व में 1997 में राष्ट्रीय जनता दल बना और पार्टी वोट बैंक का ऐसा आधार तैयार किया जिससे डेढ़ दशक तक उनका राज बिहार में कायम रहा. लेकिन बीते ढाई वर्ष से वे जेल में हैं, और बिहार की राजनीति में एक तरह से सूनापन है.

धुर विरोधी नीतीश कुमार से किया समझौता
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बिहार में उनका दल, विरोधी पार्टियां और प्रदेश का जनमानस काफी कुछ मिस कर रहा है. दरअसल ये वही लालू यादव हैं जिन्होंने धुर विरोधी नीतीश कुमार के साथ तमाम विरोधाभासों के बावजूद समझौता किया. यही वजह रही कि 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी तमाम लोकप्रियता और संसाधनों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  लालू प्रसाद यादव से पार नहीं पा सके थे.

lalu yadav-Nitish kumar
वर्ष 2015 की तस्वीर काफी सुर्खियों में रही थी जब नीतीश कुमार ने बीजेपी से 17 वर्षों का साथ छोड़ विधानसभा चुनाव के लिए लालू यादव की आरजेडी से गठबंधन कर लिया था


तेजस्वी को सौंपी राजनीति की कमान
लोकसभा चुनाव से पहले जब महागठबंधन का स्वरूप तय किया जा रहा था तो राहुल गांधी, जीतन राम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं को एक मंच पर लाने में उनकी बड़ी भूमिका रही. उन्होंने अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव के लिए राजनीति की ऐसी बिसात तैयार कर दी थी कि वे स्वाभाविक तौर पर नीतीश कुमार का विकल्प बन गए थे.

तेजस्वी की निष्क्रियता ने किया बेड़ा गर्क!
हालांकि लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल की करारी हार के बाद तेजस्वी यादव की निष्क्रियता ने लालू यादव के किए कराए पर एक तरह से पानी फेर दिया है. आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एक बार फिर महागठबंधन की कवायद जारी है. लेकिन इस बार परिस्थिति अलग है और महागठबंधन बिखराव की ओर जा रहा है.

Lalu-Tejaswi
लालू यादव की राजनीतिक विरासत को तेजस्वी यादव संभाल पाएंगे, इसको लेकर सवाल हैं.


लालू बिन सब सून...
ऐसे में माना जा रहा है कि एक बार फिर लालू यादव इसमें बड़ी भूमिका निभाएंगे. वे जेल से भी महागठबंधन दलों को फिर एक बार एक मंच पर लाने में कामयाब हो पाएंगे. ऐसा माना जा रहा है कि मांझी जो अभी बागी रुख अख्तियार किए हुए हैं वह भी मान जाएंगे. कांग्रेस भी उनके बगैर बिहार में शायद ही आगे बढ़ना चाहेगी. हालांकि महागठबंधन की समस्या तो वे सुलझा लेंगे यह सभी को मालूम है, लेकिन जब तक वह जेल से बाहर नहीं आएंगे तब तक देश-प्रदेश की जनता तो यही कहती रहेगी कि - 'बिन लालू सब सून'!

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First published: August 29, 2019, 4:41 PM IST
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