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वर्क फ्रॉम होम के दौर में दो पाटों में पिसते बिहारी मजदूर
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News18 Bihar
Updated: March 23, 2020, 8:04 PM IST
वर्क फ्रॉम होम के दौर में दो पाटों में पिसते बिहारी मजदूर
कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण ने बिहारी मजदूरों के सामने खड़ी की मुसीबत.

कोरोना के संक्रमण की वजह से देश के विभिन्न इलाकों में संस्थानों और व्यापार की बंदी ने बिहारी मजदूरों को बेरोजगार कर दिया और मजबूरन इन्हें घरों में बंद रहने के बदले भीड़-भाड़ भरी लंबी यात्रा करने और इस वजह से संक्रमण की जद में आने का खतरा उठाना पड़ रहा है.

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कोरोना वायरस (coronavirus) के संक्रमण के खतरे ने पूरी दुनिया के सोचने का तरीका बदल दिया है. इस खतरे के फैलने की शुरुआत विदेशी यात्रियों के संपन्न तबके ने की, मगर अब गरीब मजदूर तेजी से इसका शिकार होने लगे हैं. देश के विभिन्न राज्यों में मजदूरी करने वाले बिहार के प्रवासी मजदूर इसके क्लासिकल उदाहरण हैं. कोरोना के संक्रमण की वजह से देश के विभिन्न इलाकों में संस्थानों और व्यापार की बंदी ने इन्हें बेरोजगार कर दिया और मजबूरन इन्हें घर लौटना पड़ा. अपने घरों में बंद रहने के बदले इस क्रूशियल मौके पर इन्हें भीड़-भाड़ भरी लंबी यात्रा करने का और इस वजह से संक्रमण की जद में आने का खतरा उठाना पड़ रहा है. दिक्कत है कि अपने गांव में भी संक्रमण के खतरे से खौफजदा इनके अपने लोग इन्हें अपनाने के लिए उत्सुक नहीं हैं. दो पाटों में पिसना इनकी मजबूरी हो गई है.

पिछले एक सप्ताह से ऐसे मजदूर लगातार बिहार लौट रहे हैं. खास तौर पर ये मजदूर महाराष्ट्र और पंजाब जैसे राज्यों से लौट रहे हैं, जहां इस वक्त संक्रमण की दर काफी अधिक है. इस गंभीर वक्त में अगर इन्हें उन्हीं राज्यों में रहने की व्यवस्था और कुछ आर्थिक मदद दी जाती तो शायद इनके लिए इस संकट से उबरने का सही रास्ता होता, मगर इसके बदले इनकी घर वापसी के लिए रेलवे द्वारा कल तक स्पेशल रेलगाड़ियों का परिचालन किया गया. सिर्फ महाराष्ट्र से चार स्पेशल रेलगाड़ियों पर ऐसे पांच हजार बिहारी पिछले दिनों बिहार पहुंचे हैं. पंजाब, दिल्ली और अन्य राज्यों से कितने मजदूर बिहार वापस हुए इसकी कोई गिनती नहीं है.

पिछले दिनों मुंबई और पुणे स्टेशन पर ऐसे मजदूरों की भारी भीड़ दिखी, संक्रमण के दौर में जब सोशल डिस्टेंसिंग एक अनिवार्य स्थिति बन गयी है, ऐसे में हजारों मजदूर एक दूसरे के शरीर से चिपके, एक दूसरे पर चढ़े नजर आ रहे थे. संक्रमण के खतरे का रिस्क उठाकर वे किसी तरह बिहार, अपने घर लौट जाना चाहते थे. शायद उस वक्त भी स्थानीय सरकारों ने नहीं सोचा कि इन्हें लंबी यात्रा करने से रोका जाए और इन्हें जहां ये रहते हैं, वहीं रहने कहा जाए और जो जरूरतमंद हैं, उन्हें सहायता दी जाए. आखिर ये लोग अपने श्रम से उन्हीं राज्यों की मदद करते हैं.


यह तो रेलवे विभाग के फैसले का असर हुआ कि रविवार से यात्री रेलगाड़ियों के परिचालन बंद होने की घोषणा की गई और आज आखिरी रेलगाड़ी बिहार आई है. इसके बावजूद संक्रमण के दौर में कम से कम 15 से 20 हजार मजदूरों को कोरोना संक्रमित लोगों के साथ यात्रा करने का खतरा उठाना पड़ा. बिहार सरकार द्वारा जारी सूचना के मुताबिक रविवार को सिर्फ दो ट्रेनों में 25 लोग संदिग्ध मिले हैं, इनमें से एक संदिग्ध जो महज 18-19 साल का युवा था, की आज दरभंगा में असामयिक मृत्यु हो गई. अभी उसका टेस्ट नहीं हुआ है.



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वैसे तो बिहार सरकार ने दावा किया है कि उसने सभी यात्रियों की रेलवे स्टेशन पर स्क्रीनिंग की है. मगर क्या कोई व्यवस्था ऐसी हो सकती है जो महज एक सप्ताह में 15 से 20 हजार लोगों की एकमुश्त स्क्रीनिंग करने कह दे कि इसमें फलां कोरोना संक्रमित है, फलां नहीं. इसलिए बेरोजगार होकर वापस लौट रहे बिहारी मजदूरों को उनके गांवों में, उनके घरों में ही स्वीकार नहीं किया जा रहा. और अगर लोग ऐसा कर रहे हैं, तो उसे बहुत गलत भी नहीं कहा जा सकता.

ऐसे में बिहार सरकार ने राज्य के हर गांव में सरकारी स्कूल के भवन में ऐसे लोगों के लिए शेल्टर शुरू करने की घोषणा की है. उनके स्वास्थ्य जांच को लेकर भी पहल हो रही है. मगर कोरोना संक्रमण के इस दौर में यह बेहद दुखद मामला है कि 15-20 हजार मजदूरों को अपने जीवन का खतरा उठाकर लंबी रेलयात्रा करनी पड़ी और वे अभी खतरे की जद में हैं.


जिन राज्यों को अपने श्रम से इन्होंने बेहतर बनाने में मदद की, वही इस संकट के घड़ी में उनके लिए सहारा बनकर खड़ा नहीं हुआ. ऐसी सूचनाएं हैं कि जिन राज्यों में मजदूरों की मदद के लिए पैकेज की घोषणा हुई है, वहां भी इस योजना से प्रवासी मजदूरों को बाहर रखा जा रहा है. अब ये लोग एक ऐसे राज्य में, ऐसे स्वास्थ्य सुविधाओं के बीच हैं, जो अमूमन संसाधन विहीन और गैरपेशेवर माना जाता है.

वर्क फ्रॉम होम के इस दौर में जब लोगों को सिर्फ इसलिए घर से काम करने की इजाजत दी गई है कि वे अपने घरों में रहें और कोरोना के संक्रमण से सुरक्षित रहें. मगर इन बिहारी मजदूरों का वर्क तो छिन ही गया है, होम लौटना भी इनकी सेहत और संवेदना के साथ खिलवाड़ साबित हो रहा है.

( पुष्यमित्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. ये उनके निजी विचार है.)

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First published: March 23, 2020, 8:04 PM IST
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