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जातिगत जनगणना: क्या भाजपा के बढ़ते कद से परेशान हैं 'जातिवादी पार्टियां'?

जातिगत जनगणना पर क्यों जोर दे रहे हैं नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव?

जातिगत जनगणना पर क्यों जोर दे रहे हैं नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव?

Caste Census News: वर्ष 2011 की जनगणना से पहले विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने जातिगत जनगणना की मांग की थी, लेकिन अभी भाजपा इसको लेकर दुविधा में नजर आ रही है. विशेषज्ञों की नजर में शायद बीजेपी अभी मंडल पार्ट-2 की राजनीति को समझने की कोशिश कर रही है.

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पटना. देश की राजनीति में इस वक्त जातिगत जनगणना (Caste Census) का मुद्दा जोरशोर से उछल रहा है. विशेष तौर पर बिहार के सीएम नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) से लेकर तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) तक, सब जातिगत जनगणना को लेकर बेहद उत्साहित हैं. इस मुद्दे को लेकर सोमवार (23 अगस्त) को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव समेत कुल 11 नेताओं का प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) से मुलाकात भी की. इस डेलिगेशन में भाजपा नेता व बिहार सरकार के मंत्री जनक राम (BJP Leader Janak Ram) भी शामिल थे. विपक्ष लंबे समय से जातिगत जनगणना का मुद्दा उठाता आया है. बिहार विधानसभा में वर्ष 2019 और 2020 में जब जातिगत जनगणना को लेकर प्रस्ताव पारित हुआ था तो भाजपा (BJP) ने भी इसका समर्थन किया था. पर अब भाजपा नेताओं के बोल बदल गए हैं. भाजपा के वरिष्ठ नेता व डॉ सीपी ठाकुर (Dr CP Thakur) ने साफ तौर पर कहा है कि जनगणना का आधार जाति नहीं, बल्कि आर्थिक आधार होना चाहिए. प्रधानमंत्री जी पर जातीय जनगणना के लिए दबाब बनाना उचित नहीं है.

सीपी ठाकुर ने अपरोक्ष रूप से नीतीश कुमार को अपरोक्ष रूप से टारगेट पर लेते हुए कहा कि हमारी स्पष्ट समझ है कि जनगणना अगर हो तो अमीरी और गरीबी के आधार पर हो. जातीय जनगणना समाज को बांटने की साजिश है. भाजपा नेता व केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने भी जातीय जनगणना की मांग पर कहा कि जो भी जनगणना हो, वह समाज के हित के लिए हो. राजनीतिक हित के लिए नहीं. गिरिराज सिंह ने साफ कहा कि कुछ लोग राजनीतिक लाभ के लिए इसकी मांग कर रहे हैं. अब सवाल यह है कि आखिर भाजपा में ही इस मुद्दे पर दो राय क्यों है? एक तरफ वह विधान सभा में प्रस्ताव का समर्थन करती है, प्रधानमंत्री से मिलने वाले डेलिगेशन में शामिल भी होती है, और फिर बाहर विरोध भी करती है. सवाल यह है कि आखिर भाजपा की दुविधा क्या है?

भाजपा के भीतर से भी उठ रही जातिगत जनगणना की मांग
बता दें कि एनडीए के भीतर के कई दल और लगभग सभी विपक्षी पार्टियां जातिगत जनगणना पक्ष में सामने आ रही हैं, लेकिन असल दुविधा भाजपा के सामने है. एक ओर केंद्र सरकार ने दो बार संसद में जातीय जनगणना से इनकार किया है, तो दूसरी ओर बिहार बीजेपी के तमाम नेता और बिहार से बाहर के बीजेपी के पिछड़े नेता इसके पक्ष में हैं. पिछले 10 अगस्त को ओबीसी बिल पर चर्चा के दौरान संघमित्रा मौर्या ने जातिगत जनगणना की मांग खुले तौर पर संसद में की थी. तब उन्होंने कहा था कि आखिरी जातिगत जनगणना 1931 में हुई थी. इसके बाद से 90 वर्ष बीत गए हैं और समाज में काफी बदलाव हो चुके हैं. ऐसे में जातिगत जनगणना बेहद जरूरी है.

भाजपा की हां भी और ना भी, आखिर दुविधा क्यों?
इस बीच बीते 23 अगस्त को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई में बिहार की जिन 10 पार्टियों की मुलाकात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई उनमें भाजपा की ओर से जनक राम शामिल थे. जनक राम को प्रतिनिधिमंडल में शामिल करने की बीजेपी की राजनीति को समझने की कोशिश हो रही है, क्योंकि वह दलित समाज से आते हैं. दूसरी ओर हकीकत यह भी है कि बिहार सरकार में बीजेपी के कोटे से 25 मंत्री तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी दोनों ही पिछड़े समाज से ताल्लुक रखते हैं.

भाजपा की दलील-पीएम मोदी के फैसले का करें इंतजार
सबसे खास बात यह कि तारकिशोर प्रसाद और रेणु रेणु देवी ने जातिगत जनगणना का समर्थन किया है. तार किशोर प्रसाद ने कहा था कि भाजपा अगर इसके विरोध में होती तो पीएम मोदी डेलिगेशन से मिलते ही नहीं. पीएम ने लोगों की बात सुनी है और यह विषय भी केंद्र सरकार का है, ऐसे में पीएम मोदी के फैसले का इंतजार करना चाहिए.

उपेंद्र कुशवाहा ने भाजपा को दी खुली चेतावनी
जातिगत जनगणना का मुद्दा इसलिए भी अहम बन गया है क्योंकि एनडीए में रहते हुए भी भाजपा और जदयू की राय बिल्कुल ही जुदा नजर आ रही है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने के दो दिन बाद वरिष्ठ जद (यू) संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा ने साफ-साफ कहा कि उनकी पार्टी भले ही एनडीए का हिस्सा हो सकती है, लेकिन यदि उनकी मांग नहीं मानी जाती है तो ‘टकराव’ निश्चित तौर पर होगा.

कुशवाहा ने भाजपा से पूछा यह सवाल
कुशवाहा ने कहा कि जातिगत जनगणना की अनुमति नहीं देना ‘बेईमानी’ होगी. खासकर तब जबकि 2010 में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान पार्लियामेंट ने इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित किया था और एनडीए सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान भी केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा इस बारे में आश्वस्त किया गया था. कुशवाहा ने कहा, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद को पिछड़े समुदाय से आते हैं और जब सभी दल इस पर एकमत हैं, कुछ भाजपा नेता भी इसकी मांग कर रहे हैं तो आखिर केंद्र सरकार को जातिगत जनगणना की अनुमति देने से किसने रोक रखा है?

मंडल राजनीति की काट है भाजपा की हिंदुत्व राजनीति!
राजनीतिक के जानकार भाजपा की दुविधा के बारे में कहते हैं कि 1990 के दशक में जिस तरह से मंडल की राजनीति भारी पड़ी थी इससे जातीय वैमनस्यता बढ़ गई थी. इसी का परिणाम रहा था कि जातिगत प्रभुत्व वाले क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ और कई दल सत्ता पर काबिज भी हुए. बीतते वक्त के साथ ही भाजपा ने एक रणनीति के तहत टुकड़ों में बंटी जातियों को हिंदुत्व राष्ट्रवाद के नाम पर इकट्ठा किया और वर्ष 2014 में पिछड़े वर्ग के नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बना दिया. इसका नतीजा रहा कि भाजपा को ओबीसी और दलित समुदाय का भरपूर समर्थन मिला और वह केंद्र से लेकर कई राज्यों की सत्ता पर काबिज हो गई.

भाजपा को सता रहा यह डर कि कहीं इन्हें न मिल जाए ‘हथियार’!
विशेषज्ञों की नजर में अब तक भाजपा यह दिखाने की कोशिश करती रही है कि वह जाति आधारित राजनीति नहीं, हिंदुत्व की राजनीति करती है. जहां सभी जातियां हिंदू हों. भाजपा भी ओबीसी जैसे जातिगत मुद्दे को उसने हिंदुत्व या राष्ट्रवाद के रंग में रंग दिया. हालांकि हकीकत तो यही है कि जातिगत राजनीति भाजपा भी कर रही है, पर उस पर हिंदुत्व का आवरण चढ़ा हुआ है. ऐसे में विशेषज्ञों की नजर में जातिगत जनगणना के जरिये भाजपा इस आवरण के हट जाने का भय है. क्योंकि अगर जाति आधारित आंकड़े सामने आए तो एक बार फिर क्षेत्रीय पार्टियों के हाथ जाति आधारित नया हथियार आ जाएगा.

ओबीसी वर्ग में बढ़ गई भाजपा की पैठ
राजनीति की यह सच्चाई आंकड़ों में भी नजर आती है. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने क्षेत्रीय दलों के ओबीसी मतदाताओं के वोट शेयर में सेंध लगाई. क्षेत्रीय दलों का ओबीसी वोट शेयर घटकर 26.4 प्रतिशत रह गया. लोकनीति-सीएसडी के किए गए सर्वे के मुताबिक भाजपा ने पिछले एक दशक के दौरान ओबीसी मतदाताओं के बीच बड़े पैमाने पर अपनी पकड़ बना ली है.

हिंदुओं की एकता की राजनीति आगे बढ़ाना चाहती है भाजपा
2009 के लोकसभा चुनावों में महज  22 प्रतिशत ओबीसी ने भाजपा को वोट किया था और 42 प्रतिशत ने क्षेत्रीय दलों को चुना. लेकिन 2014 में भाजपा को जहां 34 प्रतिशत ओबीसी वोट मिले वहीं 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान,  44 प्रतिशत ओबीसी ने भाजपा को वोट दिया. ऐसे में वर्ष 2019 लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों का वोट शेयर खिसकर 27 प्रतिशत रह गया. जाहिर है यह क्षेत्रीय दलों के लिए बड़ा झटका था और भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति के लिए अधिक फायदेमंद था.

भाजपा की दुविधा का कारण मंडल पार्ट-2 राजनीति की सुगबुगाहट
अब सवाल उठता है कि भाजपा को जब ओबीसी का इतना समर्थन मिल रहा तो आखिर भाजपा जातिगत जनगणना करवाने में ना-नुकुर क्यों कर रही है? दरअसल भाजपा की राजनीति का आधार हिंदुत्व है और वह समग्र समाज को साथ लाने की वकालत करती है. जातिगत जनगणना होने के साथ ही आबादी के अनुरूप आरक्षण बढ़ाने की मांग होगी. ऐसे में अनुमान के मुताबिक भाजपा के परंपरागत समर्थक सवर्ण वर्ग में नाराजगी हो सकती है. ऐसे भी जब से धुर विरोधी नीतीश और तेजस्वी की नजदीकियां सामने आई हैं तब से ही भाजपा नेताओं के माथे पर बल आ गई है. यही कारण है कि जाति जनगणना के सवाल पर भाजपा दुविधा में नजर आ रही है.

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