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    अगड़ों की राजनीति करने वाली BJP का अब पिछड़ों पर फोकस, जानें संगठन में कैसा है सवर्ण-बैकवर्ड का समीकरण?

    इस बार भी बीजेपी ने पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलितों पर फोकस किया है. (प्रतीकात्मक फोटो)
    इस बार भी बीजेपी ने पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलितों पर फोकस किया है. (प्रतीकात्मक फोटो)

    2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा (BJP) ने 17 में से नौ अगड़ी जाति तो बाकी पिछड़ी और अति पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था.

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    पटना. अब तक सवर्णों की राजनीति करने वाली बीजेपी (BJP) अपनी राजनीतिक ट्रेंड बदल रही है. अब बीजेपी पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित वोट बैंक (Dalit Vote Bank) पर फोकस कर रही है. पिछले चुनाव से लेकर अब तक देखा जाए तो पिछड़ा- अति पिछड़ा और दलितों पर बीजेपी ने दांव खेला है. हालांकि, बीजेपी इस बैकवर्ड पॉलिटिक्स (Backward Politics) से इनकार कर रही है. लेकिन आरजेडी कहती है कि बीजेपी के पास कोई बैकवर्ड नहीं टिक सकता है.

    दरअसल,  2015 विधानसभा के चुनाव से लेकर लोकसभा और संगठन विस्तार को देखा जाए तो बीजेपी ने बैकवर्ड कार्ड खूब खेला है.  2015 विधानसभा चुनाव में 152 उम्मीदवारों को टिकट देने से पहले जातियों की गणित और केमेस्ट्री खूब बनाई गई थीं. 152 में से सबसे ज़्यादा 65 सीटें पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों को दी गई थी. जातिगत समीकरण की बात करें तो 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 17 में से नौ अगड़ी जाति तो बाकी पिछड़ी और अति पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था. फिर भी बीजेपी के नेता इस बात को नहीं स्वीकारते हैं. बीजेपी के नेता का कहना है कि पार्टी सबको लेकर चलती है.

    बिहार में मुख्य चेहरे पिछड़े
    बीजेपी के बड़े चेहरे भी पिछड़ी जाती से ही आते हैं. इसमें सुशील मोदी, नंदकिशोर यादव, प्रेम कुमार, नित्यानंद राय और संजय जयसवाल सरीखे कई नेता पिछड़े समुदाय से आते हैं. वहीं, मंगल पांडे, गिरिराज सिंह और अश्वनी चौबे जैसे नेता बीजेपी के लिए अगड़े फेस हैं. लेकिन बिहार बीजेपी में सबसे ज्यादा दाव पिछड़े नेताओं पर ही खेला जा रहा है. बीजेपी ने पिछले दो बार से पिछड़े को ही अध्यक्ष ही बनाया है.
    बीजेपी की नई टीम में भी पिछड़ों का दबदबा


    बीजेपी ने संजय जयसवाल की टीम में भी पिछड़ों, अति पिछड़ों, दलित और वैश्य को खूब जगह दी है. बीजेपी की मूल टीम में 35 लोग हैं,  जिसमें 20 पिछड़े,अति पिछड़े और ही दलित हैं. वहीं, सात मोर्चा और 19 प्रकोष्ठ में से 9 पिछड़े और दलित हैं. इस बार बीजेपी ने बैकवर्ड समीकरण को देखते हुए अपने संगठन और कार्यकारिणी में पिछड़े, अति पिछड़े और दलितों को जगह दी है.

    आरजेडी बीजेपी के इस रणनीति से इतेफाक नहीं रखती
    बीजेपी के इस समीकरण से आरजेडी इतेफाक नहीं रखती है. आरजेडी के नेता मृत्युंजय तिवारी कहते हैं कि बीजेपी पिछड़ों और दलितों की राजनीति कर ही नहीं सकती. उनके पास पिछड़े और दलित टिक ही नहीं सकते. आज तक बीजेपी ने पिछड़ों, अति पिछड़ों और दलितों के लिए कुछ नहीं किया है. सिर्फ बीजेपी ने इन जातियों को दबाया है. कुछ दिन के बाद यह सभी बीजेपी को छोड़ देंगे, क्योंकि यह पिछड़ा विरोधी पार्टी रही है.

    बीजेपी के इस दाव से मुश्किल जेडीयू और आरजेडी को
    इस बार भी बीजेपी ने पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलितों पर फोकस किया है. 2020 के विधानसभा में उम्मीद यह की जा रही है कि बीजेपी पिछड़ा वोट बैंक की राजनीति के तहत ज्यादा से ज्यादा उम्मीदवार बैकवर्ड उतारेगी. ऐसी हालात में आरजेडी और जेडीयू थोड़ी दिक्कत हो सकती है, जिनकी राजनीति का आधार ही बैकवर्ड रहे हैं.
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