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जाति आधारित जनगणना: जानें क्या है 'कर्नाटक मॉडल' जिस पर तेजस्वी के पेच में फंस गए CM नीतीश!

जातिगत जनगणना पर नीतीश कुमार व तेजस्वी यादव एकमत.

जातिगत जनगणना पर नीतीश कुमार व तेजस्वी यादव एकमत.

Caste Census News: वर्ष 2015 में कर्नाटक में सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 'सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण' करवाया था. बाद में इसे ही जाति-जनगणना का नाम दिया देकर प्रचारित किया गया.

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पटना. मानसून सत्र की कार्यवाही के दौरान बीते 20 जुलाई को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय (Minister of State for Home Nityanand Rai) ने संसद को बताया कि जनगणना में एससी और एसटी के अलावा अन्य जाति आधारित आबादी की गणना नहीं कराएगी तो इस पर सियासत में नई बहस छिड़ गई है. खास तौर पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar), नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) समेत कई नेता जाति आधारित जनगणना कराने की मांग दोबारा उठाने लगे हैं. इन नेताओं का तर्क है कि इससे असल मायने में जरूरतमंदों को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक मदद मिलेगी. जीतन राम मांझी और रामदास अठावले भी इस मांग को उठा चुके हैं. यही नहीं इससे पहले भारतीय जनता पार्टी की नेता पंकजा मुंडे भी यह मांग उठा चुकी हैं. केंद्र सरकार का तर्क है कि जाति आधारित जनगणना नहीं होने के पीछे कुछ तर्क हैं, जिसे माना गया है. हालांकि बिहार में अब कर्नाटक मॉडल का हवाला देकर राज्य स्तर पर जातिगत जनगणना (Karnataka Model of Caste Census) करवाने की मांग की जाने लगी है.

खास तौर पर तेजस्वी यादव का कहना है कि यदि केंद्र सरकार जातिगत जनगणना नहीं करवाती है तो बिहार सरकार कर्नाटक मॉडल की तर्ज पर अपने खर्चे पर यह जनगणना करवा सकती है. तो आइये जानते हैं कि आखिर वह कर्नाटक मॉडल क्या है जिसका उदाहरण नेता प्रतिपक्ष अक्सर देते हैं. दरअसल, वर्ष 2015 में सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ‘सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण’ करवाया था. बाद में इसे ही जाति-जनगणना का नाम देकर प्रचारित किया गया. हालांकि, सर्वेक्षण कराया तो गया, लेकिन उसके परिणाम सार्वजनिक नहीं किए गए. यह सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण राज्य सरकार ने अपने स्तर पर करवाया था और इसके लिए 162 करोड़ रुपए खर्च किए थे.

कर्नाटक मॉडल को लेकर बिहार में सियासत गर्म
पू्र्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कुछ महीने पहले कहा था कि रिपोर्ट तैयार थी, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने भी इसे मानने से इनकार कर दिया था. वहीं, येदियुरप्पा सरकार ने भी पिछले दो सालों से रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया. माना जा रहा है कि कर्नाटक में बसवराज बोम्मई के नेतृत्व में बनी नई सरकार के सामने भी जल्दी ही यह मुद्दा आ सकता है. राज्य में अभी अस्तित्व में आए अति हिंदुलिदा जागृति वेदिके (कन्नड़ फॉर एक्स्ट्रीम बैकवर्ड अवेयरनेस फोरम) ने रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिए दबाव भी बनाया है. फोरम का दावा है कि अभी जो आरक्षण दिया जा रहा है, वह अतार्किक आंकड़ों पर आधारित है. अभी ऐसे कई अत्यंत पिछड़े वर्ग हैं, जिनका आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक रूप से कोई विकास नहीं हुआ है और न ही उन्हें प्रतिनिधित्व मिला है.

क्या कहते हैं वर्ष 2011 जनगणना के आंकड़े?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अक्सर कहते हैं देश में आबादी के अनुरूप आरक्षण का प्रावधान किया जाए. मौजूदा समय में पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण मिलता है. इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी सब एक मत हैं. इन नेताओं का मानना है कि यह पता चलने पर कि पिछड़ी जातियों में किस जाति के लोगों की संख्या कितनी है और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कैसी है, उनके लिए खास योजना बनाई जा सकती है. बता दें कि वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, बिहार की जनसंख्या 10.38 करोड़ थी. इसमें 82.69% आबादी हिंदू और 16.87% आबादी मुस्लिम थी. हिंदू आबादी में 17% सवर्ण, 51% ओबीसी, 15.7 % अनुसूचित जाति और करीब 1% अनुसूचित जनजाति है.

तेजस्वी का दांव और बिहार की बदल रही सियासी फिजा!
गौरतलब है कि फरवरी 2019 में विधानमंडल और 2020 में बिहार विधानसभा में जातीय जनगणना कराने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास होने के बाद दो बार इसे केंद्र सरकार को भेजा गया. सीएम नीतीश कुमार ने सबसे पहले 1990 में जाति आधारित जनगणना कराने की मांग की थी. उन्होंने इसके लिए तब के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी पत्र लिखा था. नीतीश लगातार इसकी मांग उठा रहे हैं. जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने भी प्रस्ताव पास कर जातिगत जनगणना कराने की मांग की है. दरअसल, सियासत के जानकार बताते हैं कि फिलहाल ओबीसी जातियों का सेंटिमेंट भाजपा की ओर शिफ्ट कर गया है ऐसे में बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार ओबीसी पर अपना असर छोड़ना चाहते हैं. यही कारण है कि इस मुद्दे पर सियासी दल एक साथ आ गए हैं. नजर सिर्फ और सिर्फ सत्ता समीकरण पर है और बहाना पिछड़ी जातियों के सामाजिक उत्थान का है.

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