NRC तो बहाना है! BJP-JDU इस 'बैकअप प्लान' पर कर रही हैं काम

सवाल यह है कि जब असम में एनआरसी (NRC in Assam) की फाइनल लिस्ट पर बीजेपी में भी एकमत नहीं है तो बिहार (Bihar) में इस पर सियासत क्यों शुरू हो गई? सवाल ये भी है कि बिहार में NRC मुद्दा ही क्यों है?

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: September 4, 2019, 11:57 AM IST
NRC तो बहाना है! BJP-JDU इस 'बैकअप प्लान' पर कर रही हैं काम
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बिहार में बीजेपी-जेडीयू की राह तभी अलग हो सकती है जब दोनों ही पार्टियों को अपनी जीत का भरोसा हो जाए.
Vijay jha | News18 Bihar
Updated: September 4, 2019, 11:57 AM IST
बिहार में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन यानी NRC का मुद्दा गरमाता जा रहा है. बीजेपी (BJP) इस मुद्दे को लगातार उठा रही है और इसे प्रदेश में लागू करने की मांग उठा रही है. हालांकि इस पर जेडीयू (JDU) ने साफ कर दिया है कि सूबे में NRC की जरूरत नहीं है, जबकि आरजेडी (RJD) ने इस मसले को लेकर बीजेपी पर वोट बैंक (Vote Bank) की राजनीति का आरोप लगाया है. हालांकि सवाल ये है कि जब असम में एनआरसी (NRC in Assam) की फाइनल लिस्ट पर बीजेपी में भी एकमत नहीं है तो बिहार में इसपर सियासत क्यों शुरू हो गई? सवाल ये भी है कि बिहार में NRC मुद्दा ही क्यों है?

राजनीतिक जानकारों की मानें तो इसके पीछे कारण ये है कि प्रदेश में 2020 के अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में बीजेपी मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि की राजनीति के बहाने अपने लिए एक बड़ा मौका देख रही है. वहीं, जेडीयू भी अपने तरीके से इस मुद्दे पर अपना पक्ष आगे रख रही है. दरअसल दोनों ही पार्टियां इस मुद्दा में अपना-अपना मौका देख रही हैं.

बीजेपी के लिए एक मौका
वरिष्ठ पत्रकार फैजान अहमद की मानें तो बीजेपी की राजनीति का मुख्य आधार ही सांप्रदायिक विभाजन है. बिहार इसके लिए सॉफ्ट टारगेट साबित हो सकता है. खास तौर पर बिहार के चार जिलों- कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया और अररिया में लगातार बढ़ रही मुस्लिम जनसंख्या बीजेपी की इस राजनीति के लिए अवसर जरूर है.

बीजेपी का कोर मुद्दा रहा है
बकौल फैजान अहमद ये बीजेपी का कोर मुद्दा पहले से रहा है. 1980 के दशक से ही बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ वे अभियान चलाते रहे हैं. हालांकि जेडीयू का स्टैंड बीजेपी से अलग है. वह एनआरसी समेत कई मुद्दों पर बीजेपी से अलग राय रखती है और उसपर कायम रहती है.

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बीजेपी सांसद राकेश सिन्हा ने साफ तौर इशारा किया है कि पार्टी एनआरसी के मुद्दे को बिहार में जरूर आगे ले जाएगी. (फाइल फोटो)

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बीजेपी-जेडीयू की अलग राय
फैजान अहमद कहते हैं कि इस मामले पर दोनों ही पार्टियां अलग राय रखती है. दोनों ही पार्टियां एक दूसरे के साथ सहज भी नहीं हैं और दोनों अलग भी होना चाहते हैं. लेकिन राजनीति का तकाज़ा यही कहता है कि दोनों पार्टियां उसी सूरत में अलग होंगी जब दोनों को लगेगा कि माहौल उसके हित में है.

राजनीतिक फेरबदल का इंतजार
फैजान अहमद कहते हैं कि बीजेपी तब अलग होगी जब उसे लगेगा कि हिन्दुत्व के नाम पर वह अकेले भी सत्ता में आ सकती है, जबकि जेडीयू तभी अलग होने का सोचेगी जब बिहार में कोई बड़ा राजनीतिक फेरबदल हो. जेडीयू को जब लगेगा कि वह किसी भी सूरत में सत्ता में बरकरार ही रहेगी तो वह बीजेपी से अलग हो सकती है.

बिहार में एनआरसी मुद्दा नहीं
वही, वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार कहते हैं कि बिहार में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा निश्चित रूप से एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन NRC के मुद्दे पर बीजेपी असम में बुरी तरह विफल रही है. इसलिए उसके इस मुद्दे में बिहार के संदर्भ में बहुत दम नहीं है. ऐसे भी वह सिर्फ कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया और अररिया जिले की बात करती है तो यह NRC का मुद्दा रहा भी नहीं.

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बिहार के सीमांचल इलाके में एनआरसी लागू करने की बीजेपी की मांग को जेडीयू ने खारिज कर दिया. ( केसी त्यागी का फाइल फोटो)


हर हिन्दुस्तानी को देनी पड़ती है पहचान
बकौल प्रेम कुमार चार जिलों के संदर्भ में ये बात तो की जा सकती है कि स्थानीय स्तर पर ही बांग्लादेशियों की पहचान हो जाए, लेकिन मुश्किल तो ये है कि इस बहाने हर हिन्दुस्तानी को परीक्षा देनी पड़ती है. ऐसे में जब वह असम में विफल हो गई तो बिहार में न्याय कर पाएंगे, ऐसा नहीं लगता है.

नीतीश पर बीजेपी को भरोसा नहीं
हालांकि प्रेम कुमार ये भी कहते हैं कि बिहार में बीजेपी अपने कोर मुद्दे को इसलिए भी जीवित रखना चाहती है कि उसे नीतीश कुमार पर पूर्ण भरोसा नहीं है. यही वजह है कि बीजेपी अपने 'बैकअप प्लान' के तहत भी चल रही है. दरअसल बीजेपी ये नहीं चाहती है कि अलग हो जाएं, लेकिन उस सिचुएशन के लिए भी खुद को तैयार कर रही है.

दोनों दलों के लिए एक मौका !
प्रेम कुमार कहते हैं कि यही बात जेडीयू के संदर्भ में भी लागू होती है. अगर नीतीश की पार्टी को मुद्दा सूट करेगा तो बीजेपी से अलग होने के लिए NRC का मुद्दा एक मजबूत बहाना रहेगा. लेकिन, जेडीयू ऐसा तभी करेगी जब वह दोबारा महागठबंधन जैसा कोई कंसेप्ट सामने लेकर आए. यहां कांग्रेस उसका साथ दे सकती है और आरजेडी में तोड़फोड़ हो सकती है. इस स्थिति में NRC का मुद्दा दोनों ही दलों के लिए एक अलग होने का एक 'मौका' हो सकता है.

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First published: September 4, 2019, 10:44 AM IST
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